संजय शर्मा
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही तय हो गया था कि अमित शाह ही भाजपा के नए शहंशाह होंगे। नरेन्द्र मोदी के हनुमान कहे जाने वाले अमित शाह को पार्टी की कमान सौंपे जाने से तय हो गया है कि अब पार्टी मोदी मॉडल पर चलेगी। इसमें विकास के साथ-साथ उग्र हिन्दुत्व की छाप होगी। आने वाले दिनों में होने वाले कुछ राज्यों के चुनाव इस तेज तर्रार नेता की क्षमता का पैमाना तय कर देंगे। अमित शाह के अध्यक्ष बनने के साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बढ़ती हुई सक्रियता बता रही है कि आजादी के बाद अब पहली बार संघ के हिन्दू एजेण्डे को लागू कराने की तैयारी भी शुरू हो गयी है।
अमित शाह, मोदी के सबसे विश्वस्त हैं अब यह बात किसी से छिपी नहीं है। नरेन्द्र मोदी उनकी हर बात पर भरोसा करते हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन को 80 में से 73 सीटें जितवाकर अमित शाह अपने राजनीतिक हुनर का परिचय दे चुके हैं। नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि भाजपा के इस नए नवेले अध्यक्ष का देश के बाकी राज्यों में भी इसी तरह का इस्तकबाल हो अब सारी राजनीति भी यही सोचकर बन रही है।
मात्र चार साल पहले कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि फर्जी मुठभेड़ का आरोप झेलते हुए तिहाड़ जेल में बंद एक नेता भाजपा का सबसे ताकतवर नेता बन जायेगा। सीबीआई लगातार चाह रही थी कि अमित शाह, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ सरकारी गवाह बन जायें। मगर अमित शाह ने अपने राजनीतिक गुरू का साथ नहीं छोड़ा और अंततः उन्हें इसका सिला भी मिला। कुछ ऐसे ही हालात तब भी बने थे, जब गुजरात में 1998 में मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी बीच संबंध बहुत खराब हो गए थे। अमित शाह तब भी नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मजबूती से खड़े रहे थे और मोदी समझ गये थे कि यही नौजवान विधायक उनकी राजनीति में चाणक्य बनेगा।
फर्जी मुठभेड़ों में घिरने के बाद लोग मान रहे थे कि अब अमित शाह का कैरियर खत्म हो जाएगा। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके गुजरात प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी मगर सही मायनों में यही वह समय था जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उनमें एक नए उग्र हिन्दू नेता का चेहरा देख रहा था।
स्वाभाविक रूप से संघ को भी भाजपा में एक ऐसा दमदार नेता चाहिए था जो उग्र हिन्दुत्व की राह पर चल सके। अटल बिहारी वाजपेई की धर्म निरपेक्ष छवि और बाद में लाल कृष्ण आडवाणी के भी इसी राह पर चलने की कोशिशों ने संघ को भारी सदमा दिया था। इन हालातों में संघ को लगता था कि अगर इसी तरह की विचारधारा बनती रही तो उसके लिए भारी नुकसान हो जाएगा। अमित शाह ने भी संघ को निराश नहीं किया। मुजफ्फरनगर में बदले वाले बयान ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा को बढ़त दिलाई बल्कि संघ के नेताओं के चेहरे पर चमक बढ़ा दी।
भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में हाशिए पर थी। कोई भी प्रयोग पार्टी को सत्ता तक नहीं पहुंचा पा रहा था। पार्टी के नेताओं की आपसी गुटबाजी ने भी सबको निराश कर दिया था। यह तय माना जा रहा था कि इस लोकसभा चुनाव में भी पार्टी के भीतर नेतृत्व का सवाल उठेगा। इन्हीं सब हालात के बीच नरेन्द्र मोदी भी समझ गये थे कि अगर उत्तर प्रदेश में हालात नहीं संभले तो दिल्ली का सिंहासन उनसे हमेशा के लिए दूर हो जायेगा। इन स्थितियों में सिर्फ एक मात्र यही विकल्प बचा था कि अमित शाह की चुनावी रणनीति का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में भी किया जाये। यह प्रयोग सफल भी रहा।
सरकार बनने के बाद अमित शाह का नाम आगे आने के बाद भाजपा के एक प्रभावशाली गुट ने भीतर-भीतर इसका विरोध भी शुरू किया। इन लोगों का कहना था कि पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री दोनों के एक ही राज्य के होने से अच्छा संदेश नहीं जायेगा। संघ के कुछ नेताओं से इसके जवाब में मोदी ने सिर्फ इतना कहा कि जिस उत्तर प्रदेश में सालों से भाजपा हाशिए पर थी वहां एक झटके से जो व्यक्ति पार्टी को बुलंदी तक पहुंचा सकता है वह आगे भी पार्टी के लिए सबसे बड़ा तुरूप का इक्का साबित होगा। इसके बाद अमित शाह का विरोध करने का साहस किसी का नहीं था और अमित शाह आखिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये।
मगर आने वाला समय https://fbcdn-sphotos-e-a.akamaihd.net/hphotos-ak-xpa1/t1.0-9/61133_1382955341235_3749248_n.jpg के लिए इतना आसान भी नहीं है। वह नरेन्द्र मोदी की तरह किसी गरीब परिवार से नहीं आये बल्कि वह एक धनाढ्य परिवार का हिस्सा हैं। वह आम तौर पर पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच में बहुत कम बोलते हैं। कार्यकर्ता उनसे खौफ खाते हैं। लंबे समय तक इस तरह का माहौल पार्टी में कुछ विसंगतियां भी पैदा कर सकता है। मगर सब कुछ इतना आसान भी नहीं है।
लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता बहुत बड़ी संख्या में विभाजित हुए थे। इसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ था। अगर अमित शाह हिन्दुत्व की धार को और तेज करेंगे तो आने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाता एकजुट होंगे जिसका नुकसान भाजपा को उठाना पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश भाजपा के कई वरिष्ठ नेता भी अचानक बदले हुए इन हालातों से बेचैन हैं। वह जानते हैं कि उनके पर कतरे जा रहे हैं। मगर वह कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं है। भाजपा प्रवक्ता डॉ. चन्द्रमोहन का कहना है कि अमित शाह के अध्यक्ष बन जाने से पार्टी के अंदर एक नई चेतना का विकास हुआ है। आने वाले दिनों में कार्यकर्ता इस बात को महसूस करेगा।
बिजनेस स्टैंडर्ड के ब्यूरोचीफ सिद्धार्थ कलहंस का मानना है कि अमित शाह को पार्टी के भीतर ही ताकतवर गुटों से निपटना पड़ेगा और यही उनके लिए सबसे मुश्किल काम होगा। हालात कुछ भी हों भाजपा के इस शहंशाह ने अपनी रणनीति बनाना शुरू कर दी है और जल्द ही उसके परिणाम सबके सामने आ जायेंगे।
संजय शर्मा, वीक एंड टाइम्स के सम्पादक हैं