प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 22 मार्च को मन की बात का उल्लेख किया और किसानों के मन के सवालों को टाल दिया। अपने पूरे भाषण में सरकार की उन सभी दलीलों को दोहराया, जिन्हें भाजपा के सांसद मन्त्री और प्रवक्ता यथावसर प्रचारित करते आये हैं। वास्तव में यह भाषण भी उनके अन्य भाषणों की तरह अर्द्धसत्यों का पुलिन्दा ही है। उनका आरोप है कि संप्रग सरकार द्वारा पारित 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून जल्दबाजी में तैयार किया गया था, इसलिए उसमें किसानों के हितों की अनदेखी हुई है। अभी कुछ समाचारपत्रों ने उस विधेयक पर संसद में भाजपा नेता वर्तमान गृहमन्त्री राजनाथ सिंह के भाषण के उन अंशों को शब्दशः प्रकाशित किया है जिसमें उन्होंने सरकारी और निजी साझे उपक्रमों के लिए प्रभावित किसानों के 70 प्रतिशत व्यक्तियों की सहमति और निजी उपक्रमों के मामलों में 80 प्रतिशत किसानों की सहमति को अनिवार्य बनाने के सुझाव दिये हैं। आज अपने गृहमन्त्री की दलीलों को उलटने की ज़रूरत के बारे में प्रधान मन्त्री किसानों को साफ साफ क्यों नहीं बता रहे ?
प्रधानमन्त्री का कहना है कि निजी कम्पनियों के लिए अधिग्रहण के मामले में किसानों की सहमति ज़रुरी मानी गई है लेकिन साझे उपक्रम में जहां सड़क अस्पताल जैसे सार्वजनिक संस्थाओं का जि़क्र है, वहीं पर इंडस्ट्रियल कॉरीडोर का नुक्ता भी शामिल कर दिया है जो निजी कम्पनियों के लिए चोर दरवाज़े का काम कर सकता है। क्योंकि सरकार तो इंडस्ट्री लगा नहीं सकती इसलिए कॉरीडोर कारपोरेट जगत को ही सुविधा प्रदान करेगा। अपने मन की बात बताते हुए प्रधानमन्त्री ने कहा कि भूमि अधिग्रहण करते हुए सरकार पहले सरकारी ज़मीन उसके बाद बंजर भूमि और अंत में उपजाऊ भूमि पर हाथ डाला जायेगा। शहरी लोगों को शायद मालूम नहीं कि उनके खेल के मैदान और प्रातःकालीन सैर के लिए इस्तेमाल होने वाली ज़मीन सरकारी ही होती है, लेकिन इनके अधिग्रहण से वे केवल कुछ नागरिक सुविधाओं से ही वंचित होंगे लेकिन गांव की शामलात और चरागाह जैसी सरकारी भूमि के अधिग्रहण से उनके आर्थिक सम्बन्धों पर भी चोट पड़ती है। किसान से उनकी चरागाह छीनने का मतलब है उसके पशुओं से चरने का हक छीन लेना और पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अनिवार्य अंग है उसे किसी तरह का नुकसान किसान का नुकसान होता है। इसलिए माननीय प्रधानमन्त्री सरकार ज़मीन का खुलासा करें कि कौन सी ज़़मीन सरकारी नहीं है, जिसे सरकार सबसे पहले अधिग्रहण करेगी। साथ ही आपने उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण को अंतिम विकल्प भी बताया है, लेकिन विकल्प यदि सरकार तय करेगी तो वह अंतिम ही हो यह ज़रूरी नहीं हो सकता क्योंकि सरकार सर्वसत्ता सम्पन्न है इसलिए उसकी इच्छा ही अंतिम विकल्प बन जाता है, इसलिए इसका निर्णय सर्वोच्च अदालत द्वारा किया जाये ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि इस ज़मीन के बजाये कहीं और नहीं जाया जा सकता।
प्रधानमन्त्री ने किसानों कों भरोसा दिया है कि इस कानून के पास हो जाने से रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारतीय किसान सिर्फ किसानी करना जानता है उसे रोज़गार के तौर पर ज़मीन चाहिए जो सरकार के पास कम से कम किसानों के लिए तो है नहीं, इसलिए दूसरे जिस रोज़गार की बात वे कर रहे हैं किसान उसके लिए सक्षम नहीं है। ऐसी स्थिति में किसान जब ज़मीन से उखाड़ा जाता है तो वह शहर में दिहाड़ीदार की हैसियत ही हासिल कर पाता है। क्योंकि हमने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए ज़रूरी तैयारी नहीं की है यानि किसानों को कृषि के अलावा अन्य पेशे के लिए प्रशिक्षित नहीं किया है। शहरों में पहुंचने पर वह किराये के मकान में रहता है। घर से काम पर पहुंचने के लिए बस का किराया देना पड़ता है इस तरह वह अपनी कमाई से बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असफल हो जाता है। हमारे प्रधानमन्त्री किसान की इस त्रासदी की अनदेखी करते हुए कह रहे हैं कि भूमि अधिग्रहण से किसानों को लाभ होगा? अभी एक और बयान आया है खबरची चैनल पर कि पीपीपी मॉडल के कारण किसान को पांच हज़ार रूपये हर महीने पेंशन के तौर पर मिलेंगे।
पता नहीं कि भाजपा सरकार ने समाज कल्याण योजना के अंतर्गत मिलने वाली पेंशन बन्द कर दी है या उसे ही पीपीपी मॉडल के तोहफे के रूप में बदला जा रहा है? मैंने जब अपने गांव के किसान से इस बारे बात की तो उसका कहना था कि यह बात भी काले धन को वापिस लाने पर हर व्यक्ति के बैंक खाते में पंद्रह लाख रुपये जमा करने जैसी बताया। एक और आश्वासन मिला है कि यदि किसान सरकार के इस नये कानून को स्वीकार कर लें तो उन्हें अफसरशाही के चंगुल में प्रधानमन्त्री जी फंसने नहीं देंगे और किसान चाहें तो अपना केस कोर्ट में ले जा सकते हैं। देश के आम आदमी का अनुभव है कि जब कभी सरकार को नागरिक और अफसर के बीच चुनाव करना पड़ा तो अधिकतर मामलों में सरकार ने अफसर को बचाने की हर मुमकिन कोशिश की है। कोर्ट कचहरी से किसान बचने में ही कुशलता मानता है क्योंकि उसका खर्च वह वहन नहीं कर पाता अतः यह दिलासा किसी प्रकार से विश्वसनीय नहीं है। इसी तरह चारगुणा मुआवजा लेकर वह शहर में रहने लायक मकान भी नहीं खरीद सकेगा। जैसी कीमतें आजकल चल रही हैं जिसमें दो तीन कमरों का फलैट भी पच्चीस तीस लाख से कम कीमत पर नहीं मिलता फिर मिलेगा। ऐसा भी प्रधानमन्त्री जी ने कहा है कि किसान को भी अस्पताल चाहिये स्कूल कालेज चाहिए आखिर वे हवा में तो बनाये नहीं जा सकते उसके लिए ज़मीन नही चाहिए होती है। इस बात से कौन इन्कार कर सकता है लेकिन अस्पताल में गरीब की लाश को इलाज का पैसा न चुकाने पर बन्घक रखने का दुष्कर्म भी तो इसी देश की गरीब जनता ने झेला है।
इसका मतलब यह नहीं कि विकास के काम रोक दिये जांयें। क्योंकि भाजपा सरकार ने तो आते ही योजना आयोग का अस्तित्व समाप्त किया कि इससे विकास के काम करने मे देर लगती है। पर जहां आप लोगों के जीवन की नींव ही उखाड़ रहे हों वहां जल्दबाजी से अंधेर होने की सम्भावनाएं पैदा होती है। भूमि अधिग्रहण अपरिहार्य हो वहां प्रभावित किसान परिवार को कानून में तय चार गुणा मुआवज़ा देकर उसकी ज़मीन पर यदि अस्पताल बने तो उसके परिवार वालों का वहां मुफ्त में इलाज़ हो यदि कालेज या यूनीवर्सिटी स्थापित हो तो उसके बच्चों की मुफत शिक्षा का प्रावधान हो और यदि वहां कारखाना लगे तो उस परिवार के शारिरिक तौर पर सक्षम व्यक्तियों को नौकरियां देने जैसे आश्वासन का कानून संगत व्यवस्था हो तो हर कोई मानेगा कि भाजपा सरकार वास्तव में किसान हितैषी है।
सुन्दर लोहिया
सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।