प्रेम सिंह

नागरिक समाज: सीमाएँ और अंतर्विरोध

अभियान के प्रति जो कुछ विवादित स्वर उभरते, वे ज्यादातर कमज़ोर हैं। हम उन पर चर्चा करेंगे, लेकिन पहले इस अभियान के चरित्र/प्रकृति और वर्ग-आधार को समझना मुनासिब होगा। दरअसल, अभियान के उद्देश्यों, तरीकों और उसमें शामिल मुख्य व्यक्तियों और उनके वक्तव्यों के बारे में जो सवाल उठाए गए हैं, वे इसी लिए कमज़ोर पड़ते हैं कि आंदोलनों के चरित्र को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा गया है।

विरोध की प्रतिक्रियाएँ फुत्कर और तात्कालिक किस्म की हैं। इसकी चलते कुछ नेताओं और टिप्नीक्कारों द्वारा लोकतांत्रिक प्रकृति और संस्थाओं की दुहाई भी प्रामाणिक नहीं बन पाई है। ‘लोकतंत्र संवर्धक’ और ‘लोकतंत्र विनाशक’ की अतियों के बीच संतुलन साधने के कतिपय प्रयास भी लीपा-पोती ही ज्यादाद लगते हैं। जिस तरह से, जैसे कि आगे देखेंगे, भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जंग और जीत के दावों में दम नहीं है, उसी तरह उसके विरोधी और समंजस्स्यवादी स्वर भी कमज़ोरी हैं।

देश की राजनैतिक में जब राजनैतिक विपक्‍ष नहीं बचता है, या बहुत कमज़ोर होता है, तो प्रचलित व्यवस्था से पैदाह होने वाली समस्याओं और संकटों को लेकर नागरिक समाज अपनी सीमा से बढ़कर सक्रिय होता है। भारत में पिछले 20 सालों से यही स्थिति चल रही है। इस बीच सभी पार्टियों की मिली-जुली सरकारें सत्‍ता में आ चुकी हैं, लेकिन सभी ने मनमोहन सिंह के एजेंडे या आर्थिक नीतियों के नाम से शुरू किए गए नवउदारवाद को ही आगे बढ़ाया है। मार्क्सवादी पार्टियों से कुछ अलग हटकर उम्मीद थी, लेकिन उनके नेताओं ने आधिकारिक तौ़र पर गोष्ठी कर दिया कि पूंजीवाद ही विकास का रास्ता है। यह सही है कि यह स्थिति बनने के अंतर्न्राष्‍ट्रीय कारण और दबाव भी हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी नागरिक समाज में उस पर एक सर्वानुमति बनती गई है।

नागरिक समाज को चिन्हित करें तो कह सकते हैं कि यह स्थिति बनने के अंतर्न्राष्‍ट्रीय कारण और दबाव भी हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भी नागरिक समाज में उस पर एक सर्वानुमति बनती गई है।