बीजेपी की दकियानूसी सोच का ख़मियाजा पूरे देश को उठाना पड़ रहा है
बीजेपी की दकियानूसी सोच का ख़मियाजा पूरे देश को उठाना पड़ रहा है
बीजेपी की दकियानूसी सोच और समझ का खामियाजा पूरे देश को उठाना पड़ रहा है
महेंद्र मिश्र
एक कहानी प्रचलित है। इसकी ऐतिहासिकता के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन वह बेहद मौजूं है।
बाबर और इब्राहिम लोधी की सेनाएं जब पानीपत के मैदान में मोर्चे पर डटी थीं, तो शाम को भोजन के वक्त बाबर ने दुश्मन सेना के खेमे में कई जगहों पर आग जलते देखी। पूछने पर पता चला कि लोधी के सैनिक अलग-अलग चूल्हों पर खाना पका रहे हैं। और यह सब कुछ जातीय भेदभाव और छूआछूत के चलते है। जिसकी वजह से सभी एक स्थान पर भोजन करने की जगह अलग-अलग पकाते और खाते हैं।
इसको देखते ही बाबर भीतर से बहुत खुश हुआ। और यह समझ गया कि उसके लिए युद्ध जीतना बहुत मुश्किल नहीं है। क्योंकि जातियों और समुदायों में विभाजित विपक्षी सेना उसके एकजुट हमलों का मुकाबला नहीं कर सकती है।
इसी तरह की एक तस्वीर कल सामने आई। जब सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेता ने खुलेआम विपक्षी नेताओं पर हमले शुरू कर दिए।
अमित शाह ने संवाददाता सम्मेलन में न केवल पूरे सर्जिकल स्ट्राइक के मामले को जनता के बीच ले जाने की बात कही। बल्कि कांग्रेस समेत आप और दूसरी विपक्षी पार्टियों को पाकिस्तानी तक करार दिया।
अगर बीजेपी के हिसाब से मूल्यांकन किया जाए तो फिर देश का दो तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के साथ है।
आप और उसके नेता केजरीवाल को तो वह पहले ही पाकिस्तानी करार दे चुकी है। कल कांग्रेस और उसके नेताओं को भी उसने पाकिस्तान के खेमे में डाल दिया। कम्युनिस्ट पहले से ही उनकी नजर में गद्दार हैं। देश का मुस्लिम तबका उनके निशाने पर होता ही है। अखलाक से लेकर अभिनेता नवाजुद्दीन की घटना इसकी ताजा मिसाल हैं। वायुसेना में काम करने वाला अखलाक का बेटा गद्दार और उसकी हत्या करने वाला रवि सिसोदिया देशभक्त।
केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में यही लकीर खीचीं गई है बिसहड़ा में।
दलितों से इनका 36 का रिश्ता जगजाहिर है। मायावती को गाली देने वाले दयाशंकर की बीबी की ताजपोशी ने एक बार फिर इसी बात को साबित किया है। और इस कड़ी में मामले का राजनीतिकरण कर बचे हुए हिस्सों को भी अपने खिलाफ खड़ा करने का रास्ता तैयार कर लिया गया है।
अभी ऐसे दौर में जब कि युद्ध की आशंकाएं बनी हुई हैं। क्या सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता से इस तरह की उम्मीद की जा सकती है?
ऐसे दौर में जबकि सबको एक रखकर संयुक्त रूप से दुश्मन का मुकाबला करने की जिम्मेदारी प्राथमिक तौर पर उसकी है। या फिर सबके भीतर दोष निकालकर उसे अपने आप से काटते जाना श्रेयस्कर होगा?
दरसअल यह विभाजन और नफरत की विचारधारा है। यह कहीं भी दुश्मन ढूंढ लेती है।
इसलिए देश के भीतर भी उसने अपने दुश्मनों की तलाश शुरू कर दी है। और क्योंकि इनका लक्ष्य सरहद की जंग से ज्यादा यूपी और पंजाब का चुनाव जीतना है। इसलिए सेना की उपलब्धियों का राजनीतिकरण इनकी मजबूरी बन गई है। और इस कड़ी में कदम ब कदम इनके नापाक मंसूबों की कलई खुलती जा रही है। लेकिन अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थों की खातिर सेना के इस्तेमाल के लिए इतिहास इन्हें कभी माफ नहीं करेगा। और इस कड़ी में अगर कहीं देश कमजोर होता दिखा। या फिर इसका किसी भी तरीके से सेना के ऊपर असर पड़ा। तो इसकी पूरी जिम्मेदारी बीजेपी की होगी। यह न केवल देश के हितों के खिलाफ होगा। बल्कि पार्टी का यह देशविरोधी रवैया ही इसके लिए जिम्मेदार होगा। क्योंकि देश की एकता को तोड़ने से बड़ा राष्ट्रद्रोह कोई दूसरा नहीं हो सकता है।
भारत के 2000 सालों के इतिहास में उसकी कमियों से भी ये सबक लेने के लिए तैयार नहीं हैं।
बाहरी आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर पाने के पीछे समाज का जातियों और समुदायों में विभाजन था। कोऊ नृप होय हमै का हानी की मानसिकता पूरे समाज को एकजुट होने से रोकती थी। और उसका नतीजा यह रहा है कि हमलों के बाद हमले होते रहे। और उन्हें रोकने तथा उनका मुकाबला करने के लिए देश में कोई कारगर ताकत और बल तैयार नहीं किया जा सका।
दरअसल बीजेपी अपनी पुरानी खोल और सोच से बाहर निकलने के लिए तैयार ही नहीं है। और एक बार फिर उसकी इसी दकियानूसी सोच और समझ का खामियाजा पूरे देश को उठाना पड़ रहा है।


