भाजपा-सपा कितने करीब, पर्दाफाश होता है प्रज्ञा ठाकुर और अज़ीज़ुर्रहमान से
भाजपा-सपा कितने करीब, पर्दाफाश होता है प्रज्ञा ठाकुर और अज़ीज़ुर्रहमान से
मसीहुद्दीन संजरी
प्रज्ञा सिंह ठाकुर को क्लीन चिट देने की सरकारी साजिश नाकाम हो गई।
एनआर्इए ने सरकार की मंशा पर साध्वी प्रज्ञा को ज़मानत देने और मकोका हटाने की सिफारिश की थी। लेकिन अदालत का मानना था कि प्रज्ञा के खिलाफ प्रथम दृष्टया मुकदमा चलाने का आरोप बनता है, इसलिए मकोका नहीं हटाया जा सकता। इस केस की सरकारी वकील रहीं रोहिणी साल्यान से भी एनआईए सरकार की मंशा के अनुरूप यही काम करवाना चाहती थी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। इसीलिए उनको सरकारी वकील के पद से हटा दिया गया था।
दूसरी तरफ प० बंगाल के अज़ीज़ुर्रहमान को उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने फर्जी फंसाया और आरडीएक्स समेत विस्फोटक बरामद दिखाए थे। लेकिन जिस 23 जून 2007 को उसे लखनऊ के पास यह सब छुपाने और बाद में बरामद होने का आरोप एसटीएफ ने लगाया था, उस समय वह प० बंगाल सीआईडी की हिरासत में था। यह सब सबूत होने के बावजूद अभियोजन ने इस केस को लटकाए रखा और आठ साल बाद अदालती फैसले से अज़ीज़ुर्रहमान व अन्य इस केस से बरी हुए।
सितम यह है कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने उसी मुकदमें में हाईकोर्ट में सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील किया है।
बेशर्मी की हद है जहां एक तरफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त सबूत होने के बाद भी क्लीन चिट देने के लिए भाजपा सरकार के इशारे पर एनआर्इए अदालत से गुहार लगाती है वहीं बेगुनाही के पक्के सबूत होने और मुकदमें से बरी होने के बावजूद सपा सरकार हाईकोर्ट में अपील करती है।
यह दोनों घटनाएं शर्मनाक तो हैं ही भाजपा और सपा रणनीतिक रूप से एक दूसरे के कितने करीब हैं इसका भी पर्दा फाश होता है।


