सुनील कुमार

सरकार ने सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिये पर जी रहे लोगों के लिये छात्रावास, आश्रम, शेल्टर होम आदि बनाया हुआ है।

गरीब मां-बाप छात्रावास में इस आशा से अपने बच्चों को भेजते हैं कि वहां रहकर पढ़ाई तथा पालन- पोषण हो जायेगा, जिससे उन्हें दो जून की रोटी बिना जलालत की मिल सकेगी।

बेसहारा बच्चे आश्रम, अनाथालय में रहते हैं क्योंकि बाहर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता है। एक बार छात्रावास, आश्रम, शेल्टर होम, अनाथालय में आ जाने के बाद सरकार भी उनकी सुध नहीं लेती है। यहां तक कि उनकी देख-रेख के लिये जो भी संस्थायें बनाई गई हैं वे भी निष्क्रिय पड़ी रहती हैं। कोई बड़ी घटना होने (जैसे-अचानक कई मृत्यु हो जाये, बच्चियां गर्भवती हो जायें या मानव तस्करी के खुलासा हों) पर सरकार व इन संस्थाओं की नींद खुलती है और वे एक जांच कमेटी का गठन कर अपने कर्तव्य का इतिश्री कर लेते हैं। कमेटी में भी ज्यादातर ऐसे लोग होते हैं जिन्हें लैंगिक हिंसा, चाइल्ड राइट्स, वुमेन राइट्स की सही जानकारी नहीं होती। वे कानून में दर्ज अधिकारों को अनदेखा कर सामाजिक मान्यताओं पर अपनी रिपोर्ट पेश करते हैं।

मीडिया का रोल भी अपराधी की पृष्ठभूमि पर निर्भर होता है। वह जाति, धर्म, वर्ग को देखकर ही रिपोर्टिंग करती है। कभी-कभी तो पीड़ित या उसकी सहयोगी संस्थाओं को ही कठघरे में खड़ा करा दिया जाता है।

ऐसी ही एक घटना मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बैरागढ़ स्थित शासकीय माध्यमिक शाला में स्थापित आवासीय ब्रिज कोर्स में घटी है।

बैरागढ़ शासकीय माध्यमिक शाला के छात्रावास में 40 बच्चे रहते थे। उनकी उम्र सात से ग्यारह वर्ष के बीच में है जो कि पहली से तीसरी कक्षा के छात्र हैं। ये बच्चे भोपाल शहर की अलग-अलग बस्तियों और जिले से हैं। इन बच्चों के माता-पिता कबाड़ उठा कर जीविका चलाते हैं।

इस बस्ती का भोपाल शहर को स्वच्छ रखने में एक बड़ा योगदान है। इस बस्ती के लोग रास्ते, बाजार, मंडियों, घरों से कुड़ा उठाते हैं। वे शहर की सफाई करने लिये सुबह-सुबह ही निकलते हैं ताकि बाजार खुलने से पहले वह कूड़ा इकट्ठा कर लें। यह काम वे निःशुल्क या बहुत कम पैसे पर करते हैं। बस्ती में बहुत कम लोगों को सरकार द्वारा पैसा दिया जाता है और वह भी न्यूनतम मजदूरी से कम। अगर पति-पत्नी सफाई करते हैं तो दोनों को 8,000 रू. मिलते हैं, लेकिन अधिकांश लोगों को कोई पैसा नहीं मिलता है। शहर की सफाई करने के ईनाम स्वरूप उनके साथ छुआ-छूत किया जाता है, उन्हें चोर बोला जाता है, उनकी महिलाओं के साथ छेड़खानियां होती हैं।

जब बस्ती वालों को बैरागढ़ छात्रावास का पता चला तो उन्होंने अपने बच्चों को यहां पर रहने और पढ़ने के लिये भेजा ताकि उन्हें जलालत वाली जिन्दगी नहीं जीना पड़े। कुछ माह तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन जब वहां का सहायक वार्डन अजय शर्मा बना तो बच्चों के साथ भेद-भाव, लैंगिक और शारीरिक उत्पीड़न शुरू हो गया। अजय शर्मा बच्चों को रात में ठंडे पानी से नहाने के लिए मजबूर करता, ठंड में पंखा के नीचे नंगा कर के खड़ा करता और उनका वीडियो बनाता। सोये हुये बच्चों पर पानी फेंकवाता और कहता कि पेशाब कर दिया है। दवा लगाने के बहाने बच्चों के गुप्तांगों को छूता और उसका विडियो बनाता। बच्चों को आपस में एक-दूसरे का पैंट उतारने के लिये मजबूर करता। उसका वीडियो बना कर लैपटॉप में रखता और बाकी लड़कों को दिखाता।

बच्चों ने बताया कि उस वडियो को वह एक महिला टीचर को दिखाता था तथा उसे अभिषेक नाम के स्टाफ के लैपटॉप में रखता था। कुछ बच्चों के साथ वह रात में सोया करता था। निकर में वह आता था और बच्चों को गोद में बैठने को कहता था। बच्चों के साथ मार-पीट की जाती व उन्हें जाति सूचक गालियां दी जाती थीं। उनके कोहनी, कूल्हा, ऊंगुली के जोड़ों पर मारा जाता था, अंधेरे कमरे में बंद कर दिया जाता था। बड़े बच्चों को मजबूर किया जाता था छोटे बच्चों को मारने के लिये। इन बच्चों को धमकी दी जाती थी कि किसी को बताया तो मार दूंगा, जिन्दा गाड़ दूंगा।

अजय शर्मा के इस दुर्व्यवहार से बच्चे बहुत दुखी थे और वे भागने का प्लान बनाने लगे। एक रात एक लड़का वहां से भाग निकला। उसके बाद उस लड़के घरवालों के पास फोन आया कि वह छात्रावास से भाग गया है। घर से उस लड़के के माता-पिता और मुहल्ले की दो औरतें छात्रावास पहुंची। लड़का नहीं मिला तो उन्होंने वहां पर शोर-शराबा किया। वहां रह रहे बच्चों ने छात्रावास में हो रहे मारपीट और लैंगिक उत्पीड़न के विषय में बताया, वहां पर गये माता-पिता अपने बच्चे को लेकर आ गये और बस्ती में आकर दूसरे लोगों को भी ये बात बताई। बस्ती के बाकी लोग छात्रावास से अपने-अपने बच्चों को लेकर घर वापस आ गये।

घर वालों ने बस्ती में काम कर रही मुस्कान संस्था से सम्पर्क किया। मुस्कान और चाइल्ड राइट्स अलायन्स के प्रयास से 4 दिसम्बर, 2016 को एफआईआर दर्ज हो गया, लेकिन पाक्सो और एस सी, एस टी एक्ट नहीं लगाया गया। 16 दिसम्बर को एस सी, एस टी एक्ट लगाया गया और काफी प्रयास के बाद 14-15 जनवरी को पाक्सो जोड़ा गया। इसके बावजूद भी वार्डन की गिरफ्तारी नहीं हो रही थी। फिर मुस्कान संस्था पर आरोप लगाये जाने लगे कि उसने अभिभावकों से पैसे के लालच में केस दर्ज करावाया है।

27 फरवरी को अजय शर्मा की गिरफ्तारी हुई। लेकिन पुलिस ने उसे उसी दिन कोर्ट में प्रस्तुत कर जेल भेज दिया और रिमांड पर लेकर साक्ष्य जुटाने का प्रयास नहीं किया और शिकायत के तीन महीने बाद उसके घर से लैपटॉप जप्त किया गया है।

पुलिस ने आरोपी से मोबाईल जमा करने को कहा तो उसने एक दूसरा मोबाईल लाकर दे दिया। उसको ही पुलिस ने सही मान लिया। अपनी तरफ से उसने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि आरोपी द्वारा दिया गया मोबाईल वही मोबाईल है जिससे विडिया बनता था या दूसरा।

मुस्कान संस्था पर आरोप लगाया जा रहा है कि वह बच्चों के बयान नहीं लेने देती है, जबकि मुस्कान ने एसडीएम को लिखित दिया है कि 6 बच्चों के अलावा और 22 पीड़ित बच्चों के बयान दर्ज किये जायें।

घर वाले कहते हैं कि हम किसी तरह इन बच्चों को काम से छुड़वा कर पढ़ने के लिये छात्रावास भेजे थे लेकिन वहां भी इनको पढ़ने नहीं दिया गया। यह सरकार हमें अनपढ़ ही रखना चाहती है ताकि हम इनकी गंदगी साफ करते रहें।

इस तरह के छात्रावास, आश्रम, शेल्टर होम, शिशु गृह में रहने वाले लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर जिन्दगी बिताने वाले घर से होते हैं, इसलिए वहां का प्रबंधक, स्टाफ बेखौफ होकर उनके साथ यौनाचार, लैंगिक हिंसा किया करते हैं। यहां तक कि उन्हें वेश्यावृत्ति में धकेल तथा बेच देने की खबरें आती रही हैं। ये खबरें राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली जैसे शहरों से भी आई हैं।

एक तरफ इस तरह के मामलों के आर्थिक आधार हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक कुंठा से भी प्रभावित हैं। भारत जैसे देश में सेक्स पर बात करना एक तरह से अपराध माना जाता है तो दूसरी तरफ कुंठा से ग्रस्त लोग छोटे-छोटे बच्चे/बच्चियों से यौनाचार, छेड़-छाड़ करते रहते हैं। पॉर्क या किसी सार्वजनिक जगह पर बैठे प्रेमी जोड़े को पुलिस और कुछ धर्म के ठेकेदार मार-पीट करते नजर आते हैं तो दूसरी तरफ बालात्कारी और छेड़खानी-वेश्यावृति कराने वाले तथा बच्चों के बेचने वाले को यही लोग शह प्रदान करते हैं।

भारत माता की जय नारे लगाने वालों को यह समस्या नजर नहीं आती है, वे ऐसे अपराधों पर मुंह नहीं खोलना ही उचित समझते हैं।

क्या इन बच्चों का दोष यही है कि उन्होंने सामाजिक-आर्थिक आधार पर पिछड़े घरों में जन्म लिया है? क्या उन्हें पढ़ने और अपनी जिन्दगी बेहतर करने का मौका नहीं मिलना चाहिये? क्या भारत माता की जय के नारे लगाने से ही भारत के मातायें, बेटियां, बच्चे, बूढ़े और हाशिये पर जी रहे समुदाय के लोग सुरक्षित रह पायेंगे?