मथुरा पूरा देश बन चुका है, राजनीति जब मर जाती है तो उसकी जगह उन्माद ही भरता है
मथुरा पूरा देश बन चुका है, राजनीति जब मर जाती है तो उसकी जगह उन्माद ही भरता है
मथुरा पूरा देश बन चुका है
राजनीति जब मर जाती है तो उसकी जगह उन्माद ही भरता है
आस्था और तर्क के बीच अगर अंधी आस्था को उपजाओगे तो वह समाज बाबाओं के शोषण को ही बढ़ावा देगा
चंचल
मथुरा हादसा न घटना है, न ही कोई चूक। यह परिणाम है सालों साल से बनाये जा रहे माहौल का। 47 में हम आजाद होते हैं, नए भारत निर्माण का सपना लेकर। सौभाग्य से हमें एक राष्ट्र नायक मिला पंडित जवाहर लाल नेहरू, जिसने देश को वैज्ञानिक सोच के साथ समाज निर्माण की दिशा दी। अंधविश्वास और जड़ आस्था के खिलाफ अनवरत कार्य किया, क्यों कि इस नायक की मूल सोच ही अंधविश्वास और जड़ आस्था के बरक्स एक तार्किक वैज्ञानिक सोच रही। उनकी लिखी हुयी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक 'भारत एक खोज' देखी जा सकती है। यह पुस्तक इतिहास और समाज की व्याख्या भर नहीं है बल्कि इतिहास बोध है।
कालान्तर में जिस तरह के परिवर्तन हुए उसने हमें मथुरा तक पहुँचा दिया। कांग्रेस सत्ता में रही। समाजवादी आंदोलन खत्म हो गया। साम्यवादी जड़ होकर पिंड बन गए। ऐसे में दायें बाजू की ताकतों को वो मौक़ा मिल गया जिसकी उन्हें तलाश थी। कांग्रेस का इतने दिन तक सत्ता में रहना और उसके खिलाफ माहौल बनना कोइ अनहोनी बात नहीं थी, यह जनतंत्र का अपना नियम है। कांग्रेस के खिलाफ जो माहौल बना उस माहौल के खिलाफ कोइ राजनीतिक लड़ाई सामने नहीं आयी, बल्कि आस्था, अंधविश्वास का खेल सामने लाया गया। मंदिर और मस्जिद का खेल। राम लला को सामने रखा। कांग्रेस समेत तमाम वैज्ञानिक सोच वाले दल इसका माकूल जवाब नहीं दे पाये। इनके अंदर भी बहुसंख्यक के आस्था का उतना खौफ नहीं रहा, बल्कि गणित का डर रहा कि कहीं वह सदैव के लिए उनसे दूर न हो जाय। इसलिए कोई मुखर और तार्किक विरोध नहीं हो सका। यहां तक कि न्यायालय भी इस बिंदु पर लचर हो गया। आज से सत्ताईस लाख से भी ज्यादा समय में राम के जन्म दिन का निर्धारण होता है। और यह काल निर्धारण उन्हीं के धार्मिक ग्रन्थ करते हैं। त्रेता में राम पैदा होते हैं। उनके हिसाब से आज हम कलियुग में खड़े हैं। सत्ताईस लाख साल पहले पैदा हुए राम के जन्म की जगह तय होती है मीर बाकी की बनाई मस्जिद पर। न्यायालय पर भी बहुसंख्यक आस्था और उसके उबाल का दबाव साफ़ साफ़ दिखता है। यहां से अंधी आस्था और उसके विस्तार को निछद्म घूमने का मौक़ा मिल जाता है। उदाहण के लिए कांवरियों का हुजूम देखा जा सकता है। पांच साल पहले तक ये कांवरिये नहीं थे अचानक बम्म बोल सड़क पर आ गए और सारे क़ानून अपने हाथ में ले लिए। गणेश दूध पीने लगे। नजूल की जमीन पर आस्था के झंडे गाड़ने लगे। मथुरा उसकी एक छोटी कड़ी है, आगे भी कुछ देखना बाकी है।
राजनीति जब मर जाती है तो उसकी जगह उन्माद ही भरता है। आज बेरोजगारी, भूख, गैर बराबरी जैसे सवाल उठते ही नहीं,। कल कारखाने, उद्योग धंधे की बात ही नहीं होती। अर्थव्यवस्था टूट चुकी है। पूंजीपतियों के लिए इससे ज्यादा सुनहरा मौक़ा कौन देगा। खरबों कमाने वाले धनपशु किसी एक सड़क पर कुछ हजार खर्च कर एक मंदिर बना देंगे। कांवड़ियों के लिए पानी पिलाने का इंतजाम कर देंगे। और मथुरा की जमीन तैयार होती रहेगी। बुद्धिविलासी डिब्बे के सामने बैठ कर निर्णय देंगे - यह केंद्र का नहीं राज्य का मसला है। कमबख्त इतना भी नहीं समझ पा रहे हैं कि यह राष्ट्र का सबसे बड़ा मसला है।
आस्था और तर्क के बीच अगर अंधी आस्था को उपजाओगे तो वह समाज बाबाओं के शोषण को ही बढ़ावा देगा। इसका हल केवल राजनीति है उसे सीधा करो। मथुरा पूरा देश बन चुका है।


