मई दिवस इसी धरती को और उसके लायक बेटों बेटियों को उनका हक लेने की लड़ाई है !!
मई दिवस इसी धरती को और उसके लायक बेटों बेटियों को उनका हक लेने की लड़ाई है !!
संध्या नवोदिता
इलाहाबाद। आज मई दिवस इलाहाबाद के सुभाष चौराहे पर परम्परागत रूप से मनाया गया। मुख्य वक्ता प्रो. चमनलाल और कामरेड वीके सिंह के वक्तव्य ज़रूरत के मुताबिक़ मजदूर चेतना को विस्तार देने वाले रहे।
शिकागो शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए सभी वक्ताओं ने मजदूरों की एकता पर जोर दिया।
जो बात नहीं कही गयी वह यह कि आज भी हम इलाहाबाद शहर में हाड़ तोड़ रहे लाखों निर्माण मजदूरों, रिक्शा खींचने वालों, सड़कों पर झाड़ू लगाने वालों, कूड़ा बटोरने वालों, सड़क किनारे फेरी लगाने वालों तक मजदूर दिवस नहीं पहुँचा पाए हैं।
आज भी तमाम राज्य और केंद्रीय कर्मी खुद को मजदूर दिवस की परिभाषा से इतर श्रेष्ठता ग्रन्थि के शिकार हैं। हम उन्हें नहीं समझ पाए हैं कि मेहनत करके वेतन पाना, अपने हाथ में उत्पादन का कोई तरीका या औजार न होना, अपनी आजीविका के लिए अपनी मेहनत पर निर्भर होना ही हमें मई दिवस से जोड़ता है।
हम मॉल में सोलह सोलह घंटे काम करने वाले सेल्सबॉय, सिक्यूरिटी गार्ड्स, दुकानों पर काम करने वाले नौजवानो, प्राइवेट स्कूलों में दो से लेकर पांच हजार रूपये में नौकरी करने को मजबूर शिक्षक युवाओं, जिनमें लड़कियों की भी बड़ी तादाद है, तक अपनी बात नहीं पँहुचा पाए कि यह दिन शोषण से मुक्ति की लड़ाई को याद करने का दिन है।
हम अखबार में चौबीस घण्टे की मजदूरी कर रहे खबरनवीसों और फोटोपत्रकारों, उनमें भी महिलाएं अच्छी तादाद में हैं, तक यह सन्देश नहीं पहुंचा पाए कि अखबार और चैनल भर पेट पैसा पीटते हैं फिर भी स्ट्रिंगर से लेकर मंझे हुए पत्रकार तक इतने कम पैसों में चौबीस घण्टे काम करने को विवश क्यों किये जाते हैं।
हम आकाशवाणी, विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में काम कर रहे सैकड़ों कैजुअल और अतिथि प्रवक्ताओं को भी नहीं जोड़ पाए कि अगर आकाशवाणी और पढ़ाना , शिक्षा देना एक ज़रूरी और नियमित काम है तो इन पदों पर पचीसों सालों से भर्ती बन्द क्यों है?
तमाम आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, फल,सब्ज़ी विक्रेताओं, ऑटो चालकों, बस चालकों, रेलकर्मियों, घरेलू कामवालियों और भी न जाने कितने ही लोगों को मई दिवस की ताकत अभी बनना बाकी है।
संगठित क्षेत्र में भारत की कुल श्रम शक्ति का महज सात फीसद है, बाकी तिरानवे फीसद श्रम शक्ति असंगठित या प्राइवेट वर्कर के तौर पर काम कर रही है।
विडम्बना है कि शोषण करने वालों के संगठन बाकायदा बने हुए हैं और खूब एक्टिव हैं मसलन फिक्की, एसोचैम इत्यादि, लेकिन खुद संगठित रुतबा रखने वाले फिक्की और एसोचैम की मेंबर कम्पनियाँ अपने एम्प्लॉयी को यूनाइट होने पर सज़ा देती हैं। लगभग हर प्राइवेट एम्प्लॉयर के यहाँ एम्प्लॉयी एसोसिएशन बैन है।
सरकारी क्षेत्र में एसोसिएशन है पर नखदन्त विहीन और ब्यूरोक्रेट की गुलाम है।
ये वे चुनौतियाँ हैं जिनसे आज का मेहनत बेचकर आजीविका कमाने वाला जूझ रहा है।
सब कुछ खराब ही नहीं है, इसके बावजूद नई तरह के संगठन बन रहे हैं यह ख़ुशी की बात है।
जब तक एक तरफ पूँजी से दम पर एम्प्लॉयी को गुलाम बनाने वाले, उनका शोषण करने वाले रहेंगे, तब तक उससे लड़ने वालों की फ़ौज भी रहेगी।
यह लड़ाई मेहनत करने वालों करोड़ों लोगों और पूँजी के दम पर उनकी शारीरिक मानसिक मेहनत का लाभ उठाने वाले चन्द लाख लोगों के बीच हैं। यह धूर्तों से पसीना बहाने वालों की लड़ाई है।
यह धरती को निगलने , हड़पने को आतुर अरबपतियों, नेताओं और ब्यूरोक्रेटों से धरती को हरा भरा और गुलजार बनाने वालों की लड़ाई है।
मई दिवस इसी धरती को और उसके लायक बेटों बेटियों को उनका हक लेने की लड़ाई है !!
मई दिवस ज़िन्दाबाद !
शिकागो के शहीदों को श्रद्धांजलि !
भारत के कर्मवीरों को लाल सलाम !!


