बॉर्डर पर (जमना जी के) सेतु बनाने में सेना जुटी है, तुम्हें भूख से आज़ादी सूझ रही है
बॉर्डर पर (जमना जी के) सेतु बनाने में सेना जुटी है, तुम्हें भूख से आज़ादी सूझ रही है
विजय माल्या भारतीय राजनीति के गलित कुष्ठ की खाज़ है
राजीव नयन बहुगुणा
अय, उधर (जमना जी के ) बॉर्डर पर सेतु बनाने में सेना दिन रात जुटी है और तुम्हें भूख से आज़ादी सूझ रही है ? चलो ईंट गारा ढोओ। मेरे साईं जी उतरेंगे पार, ओ जमना धीरे बहो।
विजय माल्या भारतीय राजनीति के गलित कुष्ठ की खाज़ है। उसने हर पार्टी के नेताओं को अमुक विज्ञापन की तर्ज़ पर - "हम यहां भी खिलाते हैं, वहां भी खिलाते हैं" का फंडा अपनाया। उसे राजनीति का चस्का लगाने वाले कर्नाटक के ईमानदार माने जाने वाले राजनेता रामकृष्ण हेगड़े थे। वह राज्य सभा सांसद रहते दर्जनों सांसदों को सत्र के दौरान अपने चार्टेड प्लेन से रोज़ लन्च कराने दिल्ली से मुम्बई ले जाता था और "खिलाता" था। इन दिनों स्वभावतः भाजपा के पाले में था। दैत्य की तरह समुद्र तटों पर अधनंगा होकर अछूतियों के संग फ़ोटो खिंचाता था और नाचता था। अपनी थुल थुल तोंद का भी इसे कोई लिहाज़ न था। न किसी ने कभी इसे टोका - कि बे तोंदू, शर्ट तो मत उतार। सब उसका खा कर उसे कामदेव का और कोका पंडत का अवतार बताते थे। बैंक उसको कर्ज़ा देते रहे। अब कौन किसको दोष दे।
जटा जूट को कलर, खिज़ाब, डाई से रँगने वाले, रावण की तरह निजी पुष्पक विमान रखने वाले, अपने बणिज ब्यौपार का झूठा विज्ञापन देने वाले, सत्ता की चौखट अपने अजिन, दर्भ, पालाश और कमण्डल को आये दिन पतित करने वाले ऐसे बाबाओं से तो कलयुग भी सिहर उठा। गंगा से ब्रह्मा जी ने कहा था -
"साधवो, न्यासिनो, शान्तः, ब्रह्मिष्ठ, लोक पावनः
हरन्त्यधम तेन्गा सङ्गात तेवाबदे अथमिदम हरिः"
अर्थात-
शांत, ब्रह्म निष्ठ और पवित्र साधू सन्त जब तुममे मज्जन पान करेंगे, तो तुम्हारा कलुष भी हर लेंगे।
जेएनयू के बीहड़ में, खुले में मूत्र विसर्जन नहीं करना चाहिए, बल्कि लाखों की तादाद में जमा होकर जमना जी में मल मूत्र विसर्जन करना चाहिए। तब ध्यान भी अच्छा लगता है। यही जीने की कला है और यही देश भक्ति। आर्ट आफ लिविंग।


