जुगनू शारदेय
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बिहार से झारखंड निकल जाने के बाद बचे खुचे बिहार में वन की हालत खराब से खराब होती जा रही है । इस खराबी के लिए राजनीतिक स्तर पर जिम्मेदार लालू काल के पर्यावरण एवं वन मंत्री जगदानंद के साथ साथ नीतीश काल में भारतीय जनता पार्टी के खाते से बने 2005-2010 के बीच के दो मंत्री और अभी स्वंय बिहार के उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी हैं । विभागीय स्तर पर इसके लिए जिम्मेदार बिहार के प्रधान मुख्य वन संरक्षक बशीर अहमद खान हें । खान लगभग 10 सालों से बिहार के मुख्य वन संरक्षक ( विकास ) भी रहे हैं । आज भी इसी ओहदे पर हैं । इसके साथ साथ वह बिहार के जैव विविधता संरक्षण परिषद के अध्यक्ष भी हैं । यह खान की किस्मत का ही कमाल है कि उनसे वरिष्ठ अधिकारी बी एन झा ऊब कर बिहार से बाहर केंद्रीय नियुक्ति पर हैं ।
झा सक्षम अधिकारी रहे हैं और यह समझ चुके थे कि बिहार का राजनीतिक और नौकरशाही नेतृत्व यह मान कर चलता है कि बिहार के विकास में वन की कोई भूमिका नहीं है । अपनी समझ के बल पर वन्यजीव प्रबंधन को समझने वाले अधिकारी भारत ज्योति को तरक्की के बाद सचिवालय के किसी सड़े से विभाग में इतना सड़ाया गया कि आज वह केरला के एक वैज्ञानिक संस्थान में रजिस्ट्रार हो गए ।
बिहार में जैव विविधता संरक्षण परिषद के अध्यक्ष पद के लिए काबिल व्यक्तियों की कमी होने के बावजूद योग्य लोगों की कमी नहीं है । मुख्य मंत्री के मित्र मंडली के उदयकांत मिश्र और पूर्व अफसर मंडली के रामचंद्र प्रसाद सिंह सहित डॉलफिन मैन के रूप में विख्यात प्रोफेसर आर के सिंहा योग्यता के मानदंडों पर खरा उतरते हैं । लेकिन बिहार के राजनीतिक नेतृत्व को इसकी फुरसत कहां । मुख्य मंत्री तो अपने पेड़ लगाओ में मगन हो गए हैँ और पर्यावरण और वन विभाग के प्रभारी मंत्री उप मुख्य मंत्री सुशील कुमार मोदी अपनी पार्टी भाजपा की परंपरा में एक असंभव सी कल्पना की दुनिया में जीते हुए वन विभागीय जंगली अफसरों की चांडाल चौकड़ी में घिरे है । यह बिहार की नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व का महान सोच है कि एक ही व्यक्ति के अधिकारी तो दुहरे - तिहरे बोझ से इतने दबे हैं कि या तो अपना काम
कामचलाउ ढंग से निपटाते हैं या टरकाने की कोई न कोई नई परिभाषा बना लेते हैं । इस प्रसंग में यह दावा किया जाता है कि आइएएस अफसरों की कमी है ।
लेकिन बिहार में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों की कोई कमी नहीं है । कमी है तो काबिलयत की लेकिन उन्हें इसकी समझ है कि लूट की छूट कैसे प्राप्त करें । भारतीय वन सेवा के 37 अधिकारी बिहार में हैं । उनमें से काफी लोग वन सेवा के बजाए बिहार के दूसरे विभागों में लगाए गए हैं ।
एक स्तर पर तो झारखंड के बंटवारे के बाद तो एक आइएएस ने यहां तक सलाह दी कि बिहार में वन विभाग को ही खत्म कर दिया जाए । बहरहाल बिहार में अपने
संपूर्ण अक्षमता के साथ वन विभाग है । यहां कुछ ऐसे अफसरों का गिरोह जमा हुआ है जो जानता है कि पेड़रोपण के नाम पर कैसे पैसा कमाया जा सता है ।
शायद यह भी एक कारण है कि बिहार के मुख्य मंत्री ने पेड़रोपण से अपनी पार्टी को जोड़ दिया । अभी तो खान ने ऐसी योजना बनाई है , हालांकि यह योजना खान के दिमाग की नहीं बल्कि वन विभाग के चतुर अफसर के चालाक दिमाग की उपज है । आंध्र प्रदेश निवासी खान तो अपने रिटायरमेंट के इंतजार में बिहार में दिन काट रहा है । फिर भी वह मजबूर है कि बिहारवासी चतुर अधिकारियो की हां में हां मिला कर अपना दिन काट ले। अभी हाल में खान ने एक बयान में स्वीकार किया है कि ' किसी भी मानक पर बिहार का वन छाजन का प्रतिशत संतोषजनक नहीं है । ' बिहार का वन दायरा महज 7.23 प्रतिशत है ।
इसमें भी जानकारी दी जाती है कि प्राकृतिक वन सिर्फ 6.8 प्रतिशत क्षेत्र में है । हालंकि यह प्राकृतिक वन क्या होता है । बिहार ही नहीं पूरे देश में अंग्रेज काल में वनों की कटाई शुरू हो चुकी थी । तथाकथित प्राकृक वन तीसरी पीढ़ी के रोपित वन हैं । बिहार का इकलौता टाइगर रिजर्व वाल्मिकी टाइगर रिजर्व बनने के पहले बिहार राज्य वन विकास निगम का इलाका था । वन विकास निगम से लगता है कि य निगम वनों के विकास का काम करता है । लेकिन देश भर में वन विकास निगम पेड़ों को काट कर बेचने का काम और कटे पेड़ों के खाली जगह पर पेड़ लगाने का काम करता है । वन विकास निगम के काल में ही वाल्मिकी में झाड़ू घास ( फिनिक्स ) लगाए गए जिससे घास के मैदान पनप नहीं सकते । जंगल में आग लगने की संभावना भी ज्यादा होती है । फिर घास का मैदान नहीं तो घासखोर पशु नहीं । और घासखोर पशु नहीं तो बाघ कहां से होगा । वह तो वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की मेहरबानी है कि उसके कार्य़कर्ता समीर और उनके सहयोगी इसका किसी प्रकार से प्रबंधन कर रहे हैं । राज्य सरकार के स्तर पर तो भारत ज्योति के बाद यहां चुन चुन कर समझदार अफसरों को भेजा जाता है ।
अपने देश आदर्श छलावों का देश है । इस छलावा ने यह तय किया है कि देश का 33 प्रतिशत भूभाग में वन होना चाहिए । तमाम नीतियां ऐसी बनाईं जाती हैं कि वन और वनवासी समाप्त हों । सच तो यह है कि 10 से 20 प्रतिशत भूभाग भी पेड़ों से हरा भरा हो तो देश शान से तथाकथित ग्लोबल वार्मिंग से बच सकता है । लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज के कारोबारियों नें ग्रीन इंडिया का एक ऐसा हौवा खड़ा कर दिया है कि लूट और बड़ी बड़ी बातों की छूट मिलती रहे । इन्हीं बड़ी बड़ी बातों के क्रम में खान जानकारी देते हैं कि बिहार के 38 में से 11 जिलों - कैमूर ,रोहतास ( कभी यह दोनों एक ही जिला होता था ) गया , औरंगाबाद , जहानाबाद और नवादा ( यह भी कभी एक ही जिला होता था ) जमुई , बांका और मुंगेर ( यह भी एक ही जिला होता था ) पश्चिम चंपारण और नालंदा ( मुख्य मंत्री का गृह जिला ) में ही तथाकथित कुदरती जंगल हैं । इसमें भी सिर्फ पश्चिम चंपराण में ही 70 प्रतिशत घना जंगल है । यही वह क्षेत्र है जहां कुप्रबंधन से भरा वाल्मिकी टाइगर रिजर्व है ।
अब यहां खान उवाच कि हम कड़ी मेहनत कर रहे हैं कि अगले पांच साल में इस वन छाजन को 15 प्रतिशत तक पहुंचा दें । झारखंड अलग हो जाने के 10 साल में
कुछ न कर सके तो अगले 5 साल में करंगे क्योंकि साल दो साल में खान रिटायर हो चुके होंगे और बिहार के चतुर सुजान जंगली अधिकारी सी ए जी को कुछ अवसर
प्रदान कर सकेंगे । इस वित्तीय वर्ष में बिहार के वन विभाग का बजट 44 करोड़ 62 लाख का है ।
इस विभाग की कार्य क्षमता का यही नमूना काफी है कि पिछले वर्ष का बजट 49 करोड़ था जिसमें से 34 करोड़ ही खर्च हो पाया । बिहार को हरा भरा बनाने वाली सरकार ने ही 49 करोड़ को घटा कर 42 करोड़ 97 लाख कर दिया । बिहार के वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ही बिहार के पर्यावरण एवं वन मंत्री है ।
इसके बाद यह समझने की कोई जरूरत नहीं है कि बिहार का वन विभाग कितनी काबलियत के साथ काम करता है । अपनी योग्यता का खान बखान भी करते हैं कि
पिछले तीन साल में वन विभाग ने 2 करोड़ 37 लाख पेड़ रोपण किया जिसमें से सिर्फ पटना में 35 हजार से ज्यादा पेड़ लगाए गए । इसके बाद भी मुख्य मंत्री को पेड़ रोपण में अपनी पार्टी को शामिल करना पड़ रहा है । इसका एक मतलब यह भी होता है कि मुख्य मंत्री नीतीश कुमार वन विभाग का सच समझ चुके हैं । पर सच यह है कि वह इस विभाग में लूट की छूट को नहीं समझ पाए हैं ।
अगर वह समझना चाहें तो अपने ही प्रधान मुख्य वन संरक्षक का बयान पढ़ लें कि इस साल 11 हजार हेक्टर बरबाद जंगलों को 20 करोड़ 77 लाख के खर्च से पेड़
से भर दिया जाएगा । यानी लगभग 2 करोड़ प्रति हेक्टर का खर्च । सड़क और नहरों के किनारे पेड़ को बचाने के लिए 13 हजार गैवियन लगभग 3 करोड़ 80 लाख
के खर्च पर लगाए जाएंगे । यानी एक गैवियन पर लगभग 22 सौ रुपए का खर्च ।
पता नहीं मुख्य मंत्री के पार्टी के कार्य़कर्ता या स्वंय मुख्य मंत्री ने अपने गांव कल्याण बिगहा में जो पेड़ लगाया है उसके बचाव के लिए इतना खर्च करेंगे क्या । सरकारी दावा है कि 9 लाख से ज्याद छात्रों ने पेड़ लगाया है जिन्हें तीन साल में 3 सौ रुपए मिलेंगे । यह समझना भी जरूरी है कि 1 हेक्टर में कितने पेड़ लग सकते हैं । एक दम घना जंगल बनाना हो तो दो गुणा दो मीटर के फारमूले से लगभग 2500 पौधों का रोपण हो सकता है और दो गुना तीन मीटर के तर्ज पर लगभग 1700 से पौधे लग सकते हैं । इसमें पौधों की कीमत , मजदूर की गड्ढा खोदने की मजदूरी और तार से घेरा बंदी मिला कर ज्यादा से ज्यादा 15 से 25 लाख का खर्च आ सकता है ।
बिहार के सिलसिले में यह भी जरूरी हो जाता है कि इन बरबाद जंगलों में ऐसे पौधे लगाए जाएं जिनके नीचे घास भी उग सके और उन पौधों के फल लघु वनोपज की
श्रेणी में रखा जाए ताकि उसके आसपास के गांव वाले उन फलों से अपना जीवन यापन भी कर सकें । इन पौधों में महुआ , आंवला , बेल और जामुन आदि हो सकते
हैं । अन्य राज्यों के समान बिहार भी नीलगाय के हमलों से परेशान है । आज नहीं तो कल इन्हीं जंगलों में नीलगाय आदि को ट्रांसलोकेट करना होगा ।
वहां उन्हें घास नहीं मिलेगा तो फिर उनका हमला किसान के खेत की फसल पर ही होगा ।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक बी ए खान ने हर बात की चर्चा की लेकिन कॅम्पा फंड की चर्चा नहीं कि । यह फंड सूद समेत अभी लगभग 4 सौ करोड़ के आस पास पहुंच चुका है । इस फंड की जिम्मेदारी जिन लोगों को सौंपी गई है उन पर झारखंड बनने के पहले मामूली सी रकम के गबन का आरोप भी लग चुका है । बिहार के वन विभाग को धन्यवाद कि मुख्य मंत्री विरोधियों को अपनी लूट में छूट नीति के कारण एक और मुद्दा अगले साल देने में वन विभाग सबसे आगे होगा या अपनी परंपरा के अनुसार कोई काम ही नहीं करेगा ।