नयी सरकार और ऊर्जा क्षेत्र की चुनौतियाँ
नोएडा। बिजली इंजीनियरों ने केंद्र में नयी सरकार के समक्ष ऊर्जा क्षेत्र में विद्यमान चुनौतियों को चिन्हित करते हुए तथाकथित सुधारों के नाम पर निजीकरण की ऊर्जा नीति में परिवर्तन की मांग की है।

नॉर्दर्न इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन की आज नोएडा में हुई बैठक में ऊर्जा क्षेत्र की प्राथमिकताओं को चिन्हित किया गया। बैठक में आल इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे, चीफ पैट्रन पदमजीत सिंह, पैट्रन के अशोक राव नॉर्दर्न इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन आर एस दहिया, सेक्रेटरी जनरल भुपिन्दर सिंह एवं राज्यों के प्रतिनिधि मुख्यतया आर के सिंह, डी सी दीक्षित, महेश चंद, सत्य पाल, एस के सूद, राकेश गुप्ता व अन्य उपस्थित थे।

बिजली इंजीनियर संघ पदाधिकारियों ने कहा कि यद्यपि कि पिछले एक दशक में देश की बिजली उत्पादन क्षमता में लगभग 60 प्रतिशत वृद्धि हुयी है और देश की बिजली उत्पादन क्षमता अब लगभग 253000 मेगावाट हो गयी है किन्तु अभी भी भारत दुनिया के सर्वाधिक बिजली वंचित लोगों की श्रेणी में है। देश के लगभग 34.5 करोड़ लोग अभी भी बिजली के बिना हैं। यह संख्या दुनिया में किसी एक देश में बिना बिजली के रहने वाले लोगों में सर्वाधिक है। अतः नयी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती “सबके लिए मुनासिब दाम पर बिजली“ मुहैय्या कराना है। यू पी ए सरकार ने नारा दिया था - 2012 तक सबको बिजली जो पूरी तरह विफल रहा। यू पी ए सरकार की विफलता का मुख्य कारण गलत ऊर्जा नीति, क्रियान्वयन की विफलता और सही फैसले लेने में राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी रही है।

उन्होंने कहा कि गलत ऊर्जा नीति का तात्पर्य यह कि नए बिजली घरों के निर्माण में निजी घरानों पर अतिनिर्भरता जिसके चलते बिजली उत्पादन का लक्ष्य पिछड़ता चला गया। अभी नयी लगने वाली परियोजनायों में लगभग आधी क्षमता की परियोजनाएं निजी क्षेत्र में है। दस बड़े घरानों के पास इनमे से अधिकाँश प्रोजेक्ट हैं। निजी घरानों की दिलचस्पी मुनाफा कमाने में है अतः इनकी उत्पादन लागत एन टी पी सी और राज्यों के सरकारी बिजली घरों की तुलना में काफी अधिक आती है। उदहारण के तौर पर रोजा की लगत रु 6.06 प्रति यूनिट है जबकि इसी क्षमता की सामान इकाई से हरयाणा में सरकारी क्षेत्र में लगत रु 3.38 प्रति यूनिट है। यह अंतर दर्शाता है कि निजी क्षेत्र की बिजली महंगी है, राष्ट्रीय स्तर पर यही हाल है सबसे सस्ती बिजली राज्य के सरकारी बिजली घरों की फिर एन टी पी सी की और सबसे महंगी निजी क्षेत्र की ।इसी लिए अति विशाल बिजली परियोजनाएं (अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट) स्थापित करने का निर्णय लिया गया जिनके लिए म प्र में सासन, झारखण्ड में तिल्लैय्या और आंध्र प्रदेश में कृष्णापटनम में रिलायंस को तथा गुजरात में मूंदड़ा में टाटा को ये परियोजनाएं प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग के जरिये दी गयीं। बिडिंग में सस्ती दरें देकर इन्होने प्रोजेक्ट तो ले लिए किन्तु बाद में केंद्र सरकार के साथ मिलीभगत के चलते अब टैरिफ बढ़वाने में सफल हो गए तो बिडिंग का मकसद ही ख़त्म हो गया। रिलायंस ने तिल्लैय्या और कृष्णापटनम में टैरिफ बढ़वाने हेतु दबाव बनाने के लिए काम रोक रखा है, सासन में प्लांट को पूरी क्षमता पर नहीं चला रहा है तो टाटा ने मूंदड़ा में दरें बढ़वा ली हैं। इन मामलों पर कड़ा रुख अपनाने के साथ नयी सरकार को राज्य, एन टी पी सी और निजी क्षेत्र के बीच उत्पादन क्षमता का अनुपात ऐसा रखना होगा जिससे बिजली की दरें बहुत महंगी न हों। राज्य और केंद्र के सरकारी क्षेत्र में कम से कम 70 प्रतिशत उत्पादन क्षमता होनी चाहिए तभी बिजली दरें नियंत्रण में रह सकेंगी। बिडिंग के बाद किसी भी सूरत में बिजली दरें पुनरीक्षित न की जाएँ। कोयला उपलब्ध कराना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी क्योंकि देश में प्रचुर मात्रा में कोयला होने के बावजूद कृत्रिम कोयला संकट की आड़ में कोयला आयात किया जा रहा है जिससे उत्पादन लागत में भारी वृद्धि हो रही है।

उन्होंने कहा कि वितरण के क्षेत्र में घाटे के मुख्यतया दो बड़े कारण हैं। एक महंगी बिजली खरीद जिसे ऊपर बताये गए तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। दूसरा कारण लाइन हानियाँ हैं जिसमें बड़ा हिस्सा बिजली चोरी का होता है। लाइन हानियाँ कम करने के लिए यू पी ए सरकार ने वितरण फ्रेंचायज़ी का प्रयोग किया जो विफल रहा क्योंकि फ्रेंचायज़ी के लिए बिजली के इंतजाम की जि़म्मेदारी बिजली निगमों की है जो महंगी बिजली खरीद कर फ्रेंचायज़ी को सस्ते दाम में बेचने में और घाटा उठा रहे हैं। उ प्र में आगरा इसका ज्वलंत उदहारण है जिस पर सी ए जी ने अपनी रपट में कई सवाल उठाये हैं। दूसरी ओर गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु कर्णाटक, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे सरकारी क्षेत्र के कई निगम हैं जहाँ लाइन हानियाँ 15 प्रतिशत या कम हैं। अतः उ प्र, बिहार जैसे कुछ प्रान्तों में वही तकनीक अपनाई जाये जो अन्य राज्यों में की जा रही है। दरअसल बिजली के मामले में “वोट और नोट“ की राजनीति से ऊपर उठकर दृढ राजनीतिक इक्षाशक्ति का परिचय देना होगा तभी सुधार होगा।

एक और बात यह कि ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती बिजली बिजली निगमों के घाटे का मुख्य कारण है। अतः देश के चारों हिस्सों में केंद्र सरकार चार अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट इस दृष्टि से लगाये कि इनकी सस्ती बिजली पर पहला हक सम्बंधित क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों का ही हो तो ग्रामीण क्षेत्रों को बिजली तो मिलेगी ही वह भी सस्ती ।इसकी सब्सीडी का बोझ केंद्र सरकार उठाये तो ग्रामीण बिजली की सब्सीडी के नाम पर हो रहे घोटाले और राजनीति दोनों पर अंकुश लगेगा।

और सबसे महत्वपूर्ण यह कि बिजली एक जटिल तकनीकी विषय है अतः नयी सरकार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में तत्काल ऊर्जा एक्सपर्ट्स की एक हाई पावर कमेटी बनाये जिसकी अनुशंसा को दृढ इच्छा शक्ति व कठोर माॅनीटरिंग कर लागू किया जाये तो भारत बिजली के मामले में आत्म निर्भर बनेगा साथ ही सबको मुनासिब दाम पर बिजली मिल सकेगी।

नॉर्दर्न इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन ने एक अन्य प्रस्ताव में केंद्र व राज्यों की बिजली कम्पनियों के सी एम् डी पदों व प्रमुख सचिव ऊर्जा के पदों पर योग्य बिजली इंजीनियरों की तैनाती की मांग की है। फेडरेशन ने यह भी कहा कि अधिक से अधिक नयी बिजली परियोजनाएं राज्य के सरकारी क्षेत्र में दी जाएँ जिससे राज्य बिजली के मामले में आत्म निर्भर हो सकें साथ ही आम लोगों को सस्ती बिजली मिल सके।