बिजली इंजीनियरों ने केंद्रीय ऊर्जा मन्त्री व अखिलेश सरकार की वार्ता के पहले उठाये पांच सवाल
बिजली इंजीनियरों ने केंद्रीय ऊर्जा मन्त्री व अखिलेश सरकार की वार्ता के पहले उठाये पांच सवाल
केंद्र व राज्य सरकार निजी घरानों पर अति निर्भरता की ऊर्जा नीति बदलें
उप्र की बिजली सुधार हेतु राजनीति से ऊपर उठकर लें फैसले
लखननऊ। आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने उ. प्र. की बिजली व्यवस्था में कारगर सुधार हेतु केंद्रीय विद्युत मन्त्री पीयूष गोयल और उ प्र के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव के बीच हो रही वार्ता का स्वागत करते हुए कहा है कि उप्र की बिजली व्यवस्था के सुधार हेतु राजनीति से ऊपर उठकर फैसले लिए जाएँ तभी सार्थक परिणाम आ सकेंगे। फेडरेशन ने इस बाबत केंद्र व प्रदेश सरकार के समक्ष पांच महत्वपूर्ण मुददे रखते हुए अपेक्षा की है कि वार्ता में इन समस्याओं का समाधान निकाला जाना चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने आज यहाँ कहा कि विगत दो दशकों में उ प्र की बिजली व्यवस्था निजी घरानों पर अति निर्भरता के चलते पूरी तरह चरमरा गयी है और यदि सही मायने में प्रदेश की बिजली व्यवस्था सुधारनी है तो सबसे पहली प्राथमिकता ऊर्जा नीति की पुनर्समीक्षा है। उन्होंने कहा कि विगत नौ सालों में प्रदेश में निजी क्षेत्र को लगभग 17000 मेगावाट क्षमता की नयी बिजली परियोजनायें दी गयीं किन्तु निजी घरानों ने इन परियोजनाओं का काम भी नहीं शुरू किया। इस दौरान प्रदेश के सार्वजनिक क्षेत्र में 1000 मेगावाट की अनपारा डी परियोजना दी गयी जो मार्च 2015 तक उत्पादन करने लगेगी, 500 मेगावाट की पारीछा और 500 मेगावाट की हरदुआगंज परियोजना पूरी हो गयी है और इससे बिजली उत्पादन हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि यदि निजी क्षेत्र को दी गयी 17000 मेगावाट क्षमता की नयी बिजली परियोजनाओं में से आधी भी सरकारी क्षेत्र में दी गयी होतीं तो यह बन जातीं और प्रदेश बिजली के मामले में आत्म निर्भर होता।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश में बिजली की प्रतिबंधित मांग और आपूर्ति में लगभग 3000 मेगावाट का अंतर है और निजी घरानों को दी गयी परियोजनाओं में आधी भी सरकारी क्षेत्र को दी गयी होतीं तो लगभग 8500 मेगावाट उत्पादन बढ़ गया होता। अतः ऊर्जा नीति में बदलाव पहली ज़रूरत है। यह भी उल्लेखनीय है कि निजी क्षेत्र मुनाफे के लिए काम करता है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र घाटा उठाकर भी बिजली देता है अतः निजी क्षेत्र की तुलना में सरकारी क्षेत्र के बिजली घरों की बिजली उत्पादन लागत लगभग आधी पड़ती है। इस दृष्टि से भी ऊर्जा नीति में बदलाव ज़रूरी है।
श्री दुबे ने कहा कि दूसरा बड़ा मुद्दा केंद्र से राज्योँ को मिलाने वाली बिजली के फार्मूले में बदलाव है। अभी गाडगिल फार्मूला के अनुसार प्रदेश को केंद्र से बिजली आवंटित की जाती है जो ज़रुरत से काफी कम है जब कि दिल्ली जैसे छोटे प्रांत में रिलायंस और टाटा को ज़रुरत से अधिक बिजली आवंटित की गयी है जिसे उप्र जैसे ज़रूरतमंद प्रांतों को बेच कर दिल्ली की निजी कंपनियां विगत दस सालों से अरबों खरबों रु. का मुनाफ़ा कमा रही हैं और उप्र, पंजाब,हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड जैसे प्रांत महंगी बिजली खरीद में भारी घाटा उठा रहे हैं। अतः बिजली आवंटन नीति में बदलाव दूसरी बड़ी ज़रुरत है। उन्होंने कहा की यद्दपि कि केंद्र की दोषपूर्ण नीतियों के चलते पूरे देश में कोयला संकट व्याप्त है किन्तु उप्र में खासकर अनपारा और पारीछा बिजली घरोँ में सही क्वालिटी और सही मात्रा में कोयला न आने के कारण औसतन 500 से 700 मेगावाट तक बिजली उत्पादन प्रभावित होता है, अतः प्रदेश के बिजली घरों को सही मात्र में और सही क्वालिटी का कोयला मिलना ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि चौथी बात सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नयी सुपर क्रिटिकल बिजली इकाइयाँ लगाने की स्वीकृति की बात है जिसमे केंद्र सरकार को मदद करनी चाहिए। खासकर ओबरा में 660 - 660 मेगावाट की दो इकाईयों और अनपारा ई में 660 - 660 मेगावाट की तीन इकाईयों को लगाने हेतु केंद्र सरकार को पर्यावरण क्लियरेन्स हेतु पहल करनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि सोनभद्र में नयी तापीय यूनिटों के लिए पर्यावरण क्लियरेन्स पर प्रतिबन्ध लगा है लेकिन 660 - 660 मेगावाट की सुपर क्रिटिकल बिजली यूनिटों के इको फ्रेण्डली होने के नाते यह पर्यावरण क्लियरेन्स दिलाने में केन्द्र सरकार को मदद करनी चाहिए।
बिजली इंजीनियर नेता ने कहा कि पाँचवीं सबसे बड़ी ज़रुरत यह है कि बिजली कार्पोरेशन को सही ढंग से चलाने हेतु बिजली निगमों में नियमित कार्यों के लिए सभी रिक्त पदों पर नियमित भर्ती की जाए और संविदा /ठेकेदारी प्रथा को तत्काल बंद किया जाये, इस बाबत केंद्र व राज्य दोनों को श्रमिक नीति में बुनियादी बदलाव करने की ज़रुरत है।
फेडरेशन ने उम्मीद जताई है कि बिजली सुधार हेतु राजनीति से ऊपर उठकर सार्थक फैसले लिए जाएंगे तो उप्र भी बिजली के मामले में अन्य प्रांतों की तरह आत्म निर्भर हो सकेगा ।


