विद्युत वितरण व आपूर्ति अलग करने का प्रस्तावित संशोधन वापस लिया जाये: निजी क्षेत्र पर अति निर्भरता राष्ट्रहित में नहीं: ऊर्जा नीति में बदलाव हेतु शीतकालीन सत्र में संसद पर विशाल प्रदर्शन:
इन्दौर। बिजली इन्जीनियरों के राष्ट्रीय फेडरेशन आल इण्डिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन (ए आई पी ई एफ) ने मांग की है कि यूपीए सरकार की गलत ऊर्जा नीति की पुनर्समीक्षा हेतु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति गठित की जाये जिसमें ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों व फेडरेशन को समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाये।
ए आई पी ई एफ ने ऊर्जा क्षेत्र की बदहाली के लिए निजी क्षेत्र पर अति निर्भरता की दोषपूर्ण नीति को जिम्मेदार ठहराते हुए मांग की है कि यू पी ए सरकार द्वारा इलेक्ट्रीसिटी एक्ट ’03 में प्रस्तावित संशोधन वापस लिया जाये जिसमें विद्युत वितरण और विद्युत आपूर्ति को अलग-अलग कर विद्युत आपूर्ति के लिये कई लाइसेन्स देने का प्राविधान है। फेडरेशन ने एलान किया है कि ऊर्जा नीति में सार्थक बदलाव हेतु देश के बिजली इन्जीनियर व कामगार संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान दिल्ली में विशाल राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन करेंगे।
ए आई पी ई एफ के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे, सेक्रेटरी जनरल पी रत्नाकर राव, पदमजीत सिंह, वैंकटशिवा रेड्डी, सुनील जगतप, आर एस दहिया, मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल अभियन्ता संघ के अध्यक्ष आनन्द तिवारी, महासचिव वी के एस परिहार व पवन जैन ने आज यहां कहा कि ऊर्जा क्षेत्र में तथाकथित सुधारों के नाम पर विगत दो दशकों से चल रहा बिजली बोर्डों के विखण्डन, निजीकरण व फ्रेन्चाईजीकरण का प्रयोग पूरी तरह विफल रहा है, ऐसे में विद्युत अधिनियम ’03 में एक और संशोधन कर विद्युत वितरण व आपूर्ति को अलग कर विद्युत आपूर्ति का पूरी तरह निजीकरण करना ऊर्जा क्षेत्र को तबाही की ओर ले जायेगा जो व्यापक राष्ट्रहित में नहीं है। अतः केन्द्र सरकार को सर्वोच्च प्राथमिकता पर यू पी ए सरकार की दोषपूर्ण ऊर्जा नीति की पुनर्समीक्षा करना चाहिए और पुनर्समीक्षा की प्रक्रिया पूरी होने तक निजीरकण, फ्रेन्चाइजीकरण व अधिनियम में संशोधन जैसी तमाम प्रक्रिया रोक देना चाहिए।
फेडरेशन की आज इन्दौर में हुई राष्ट्रीय बैठक में सभी प्रान्तों के प्रतिनिधि मुख्यतः अपरस्वामी, सुभाष राठौड, बी एल यादव, आर के सिंह, भुपिन्दर सिंह, प्रशान्त चतुर्वेदी, सुधाकर राव, शंकर नारायण, वी एस बिदरी, ए के जैन, वी के गुप्ता, सत्यपाल, यशपाल शर्मा, रामेश्वर माहुरे, बी वाई सोमवंशी, राजेश पाण्डेय, प्रफ्फुल खरे, बलदेव सिंह, सुरेन्द्र तिवारी सम्मिलित हुए।
बिजली अभियन्ताओं ने कहा कि घाटे के नाम पर बिजली बोर्डों का विखण्डन किया गया। आज हालात यह है कि बिजली वितरण कम्पनियों का घाटा ढाई लाख करोड़ रूपये से अधिक हो गया है जो तथाकथित सुधारों की विफलता का प्रमाण है। देश में कोयला व गैस का समुचित भण्डार होने के बावजूद अव्यवस्था के चलते एक ओर 30,000 मेगावाट से अधिक क्षमता के बिजली घर ईंधन संकट के चलते प्रभावित है तो दूसरी ओर सूखा प्रभावित देश भीषण बिजली संकट से कराह रहा है। उन्होंने कहा कि यू पी ए सरकार की ऊर्जा नीति का परिणाम केजी डी-6 घोटला, कोयला ब्लाक आवंटन घोटाला, अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट घोटाला, दिल्ली निजीकरण घोटाला जैसे अनेक घोटालों के रूप में सामने आ रहा है तो ऊर्जा नीति की पुनर्समीक्षा समय की महती मांग है।
विद्युत अधिनियम ’03 में विद्युत वितरण व आपूर्ति को अलग-अलग करने के प्रस्तावित प्राविधान को जनता से धोखा बताते हुए उन्होंने कहा कि बिजली संकट से ग्रस्त देश में कई निजी कम्पनियों को बिजली आपूर्ति का लाइसेन्स देने से स्पर्धा के बजाय निजी घरानों की सांठ-गांठ के चलते बिजली दरों में भारी वृद्धि होगी और आम जनता की कमर टूट जायेगी। उन्होंने कहा कि व्यापक जनहित में प्रस्तावित संशोधन वापस लिया जाये। निजी घरानों पर अति निर्भरता के कारण बिजली संकट व बिजली दरों में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि बिजली ग्रिड के समुचित संचालन व मुनासिब टैरिफ के लिए कुल उत्पादन क्षमता का 70 से 80 प्रतिशत केन्द्र व राज्य सरकार के नियंत्रण में होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश में 4 अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट निजी घरानों (तीन रिलायन्स व एक टाटा) को दिये गये थे किन्तु टेण्डर में दी गयी दरों मे बाद में मनमानी वृद्धि की अनुमति यू पी ए सरकार ने दी जिससे बिजली दरें बढ़ी और प्रतिस्पद्र्धात्मक बिडिंग का मजाक बन कर रह गया है।
दिल्ली में बिजली के निजीकरण के घृणित सच से पर्दा उठाये जाने की जरूरत पर बल देते हुए फेडरेशन के पदाधिकारियों ने सवाल किया कि जब अन्य राज्य बिजली बोर्डों का मात्र विखण्डन कर सरकारी कारपोरेशन बनाये जा रहे थे तब दिल्ली विद्युत बोर्ड का सीधे निजीकरण किसकी सलाह पर और क्यों किया गया, निजीकरण हेतु तीन कम्पनियों (जिसमें दो रिलायन्स की है) के चयन का आधार क्या था और राजधानी दिल्ली में निजीरकण की मोनोपोली कर लूट की छूट देने का दोषी कौन है-यह जवाब मिलना ही चाहिए। ओड़ीसा में निजीकरण के 15 साल बाद 46 प्रतिशत हानियां हैं। आगरा, नागपुर, औरंगाबाद, जलगांव, भिवांडी में फ्रेन्चाइजीकरण के चलते निजी कम्पनियां भारी मुनाफा कमा रही है जब कि सरकारी वितरण कम्पनियां काफी मंहगी बिजली खरीद कर अत्यधिक सस्ते दाम पर फ्रेन्चाइजी को देने के कारण घाटा उठा रही है। सी ए जी ने अपनी रिपोर्ट में आगरा के फ्रेन्चाइजीकरण पर गम्भीर सवाल उठाये है।
बिजली इन्जीनियर फेडरेशन ने मांग की कि बिजली कम्पनियों के सुचारू संचालन, लाइन हानियां कम करना सुनिश्चित करने व बेहतर उपभोक्ता सेवा हेतु ऊर्जा सचिव व बिजली निगमों के सी एम डी/एम डी पदों पर योग्य व कुशल बिजली अभियन्ता तैनात किये जायें।
उन्होंने यह भी मांग की कि अव्यवहारिक नई पेन्शन प्रणाली वापस लेकर पुरानी पेन्शन नीति लागू की जाये जिससे बिजली इन्जीनियर व कामगार न्यायोचित सेवा नैवृत्तिक लाभ व पेन्शन पा सकें।