दो माह बाद – धार के सामूहिक लैंगिक हिंसा और लूट के मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं

क्या पुलिस कानून की रक्षक है या भक्षक?

भोपाल, 29 मार्च। पिछली 23 फरवरी को एक महिला जाँच दल ने धार ज़िले के होलाबायदा और भूतिया गाँवों का दौरा किया। इस इलाके से ज़िला पुलिस दल के द्वारा लूट और तोड़-फोड़ के साथ ही 9 महिलाओं के साथ लैंगिक हिंसा की खबरे आ रही थीं । इनमें 2 नाबालिग लड़कियों के साथ लैंगिक हिंसा और 4 महिलाओं के साथ बलात्कार भी शामिल था।

चूँकि इस घटना के बारे में कहा जा रहा था कि मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया है, अतः सीधी जानकारी प्राप्त करने के लिए मध्य प्रदेश महिला मंच की ओर से दल ने क्षेत्र का दौरा किया। जाँच दल महिलाओं से उनकी आपबीती सुनकर हतप्रभ और आतंकित है। जाँचदल में टुलटुल विश्वास, प्रियंका, शिवानी बाजपेई व सबा शामिल थीं।

जाँचदल के सदस्यों ने कहा

“हमारा मानना है कि इस मामले में राज्य सरकार अपने ही पदाधिकारियों के किए गए कार्यों के चलते लोगों के नागरिक अधिकारों के बचाव में बुरी तरह से विफल हुई है।“

जाँच दल को एक अधेड़ उम्र की महिला ने दिखाया कि कैसे, जब वे अपनी नवविवाहित बेटी के शादी का सामान और सोयाबीन बेचकर कमाए गए पैसों के लुटने का विरोध करने सामने आईं, तो उन्हें चुप कराने के लिए एक पुलिसवाले ने उन्हें गिराया और वहीं उनका बलात्कार किया।

एक और महिला ने - जो अपने बच्चों के साथ अकेले रहती हैं - चूल्हे की ओर दिखाते हुए बताया कि जब उन्होंने लूट-खसोट का विरोध किया तो उन्हें घसीटते हुए वहाँ ले जाकर उनका बलात्कार किया गया था।

एक और महिला - जिन्हें देखकर ही पता चलता है कि वे लगभग 6 माह की गर्भवती हैं - के साथ भी बलात्कार किया गया। कई युवतियों और युवा माताओं के साथ भी छेड़छाड़, स्तनों और शरीर के अन्य भागों को गलत तरीके से छूने का शिकार बनाया गया।

25 जनवरी के तड़के की गई इस पुलिस कार्यवाही में 13 थानों तथा ज़िला पुलिस मुख्यालय के 220 से अधिक पुलिसकर्मी शामिल थे।

पुलिसवालों द्वारा की गई हिंसा को पुलिस अपने जवाबी आरोपों के घेरे में छिपाने की कोशिश में लगी है कि इस गाँव में कई अपराधी रहते हैं और स्थानीय लोगों के खिलाफ कई वारंट हैं।

जाँच दल का स्पष्ट मत है, कि जैसा सभी समुदायों में होता है - यह सम्भव है कि हर जाति और वर्ग के लोगों में कुछ आपराधिक तत्व मौजूद हों। परन्तु किसी समुदाय पर हमला बोलकर महिलाओं का बलात्कार करना, घरों को लूटना और घरेलु सामान की तोड़-फोड़ करना किसी भी परिस्थिति में गलत है और एक आपराधिक कृत्य है। जाँच दल ने पुलिस द्वारा जारी 143 वारंट की सूची को भी देखा। एक सरसरी निगाह से ही स्पष्ट हो जाता है कि इसमें कुछ नाम बार-बार दोहराए जा रहे हैं - जिससे यही पता चलता है वारंट की संख्या और वारंट में नामजद आरोपियों की संख्या समान नहीं है। पुलिस ने उन पर गोली चलाए जाने की बात भी कही है, परन्तु न तो कोई हथियार बरामद किए गए हैं, न ही किसी को गोली लगने की बात दर्ज है।

जाँच दल को यह साफ है कि पुलिस अपने बचाव में ये बहाने बना रही है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि गाँववालों द्वारा किए गए तथाकथित आपराधिक काम की गम्भीरता कितनी भी क्यों न हो, पुलिस द्वारा की गई लूटपाट और हिंसा को इसके बहाने जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

जाँच दल ने होलीबायदा और भूतिया के प्रभावित गाँवों में बड़े पैमाने पर किए गए माली मुकसान के प्रमाण भी देखे। ढेर सारे घरों के छत गिरा दिए गए हैं, खिड़कियाँ तोड़ी गई हैं और अनाज चुरा लिया गया है। इसके अलावा बदले की कार्यवाई में किए गए तोड़-फोड़ के निशान भी साफ दिखते हैं – जैसे अगले साल की फसल के लिए रखे सोयाबीन के बीजों में कीटनाशक मिला देना, पारम्परिक वाद्य-यंत्रों को फाड़ना, खाट-कुर्सी आदि और बर्तन-भांडे कुचलना या तोड़ना। कुछ घरों को तो इस कदर तहस-नहस कर दिया है कि लगता है कोशिश यही थी कि इन लोगों का अस्तित्व ही न रहे।

जाँच दल केसदस्यों ने कहा,

“शायद इस प्रदेश का कानून ही है जिसकी मदद से एक चुनी हुई सरकार की राज्य पुलिस ऐसे गाँवों के बाशिन्दों को बलात्कार, लूट और तेड़-फोड़ से डरा रही है जहाँ हम आज तक बुनियादी ज़रूरत की सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। यहाँ बिजली के खम्बे बगैर तारों के खड़े हैं। एक कमरे का एक स्कूल है जो ताले में बन्द पड़ा है। लोग आजीविका के लिए बड़ी संख्या में कपास चुनने गुजरात पलायन कर जाने को मजबूर हैं।

हमारे देश में आपराधिक जनजाति अधिनियम तो 1950 में ही रद्द कर दिया गया था। परन्तु पुलिस इन गाँवों के बाशिन्दों के बारे में लगभग उसी अन्दाज़ में बात करती है जैसा कि इस कानून के दौर में ब्रिटिश लोग करते थे। आज़ादी के 70 साल हुए - एक पूरी पीढ़ी का दौर गुज़रा - परन्तु एक पूरा समुदाय आज भी गुलामी में जकड़ा हुआ है। उन पर की गई हिंसा की उनकी शिकायतों को शक की नज़र से देखा जाता है क्योंकि हिंसा बरपाने वाले खुद सत्ता पर काबिज़ हैं।

हमारा संविधान कानून के आगे हर व्यक्ति को बराबरी का हक देता है। परन्तु राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय जनजाति आयोग के दौरों के और एक विशेष जाँच दल (SIT) के गठित किए जाने के बावजूद कोर्ट में धारा 164 के तहत बलात्कार की पीड़िताओं के बयान लिए जाने में एक महीने से ज़्यादा समय लग गया। और आज, घटना के 2 महीने बीत जाने के बाद भी - आरोपियों को पहचानने के लिए पहचान परेड जैसी कोई कोशिश नहीं की गई है। लैंगिक हिंसा, लूटपाट और माली नुकसान की शिकायतें तो अभी तक दर्ज भी नहीं की गई हैं। घटना के दो माह बीत जाने के बाद भी SIT का कथन है कि वह लोगों के बयान तक पूरे नहीं कर पाई है क्योंकि त्यौहारों और स्थानीय परिस्थितियों के कारण यह सम्भव नहीं हुआ है। इस तरह का ढीला और देर करते जाने का रवैय्या प्रभावित लोगों को और प्रताड़ित करने के बराबर ही है।

दक्षिण छत्तीसगढ़ और कश्मीर व उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती प्रदेशों के संघर्ष क्षेत्रों में वर्दीधारियों को इस तरह के अभयदान का लाभ लेते देखा जा सकता है। परन्तु अब संघर्ष क्षेत्रों के अलावा भी पुलिस या राजनैतिक दलों के नेतृत्व में होने वाली हिंसा अपना सिर उठाने लगी है। राज्य की राजधानी भोपाल से भी भूतपूर्व आपराधिक जनजातियों के महिला-पुरुष और बच्चों के साथ सरकारी हिंसा और गैर-कानूनी धर-पकड़ की घटनाएँ सामने आई हैं। वर्ष 2007 में बेतूल ज़िले के चौथिया गाँव की 12 महिलाओं के साथ हुई लैंगिक हिंसा की घटना और एक दम्पति की हत्या का मामला भी अब तक न्याय की माँग में अनसुलझा है।

आज, कानून के रखवाले खुलकर दंडमुक्ति का लाभ ले रहे हैं और अपने अधिकारों के तहत समाज के वंचित तबकों पर जुल्म बरपा रहे हैं। हमारी माँग है कि राज्य सरकार होलीबायदा और भूतिया के हिंसा के दोषियों को तत्काल सज़ा दे और पुलिस द्वारा इस तरह की अनुशासनहीनता की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं करने का उदाहरण पेश करके राज्य में कानून व्यवस्था बनाने की दिशा में काम करे।“