मतलब का मतलब
मतलब का मतलब
जुगनू शारदेय
अब इतनी मतलब भरी बातें हो रहीं हैं कि कुछ बातें बेमतलब भी मतलब वाली होती जा रही है । सबसे मतलबी बात तो देश की इकॉनॉमी में हो रही है । समझ में नहीं आता कि महंगाई का बढ़ना बेमतलब है अथवा करखनिया उत्पादन लगभग ढाई पौने तीन प्रतिशत कम होना है । किस बात का क्या मतलब निकाला जाए या सारी बातें ही बेमतलब है । हमारे देश के महान अर्थशास्त्री बेमतलब हंा या उनका अर्थशास्त्र बेमतलब है । किस बात का मतलब है या सारी बातें बिना बेमतलब है । इस मतलबी संसार के बारे में गीता ज्ञान का कहना है कि मतलब के फेर में मत पड़ , नहीं तो कांग्रेस पार्टी हो जाएगा । आखिर कांग्रेस पार्टी का क्या मतलब है । हे पार्थ , यहां कांग्रेस पार्टी का मतलब सभी राजनीतिक दल हैं । तभी तो बाबा जयप्रकाश नारायण ने कहा था दलविहीन लोकतंत्र ।
दलविहीन लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं होता । खास तौर पर कांग्रेस पार्टी के लिए । इसके लिए लोकतंत्र का मतलब कांग्रेस पार्टी का लोकतंत्र होता है । तभी तो हुलचुल गांधी ने सारी समस्या की जड़ में दलों के दलदल से बनी सरकार को माना था । इसे नहीं माना मतलब निकालने के विशेषज्ञ हमारे साठा तो पाठा मित्र देवीप्रसाद त्रिपाठी ने । हुलचुल गांधी और डीपीटी में एक ही फर्क है कि हुलचुल बुनियादी तौर पर चुलबुल हैं और डीपीटी हलचल हैं । अब उन्हें यह बताने का क्या मतलब सूझा कि महंगाई के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन तब हुआ जब चुलबुल की दादी जी 1974- 75 में प्रधानमंत्री थीं । श्रीमन साठा तो पाठा भये , पर भूल गए कि कांग्रेसी संस्कृति में इतिहास बताने का कोई मतलब नहीं होता । यहां यह बात याद रखने का कोइ मतलब नहीं होता कि कांग्रेसी संस्कृति मतलब सरकारी संस्कृति है । मतलब वाली बात समझ गए न कि फिर से समझाएं मतलब का मतलब ।
अब यही फर्क होता है खानदानी कांग्रेसी और घड़ी कांग्रेसी में । आज कल दोनों यूपीए हैं । घड़ी कांग्रेसी भी असली में खानदानी कांग्रेसी ही है ।
यहां डीपीटी दलविहीन लोकतंत्र हैं । अब देखिए न घड़ी कांग्रेस के प्रफुल्ल पटेल को ठेठ खानदानी अंदाज में फरमाया कि चुलबुल ने किसी पार्टी
की चुटकी नहीं काटी । समझे न पटेल साब की बात कि डीपीटी की बात को राई का पहाड़ बना दिया गया । मुहावरा थोड़ा गलत हो गया । हवाईजहाज को बैलगाड़ी बना दिया गया । अब इस बात का क्या मतलब है । और मतलब का मतलब बताने का ठेका भी डीपीटी ने ही ले रखा है । यहां पर फिर गलती पर गलती हो रही है ।
दरअसल मतलब का मतलब निकालने का राष्ट्रीय ठेका तो ब्रोकेन न्यूज का होता है । इसका यही तो गुण है कि बिना बात के मतलब का मतलब निकाल लेते हैं । इस मतलबी संसार में मतलब निकालना बहुत ही मतलबी बात है । यूं भी बिना बात के मतलब निकालना कोई इंडिया में किसी से भी सिख सकता है । भारत भी बिना मतलब मतलब बहुत निकालता है और धनमन जी की या बारामती के वीर या तरह तरह के विश्वबैंकी लोगों की मजबूरियों का मतलब नहीं समझता । तो मतलब की बात इतनी है कि कोई मतलब ही न इंडिया में रहा , न भारत में । बस बाबा मतलब का
सब संसार रे बाबा यही है मतलब का मतलब ।


