भारतीय समाज के लिए बहुत बुरा वक्त, राजनेता और मीडिया अब जनता की परवाह नहीं करते
भारतीय समाज के लिए बहुत बुरा वक्त, राजनेता और मीडिया अब जनता की परवाह नहीं करते
भारतीय समाज के लिए यह सचमुच बहुत बुरा वक्त है। राजनेता और मीडिया अब जनता की परवाह नहीं करते
उर्मिलेश
राजनेता और मीडिया अब जनता की परवाह नहीं करते।
राजनेता जान गये हैं कि वो जमाना बीत गया, जब लोग अनर्थ होता देख खड़ा हो जाते थे। जात-पात, धर्म-कर्म का भेद भुलाकर एक हो जाते थे(जैसे इमजे॓न्सी के खिलाफ)।
अब देशव्यापी स्तर पर ऐसा संभव होता नहीं दिखता। समाज को संप्रदाय और धर्म के नाम पर बांटना बहुत आसान हो गया है। जो कुछ इससे नहीं पट पाते, उनका इंतजाम कारपोरेट और मीडिया के जरिए हो जाता है।
बैंक कर्ज की EMI ने मध्य और निम्न मध्य वर्ग की संघर्षशीलता को और भी कुंद कर दिया है।
नयी पीढ़ी बदलाव और विचार की राजनीति से लगातार दूर होती दिख रही है।
बदलाव की राजनीति के पैरोकार विभिन्न कारणों से लगातार सिमटते जा रहे हैं।
पारंपरिक प्रगतिशील बुद्धिजीवी की स्थिति विचित्र हो गयी है। वह आज के समाज और सवाल को समझ ही नहीं पा रहा है। घिसे शीशे वाले चश्मे से समाज को कैसे समझा जा सकता है?
भारतीय समाज के लिए यह सचमुच बहुत बुरा वक्त है।


