नई दिल्ली। लगता है लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा में नेता विपक्ष का पद न दिए जाने पर देश की सर्वोच्च अदालत को सरकार की असल मंशा पर शक हो गया है।
लोकपाल की नियुक्ति के मकसद से विपक्ष के नेता सम्बंधी नियम की व्याख्या करने पर उच्चतम न्यायालय आज राजी हो गया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने केंद्र से इस मामले में दो सप्ताह में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। इस मामले को जल्द निपटाने का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संसद में नेता विपक्ष का पद बेहद अहम होता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता और आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण ने इस मामले में याचिका दायर करते हुए केंद्र से जवाब की माँग की थी कि लोकपाल के सदस्यों के चुनाव में देरी क्यों हो रही है। पिछले साल दिसम्बर में पारित लोकपाल बिल के मुताबिक इसमें 9 सदस्य होंगे, जिसमें से चार पूर्व या वर्तमान जज होंगे।

लोकपाल के सदस्यों को चुनने वाली कमिटी में प्रधानंमत्री और अन्य लोगों के अलावा नेता विपक्ष को भी सदस्य बनाया जाना है। इस पद के महत्व पर जोर देते हुए मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा की बेंच ने कहा कि विपक्ष का नेता सदन में सरकार से अलग स्वर का प्रतिनिधित्व करता है। बेंच ने कहा कि लोकपाल कानून के तहत एलओपी एक महत्वपूर्ण घटक है और मौजूदा राजनीतिक स्थिति में इस मुद्दे पर वस्तुनिष्ठ विचार की जरूरत है, जहाँ लोकसभा में कोई विपक्ष का नेता नहीं है।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा, 'नेता विपक्ष का मुद्दा न केवल लोकपाल में प्रासंगिक है बल्कि यह मौजूदा और आगामी विधेयकों के मामले में भी महत्वपूर्ण है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले को लम्बा नहीं खींचा जा सकता और विधान को ठण्डे बस्ते में नहीं डाला जा सकता। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही मामले के अंतिम निपटान के लिए नौ सितंबर की तारीख तय कर दी।
भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के उद्देश्य से लाए गए लोकपाल बिल के अनुसार लोकपाल चयन समिति में नेता विपक्ष भी सदस्य होता है और किसी भी विपक्षी पार्टी के पास लोकसभा में 10% सदस्य संख्या नहीं होने की वजह से स्पीकर ने फैसला दिया कि है नेता विपक्ष का पद नहीं होगा। इस मसले पर एक बार फिर संसद् और न्यायपालिका के बीच टकराव हो सकता है
ये है मामलाकांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के सामने दावा किया था कि उसे नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी मिलनी चाहिए। कानून मंत्रालय ने कांग्रेस की इस मांग पर अटॉर्नी जनरल की राय मांगी। अटॉर्नी जनरल के मुताबिक नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए किसी भी पार्टी के पास न्यूनतम 10 फीसदी सांसद होने चाहिए। कांग्रेस के इस दावे को कि उसके गठबंधन यूपीए के पास कुल मिलाकर 10 फीसदी से ज्यादा सांसद हैं, अटॉर्नी जनरल ने खारिज कर दिया। अटॉर्नी जनरल की इस राय पर बीजेपी नेता राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि एजी के मुताबिक पुरानी परंपराओं के तहत कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं मिल पाएगा। ऐसी परिस्थिति में लोकसभा अध्यक्ष के लिए एजी की राय के विरुद्ध जाना काफी कठिन होगा। कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर मनीष तिवारी ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष का पद संवैधानिक है। कांग्रेस को इसे देने से इनकार करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कुचल देगा। बता दें कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में 543 में से 44 सीटें ही मिली हैं जबकि सत्तापक्ष का कहना है कि प्रतिपक्ष के नेता पद का वैधानिक दर्जा हासिल करने के लिए उसे कम से कम दस प्रतिशत सीटों यानी 54 सीटों की दरकार थी।