बिहार चुनाव - अब समय संघ और भागवत का है
बिहार चुनाव - अब समय संघ और भागवत का है
नई दिल्ली। बिहार चुनाव परिणाम आने के तुरन्त बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की। इस मुलाकात के निहितार्थ पर प्रकाशडाल रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र मिश्रा -
जिस बात की आशंका थी वही होता दिख रहा है। जिस व्यक्ति को बीजेपी की हार के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है, जिसे सबसे ज्यादा आत्मरक्षक होना चाहिए था, वही सबसे ज्यादा सक्रिय और निश्चिंत दिख रहा है।
हम बात कर रहे हैं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की। कल उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की है। इसके पहले बिहार के नजीते आने के दिन ही उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी। कल पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से भी वह मिले हैं (बताया जा रहा है कि एक बार फिर आरक्षण पर बात की है)।
क्या आज तक किसी सरसंघचालक को राष्ट्रपति से मिलते आपने देखा या सुना है। वह भी ऐसे मौके पर जब हार का ठीकरा उसके सिर फूटने की आशंका हो। एक ऐसे राष्ट्रपति से जो लगातार संघ के प्रिय सांप्रदायिक एजेंडे की मजम्मत कर रहा हो।
दरअसल यह एक लाक्षणिक मुलाकात है। इसके मायने बहुत दूर तक जाते हैं। राजनीतिक पंडित अगर समझने की कोशिश करें तो। भागवत के आरक्षण के बयान ने किस कदर बीजेपी को क्षति पहुंचाई है ये बात अब किसी से छुपी नहीं है। बावजूद इसके पार्टी में हाशिये के चंद हुकुमदेवों और अश्वनी चौबों के अलावा किसी बड़े की जुबान खोलने की हिम्मत नहीं पड़ी। पूछे जाने पर जेटली ने यह कहते इसे खारिज कर दिया कि कोई एक बयान किसी चुनाव का फैसला नहीं करता।
मैंने 27 सितंबर को ही फेसबुक पर बातचीत करते इस तरफ इशारा कर दिया था। इसमें मैंने कहा था कि “मोहन भागवत का बयान सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दरअसल भागवत इस समय केवल बिहार नहीं बल्कि पूरे देश को लेकर अपनी रणनीति बना रहे हैं। संघ किसी तात्कालिकता में फंसने की जगह अपने दूरगामी एजेंडे पर काम कर रहा है सबसे पहले उसकी प्राथमिकता में अपने विश्वसनीय आधार सवर्णों के प्रतिक्रियावादी हिस्से की गोलबंदी है जिसकी पीठ पर सवार होकर वो अपने भविष्य के लक्ष्य (हिंदू राष्ट्र) को हासिल करने का सपना देखता है। इस काम के लिए आरक्षण विरोध से बड़ा हथियार कोई दूसरा नहीं हो सकता है। इसके पूरा होने के बाद सत्ता और इन्हीं ताकतों के सहयोग से पूरे देश में सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जाएगी। जिसमें आरक्षण विरोध से नाराज पिछड़े तबके भी मुस्लिम विरोध के नाम पर उस उन्माद का हिस्सा बन सकते हैं।
बिहार में संघ आरक्षण के तीर से दो निशाने साधना चाहता था। पहला बिहार में हार के बाद मोदी के पंख कट जाएंगे और संघ के लिए मोदी को काबू में रखना आसान हो जाएगा। दूसरा हार या जीत दोनों स्थितियों में संघ मोदी और सरकार पर अपने असली सांप्रदायिक एजेंडों को लागू करने का दबाव बनाना शुरू कर देगा। जीतने के बाद ये काम पूरे जोशो खरोश से होगा और हारने के बाद मजबूरीवश किया जाएगा। लिहाजा संघ के दोनों हाथ में लड्डू है”।
अब जब दूसरी स्थिति खड़ी हो गई है तो भागवत सक्रिय हो गए हैं। अनायास ही नहीं चुनाव के बाद नागपुर जाना पसंद करने की जगह वह दिल्ली में रुक गए हैं और उन्होंने कमान अपने हाथ में ले ली है। क्योंकि अब समय संघ और भागवत का है।


