बिहार में सपा का हठयोग, जो सच था, वह हो गया
बिहार में सपा का हठयोग, जो सच था, वह हो गया
नई दिल्ली। जो सच था, वह हो गया। सच यह है, कि समाजवादी कभी भी एक साथ खड़े नहीं हो सकते, कारण सभी पार्टियां व्यक्तिवादी हैं और परिवार के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। राजनीति का आधार नीतियां नहीं, जातियां हैं। आश्चर्य इस बात का नहीं है, कि ये अलग-अलग हो गए, आश्चर्य तो उस समय हुआ था, जब साथ आए थे। अगर टूटन आज नहीं होती, तो उत्तर प्रदेश चुनाव के समय होती, क्योंकि उस समय समाजवादी पार्टी जदयू और राजद को इतनी भी सीट देने को तैयार नहीं होता, जितनी उन्हें बिहार में मिल रही थीं।
जब यह गठबंधन हुआ था, तब भी इसके पीछे राजनैतिक महत्वाकांक्षा थी। मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने की चाहत ने जोर मारा था, उनकी पार्टी उस समय भी इसके खिलाफ थी। पहली कोशिश तो यह की गई, कि इस गठबंधन का नाम और चुनाव चिन्ह समाजवादी पार्टी का रखा जाए, जिस पर सहमति नहीं बन पाई। उसके बाद अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव ने इसका विरोध शुरु कर दिया। अखिलेश नहीं चाहते, कि राज्य में और कुछ समाजवादी नेता खड़े हों।
रामगोपाल यादव के विरोध का कारण राज्यसभा की कुर्सी थी, वे गठबंधन से पहले अपनी पार्टी के नेता थे, बाद में शरद यादव को बना दिया गया।
सपा ने इस प्रकार की राजनीति पहली बार नहीं की है, इससे पहले भी वे करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जिन वामपंथियों से वे समर्थन लेते थे, उसी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मित्रसेन यादव के नेतृत्व में उन्होंने पार्टी को तोड़ दिया था। परमाणु करार का मुद्दा हो या रिटेल में एफडीआई का मुद्दा, सपा ने आखिरी वक्त पर विपक्ष की एकता को तोड़ा और मनमोहन सिंह सरकार का साथ दिया था।
बहरहाल लोहिया ने समाजवाद का जो विचार दिया है, उसे राजनैतिक दल अपने हिसाब से अजमा रहे हैं। उन्हें पूंजीवाद का खुला समर्थन करने की छूट है, कांग्रेस विरोध के नाम पर भाजपा का साथ देने और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कांग्रेस का साथ देने की भी छूट है।
अब सवाल है, समाजवादी पार्टी के इस कदम से क्या असर पड़ने वाला है। साफ तौर पर तो समझ में नहीं आता, क्योंकि सपा का अपना कोई आधार बिहार में नहीं है। पिछली बार भी सपा वहां अलग चुनाव लड़ी थी और एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। उत्तर प्रदेश को छोड़कर समाजवादी पार्टी कहीं भी चुनाव लड़ती है, तो उसकी नजर भगोड़ों पर होती है, इनमें से कुछ चुनाव जीत भी जाते हैं तो वे साथ नहीं रहते मूल पार्टी में वापस चले जाते हैं। मप्र में एक समय सपा के पास 7 विधायक होते थे, आज एक भी नहीं है। हालांकि सपा ने एक काम इस दौर में जो महत्वपूर्ण किया, वह जदयू और राजद को एक साथ करने का है। सीटों के बंटवारे से लेकर नेता तक की लड़ाई को सुलझाने में मुलायम सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
लोकसभा चुनाव के दौरान हुए मतविभाजन पर नजर डालें, तो राजद, जदयू और कांग्रेस तीनों का मत प्रतिशत भाजपा गठबंधन से अधिक है। बाद में उस चुनाव के दौरान जब ये तीनों दल एक साथ मिलकर लड़े, तो इन्होंने भाजपा गठबंधन को बुरी तरह हराया भी था।
साफ है, नीतीश कुमार का जोर भी इन तीनों को साथ लाने पर ही अधिक रहा होगा, जिसमें उन्होंने सफलता भी हासिल कर ली। हालांकि कई समाजवादी नेता इस बात से भी नाराज हैं, कि राकांपा और वामदलों को भी इस गठबंधन में शामिल किया जाना चाहिए था, हो सकता है, सपा के बाहर जाने से उनकी नाराजगी और बढ़ेगी।
यह सही है, कि सपा के जाने से वोटों पर अंतर नहीं पड़ेगा, पर मनोवैज्ञानिक दबाव जरूर पड़ेगा और भाजपा को एक मौका मिलेगा, जिसका फायदा उठाने की शुरुआत भाजपा ने कर भी दी है।
मुलायम सिंह की पार्टी का यह कहना, कि सीटों के बंटवारे से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई, इस बारे में फिलहाल तो कुछ नहीं कहा जा सकता, पर इतना सच है, कि हर निर्णय से पहले मुलायम सिंह से राय अवश्य ली जाती थी। जब नेता का मुद्दा नहीं सुलझा था, तब भी मुलायम सिंह ने ही हस्तक्षेप किया था। उस समय लालू प्रसाद यादव ने कहा था, कि वे जहर पी लेंगे, पर मुलायम सिंह ने जो तय कर दिया है, उससे पीछे नहीं हटेंगे।
यह बात भी सच है, कि गठबंधन की जरूरत लालू प्रसाद को सबसे अधिक है, लगातार 10 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद कार्यकर्ताओं को एक जुट रखना मुश्किल हो जाता है, दूसरा उन्हें अपनी अलगी पीढ़ी को भी स्थापित करना है। सीटों के बंटवारे पर भी दोनों पार्टियों ने काफी संयम से काम लिया है। नीतीश के पास वर्तमान में करीब 125 विधायक हैं और लोकसभा चुनाव में मिले मतप्रतिशत के आधार पर लालू की पार्टी को करीब 140 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए था। दोनों दलों में इस बात को लेकर लंबे समय तक बहस भी चलती रही, अंत में दोनों 100-100 सीटों पर लड़ने को राजी हो गए। कांग्रेस को दी गई 40 सीटों पर हालांकि कई समाजवादी नेताओं को ही आपत्ति है।
यहां यह बात याद रखना चाहिए, कि कांग्रेस की सीटें भले ही बिहार में कम हो गई हों, पर उसका आधार अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कई नेताओं का मानना है, कि कांग्रेस को जो सीटें दी गई हैं, उन्हें कम करके दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों को दी जा सकती थीं।
बहरहाल इस पूरे सियासी संकट पर भाजपा चुटकी लेने में लगी है, पर उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अभी तक उनका गठबंधन सीटों का बंटवारा तक नहीं कर पाया है। हर दिन घटक दल भाजपा को सीमा में बांधने की कोशिश करते नजर आते हैं। क्षेत्रीय दलों की वहां पर भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। हो सकता है, केन्द्र में सत्ता होने का फायदा उठाकर भाजपा अपने गठबंधन में उपजने वाले किसी भी विद्रोह को दबाने में सफल हो जाए, पर संकट उसके सामने भी कम नहीं हैं।
भारत शर्मा


