बिहार में जबर्दस्त उठापटक, संवैधानिक संकट
बिहार में जबर्दस्त उठापटक, संवैधानिक संकट
बिहार में जबर्दस्त उठापटक, मांझी ने की विधानसभा भंग करने की सिपारिश, नीतीश फिर चुने गए विधानमंडल दल के नेता
नई दिल्ली (हस्तक्षेप डेस्क)। बिहार में सियासी तापमान अचानक बढ़ गया है। सत्तारूढ़ जनतादल(यू) में फूट सतह पर आ गई है। बिहार में जबर्दस्त उठापटक के बीच एक तरफ मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने जहां विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी है वहीं जद(यू) ने नीतीश कुमार को अपनी नया नेता चुन लिया है। मांझी मंत्रिमंडल के 28 में से 21 मंत्रियों ने विधानसभा भंग करने के मांझी के प्रस्ताव को इंकार कर दिया है जिसके बाद राज्य में अस्थिरता का महौल बन गया है। सभी की निगाहें राजभवन की तरफ लगी हुई हैं। उधर केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में भाजपा की कोर कमेटी की बैठक हो रही है, इस बैठक में अमित शाह, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेता कई नेता मौजूद बताए जाते हैं। समझा जाता है राज्यपाल का निर्णय केंद्र से इशारा मिलने के बाद आएगा।
बीबसी ने खबर दी है कि जदयू विधायक दल की बैठक में नीतीश कुमार को विधायक दल का नेता चुना गया है। यह बैठक शाम को चार बजे से शुरू हुई थी।
इससे पूर्व शनिवार को दोपहर बुलाई गई कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने विधानसभा को भंग करने का प्रस्ताव रखा जिस पर वहां मौजूद 28 मंत्रियों में से 21 ने प्रस्ताव का समर्थन नहीं करते हुए बैठक का बहिष्कार कर दिया। जबकि 7 मंत्री बैठक में मौजूद रहे। मांझी को समर्थन देने वाले नेताओं में प्रमुख है नरेंद्र सिंह, बृज बिहारी, वृषिन पटेल, भीम सिंह, सईद अली खां और नीतीश मिश्र प्रमुख हैं।
बिहार सरकार के संसदीय कार्यमंत्री श्रवण कुमार ने पटना में मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि आगे की रणनीति तय करने के लिए भी नीतीश कुमार को ही अधिकृत किया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जदयू की आज की बैठक में उसके 111 में से 97 विधायक शामिल हुए, जबकि 41 विधान पार्षदों में से 37 पार्षद इसमें शामिल हुए।
खबर है कि मांझी मंत्रिमंडल के 19 मंत्रियों ने भारत के राष्ट्रपति और बिहार के राज्यपाल को पत्र लिखकर यह आग्रह किया है कि वे जीतनराम मांझी के विधानसभा भंग करने की सिफारिश पर विचार न करें। दूसरी ओर बिहार भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी ने दोहराया है कि पार्टी के सारे विकल्प खुले हैं और उसकी पल-पल पर नजर है।
समझा जाता है कि राज्यपाल का फैसला 10 फरवरी के बाद आएगा, क्योंकि दिल्ली के विधानसभा चुनाव के नतीजों का असर बिहार की राजनीति पर भी पड़ना तय है। यदि दिल्ली में भाजपा पस्त हो जाती है तो संभवतः केंद्र सरकार बिहार में अभी हस्तक्षेप न करे, लेकिन दिल्ली में अगर भाजपा फतह कर लेती है तो बिहार में चुनाव ही रास्ता होगा।


