बेतुके सियासी बोल, हाशिए पर बुनियादी सवाल
बेतुके सियासी बोल, हाशिए पर बुनियादी सवाल
भारतीय समाज और व्यवस्था में गहरा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आर्थिक और सामरिक ताकत के रूप में भारत दुनिया में अपनी पैठ जमा रहा है, तब घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक आचरण में जिस तेजी से क्षरण हो रहा है, वह नागरिक समाज को शर्मिंदा करने वाला है। संवाद और क्रिया कलापों के स्तर पर अराजक होती हमारी राजनीति और राजनेता अपने इस अजराजक योगदान से देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योग मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति और भाजपा सांसद साक्षी महाराज के बयानों पर इस समय सियासी माहौल चढ़ा हुआ है। दोनों नेताओं के बेतुके बयानों पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दखल देना पड़ा और अपने नेताओं को संयम बरतने की सलह भी दी है। इसे नेताओं की फिसलती जुबान कहें या फिर इसे उनकी फितरत ही मान लिया जाए। इस बार के लोकसभा चुनावों में बेतुके बयान और बदजुबानी के चलते जनता के बुनियादी सवाल आसानी से हाशिए पर दकेल दिए गए। सवाल यह है कि विभिन्न गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर उनकी बेतुकी बयानबाजी की विकसित होती अराजक संस्कृति से किस तरह के समाज का निर्माण होगा। इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। सवाल इस बात का है कि नेताओं की बेतुकी बयानबाजी के पीछे आखिर कौनसी मानसिकता काम करती है ? यह समझना बेहद जरूरी है।
मनोविश्लेषकों के अनुसार राजनेताओं के बेतुके बयानों के मूल में सस्ती लोकप्रियता के सहारे बड़े राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति की इच्छा निहित होती है। इसे हीनताबोध भी कह सकते हैं, क्योंकि अतिमहत्वाकांक्षा का जन्म हीनताबोध से होता है। अफसोस तो तब होता है कि जब राजनेताओं में उच्च शिक्षा प्राप्त नेता भी स्तरहीन बयानबाजी पर उतर आते हैं। असल में राजनेताओं की बेतुकी बयानबाजी मीडिया में सुर्खी बनती है और 'बदनाम होंगे तो नाम न होगा' वाली बात को चरितार्थ करते दिखाई देते हैं। हर राजनीतिक दल में बड़ बोले नेता मौजूद है। राजनीतिक दल भी ऐसे नेताओं के खिलाफ किसी तरह की अनुशासनहीनता की कार्रवाई नहीं करते। इस बात के लोकसभा चुनावों में जिस तरह की स्तरहीन बयानबाजी हुई उसने पिछल सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए।
बदजुबानी के लिए सभी दलों के दिग्गज कहे जाने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी, डॉ सुब्रमण्यम स्वामी, शशि थरूर, कपिल सिब्बल, नरेश अग्रवाल, अर्जुन मोडवाडिया, रेणुका चौधरी, मनीष तिवारी, ऑस्कर फर्नांडीज, रमन सिंह, राम जेठमलानी, नितिन गड़करी, यशवंत सिन्हा, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, आजम खान, बेनी प्रसाद वर्मा, नीतीश कुमार, गिरिराज सिंह, योगी आदित्यनाथ, उमा भारती, अरविन्द केजरीवाल, आदि तमाम बड़े नाम वाले नेताओं के कई बयान अमर्यादित रहे। जनता के रहनुमाओं की आए दिन होने वाली बदजुबानी से सामाजिक मर्यादाओं का तेजी से क्षरण हो रहा है। अब वक्त आ गया है कि समाज और व्यवस्था को विकृत करती और विकसित होती बदजुबानी की सियासत पर अंकुश लगे। राजनीतिक दलों के पास तो सार्वजनिक जीवन में शुचिता से जुड़े हुए निर्णयों के लिए इच्छाशक्ति नहीं है। यह काम जनता को ही करना होगा। जनता को यह बात भी समझनी होगी कि सियासतदाओं की बढ़ती बदजुबानी की संस्कृति लोकतंत्र की मालिक जनता का ही परिहास है। सोशल मीडिया पर इनकी बदजुबानी की खूब निंदा और भर्त्सना देखी जा सकती है। लगता है कि भारतीय में शालीनता और मर्यादा के लिए शायद ही कोई जगह शेष रहे। राजनेताओं की बदजुबानी की विस्तारित होती संस्कृति एक तरह से अराजकता ही कही जाएगी। यह अराजकता लोकतंत्र के लिए एक अच्छे भविष्य का संकेत नहीं है।
O- विवेक दत्त मथुरिया


