भीड़ नहीं, उसकी पीर को समझो सरकार जी !
भीड़ नहीं, उसकी पीर को समझो सरकार जी !
जगमोहन फुटेला
रामदेव पाखंडी है. सरकार घमंडी है और इस देश की व्यवस्था रंडी है. रंडी भी, कोठे पर आए इंसान को कुछ देती तो है. व्यवस्था वो भी नहीं करती. आज हर कोई त्रस्त है. अन्ना और रामदेव तो फिर बड़ी बात है, आज हर कोई सरकार को चुनौती देने में सिद्धहस्त है.
जिस रामदेव, उसकी 'रामलीला' और सरकार की घुटना टेकने के बाद घुटनाफोड़ हरकत पे मीडिया मस्त है वो दरअसल मुद्दा ही नहीं है. प्रमुख मुद्दा तो कतई नहीं. मैं उतना बड़ा नहीं, छोटा समीक्षक हूँ. सो छोटी छोटी उन लहूचूसू प्रक्रियाओं का ज़िक्र करूंगा जिन्होंने एक लगभग भूले बिसरे गांधीवादी को अन्ना और खुद अपनी आँख का इलाज न कर पाने वाले को हर इलाज का डाक्टर रामदेव बना दिया है.
मान के चलिए कि रामदेव के पीछे दिल्ली आई जनता को काले धन से कोई लेना देना नहीं है. न उन्हें जो उनको आगे लगा कर सरकार के गले में फांस डालना चाहते हैं, न उनकी भीड़ में शामिल किसी महिला या पुरुष को जिसे मालूम है कि न रामदेव स्विटज़रलैंड से वो काला धन ला सकता हैं, न उसमें से एक कौड़ी उनमें से किसी को मिलनी है. पंजाबी में एक कहावत है, बुद्ध रोवे सुख नूं ते अम्मा रोवे दुःख नूं. यानी हर कोई अपने ही कष्ट को लेकर दुखी रहता है. किसी की भी डोली चलते वक्त हमेशा औरतें ही इस लिए रोटी हैं कि उन्हें अपनी विदाई की याद आई होती है. इस देश का हर नागरिक दरअसल अपने दुःख से दुखी है और वो सहारा ढूंढ रहा है. आइए, उन दुखों की भी एक झांकी देख लें.
सड़क पे चलते ट्रक देखे हैं न आपने?..वो मालिक नहीं आरटीओ और पुलिस वालों के (लिए) चल रहे होते हैं. हर ट्रक को हर महीने कम से कम एक हज़ार रूपये देने होते हैं, जहां के वो हैं और जहां तक उनको जाना होता है, उस हर थाने में. आरटीओ से लेकर एसटीओ का अलग. वो जो नब्बे फीसदी ट्रक मालिक एक से दूसरा ट्रक खरीदने लायक नहीं हो पाते वो उसकी कमाई में लगी इसी सेंध के कारण. मालगाड़ी से माल भेजना हो तो वहां भी किराए के अलावा कमीशन है. नासिक से चला आठ रूपये किलो प्याज उत्तर भारत के किसी भी सब्जी ठेले तक पंहुचते बीच में बमुश्किल चार बिचौलियों की मेहरबानी से अस्सी रूपये किलो तक हो जाता है. पाठ्यक्रम सरकार और प्रकाशन उसके अफसरों, स्कूलों ने तय कर दिए हैं. मुश्किल से बीस पच्चीस हज़ार प्रतियां छाप और बेच पाने वाली पत्रिकाएँ बीस रूपये में मिल जाती हैं लेकिन उतने ही पन्नों वाली स्कूली किताबें पचास पचास रूपये में बिक और उन्हीं विक्रेताओं से लेनी पड़ रहीं हैं. यूनिफार्म की दुकान और उसका रेट भी फिक्स है. टैक्स हर साल बढ़ रहा है. नौकरी हर साल घट रही है. उसके साथ मिलने वाली सुविधाएं भी. दूध. चीनी, घी, तेल, आटा, चावल हर छमाही महंगा हुआ है. उसी साल्ट की दवा जब दस रूपये की भी बन और बिक रही है तो डाक्टर की कृपा से वो सत्ताईस रूपये में ही खरीदनी पड़ रही है. रुई का पैकेट पांच रूपये में आता और पच्चीस रूपये के प्रिंट रेट पर बिकता है. थाने में आपके साथ हुई धोखाधड़ी का मामला भी कुछ लिए दिए बिना दर्ज नहीं होता, क़त्ल की बात ही क्या है?
देश के अधिकाँश राज्यों के अदालतों में चल रहे मामलों पर कोई नज़र मार के देख ले. आधे से ज्यादा सिर्फ और सिर्फ 'मुलजिम' के इकबालिया बयान पर चल और इसी लिए छूट भी रहे हैं. पुलिस या अभियोजन पक्ष की दिलचस्पी उनके छूट जाने में नहीं, दरअसल वैसे ही और नए मामले दर्ज हो जाने में है. किसी को भी पकड़ो, रगड़ो, पुलिसिया महारत का इस्तेमाल करते हुए एक अदद इकबालिया बयान लो. 'मुलजिम' को पेश कर उस से सामान या उसके साथियों की बरामदगी के बहाने रिमांड लो, निचोड़ लो. डील हो जाए तो छोड़ दो. न हो तो फोड़ दो. अदालतें भी इस देश की दंड प्रक्रिया संहिता के तहद पुलिस का खेल और कल को कोई सबूत नहीं आना समझ में आ रहा होने के बावजूद पुलिस रिमांड देने और हर किस को पीटने देने के लिए मजबूर हैं. तहसील वालों ने माल काटने के चक्कर में निजी तो क्या सरकारी संपत्तियां तक किन्हीं के भी नाम चढ़ा दीं हैं. एक अदद फर्द लेने जाओ तो उसके भी बीस से लेकर दो सौ रूपये तक कुछ भी देने पड़ रहे हैं. फसल आने पे एक दो बोरे गेंहू अलग से. मैं एक ऐसे मुलाज़म से भी मिला एक बार जो स्कूटर होने के बावजूद रिक्शों पे चलता था. क्योंकि उनके लायसेंस रिन्यूवल का काम उसके पास था.
मेरी काम वाली के घर वाले को बैंक दुबारा प्याऊ इस लिए नहीं रख रहा क्योंकि उसको डाक्टर डेढ़ साल चले उस इलाज का वो सर्टिफिकेट मुफ्त में नहीं दे रहा जो उसे नौकरी वापसी के लिए चाहिए. मेरे चैनल के किसी भी स्ट्रिंगर को चैनल ने कभी कोई पैसा नहीं दिया. एक दफे एक नौजवान ने इस लिए आत्महत्या कर ली कि स्ट्रिंगर लगने के लिए जो तीस हज़ार रूपये उसने बाज़ार से उधार लिए थे वो, वो जलालत और फिर पिटाई के बावजूद लौटा नहीं पाया था.
जैसा मैंने शुरू में कहा मैं छोटा आदमी हूँ और छोटी छोटी समस्याओं से दो चार एक छोटा सा पत्रकार. स्थानीय अखबार के स्ट्रिंगर से लेकर राष्ट्रीय चैनल का संपादक रहा. आधा उत्तर भारत मुझे मेरे नाम और शक्ल से जानता है मगर कुछ दिए लिए बिना वो राशन कार्ड तो मैं भी नहीं बनवा पाया था जिसके बिना मुझे गैस का कनेक्शन नहीं मिलता.
सो पाठक बंधु, सवाल ये नहीं है कि रामदेव या उसके पीछे कौन है? मानने को मैं भी मानता हूँ कि रामदेव को सिर्फ अपना योग, मगर राजनीति नहीं करनी चाहिए. हर रोज़, हर पल, पिसले, कुचले और खीझे इंसान की दिमागी हालत ये हो गई है कि उसे किसी भी पार्टी से कोई उम्मीद भी नहीं रह गई है. उसके सामने एक बहुत बड़ा शून्य है. वो भर नहीं रहा. इसी लिए उसे सार्वजनिक जीवन से लगभग लुप्त हो चुके अन्ना हजारे में भी जय प्रकाश नारायण और एक योग व्यापारी में भी अपना दुःख व्यक्त हो सकने की संभावना दिखाई देने लगी है. सरकार अपनी ताकत से उनको कुचल सकती है. कुचल ले. लेकिन हालात अगर यही रहे तो भीड़ तो किसी भी शहर में किसी भी नत्थू, जमालुद्दीन, पीटर या संत सिंह के पीछे हो लेगी. इस लिए हे सरकार वालो, प्लीज़ रामदेव नहीं, उसके आगे पीछे की भीड़ नहीं, भीड़ की पीर को समझो. वरना रामदेव तो वो कभी किसी को भी बना देगी.
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


