महामहिम! क्योंकि हम भी इस देश के नागरिक हैं…
महामहिम! क्योंकि हम भी इस देश के नागरिक हैं…
(राष्ट्रपति के नाम ख़त)
प्रति,
राष्ट्रपति,
भारत गणराज्य.
विषय - .........क्योंकि हम भी इस देश के नागरिक हैं.
महोदय,
आप भारत गणराज्य के प्रथम नागरिक हैं और आपको यह पत्र एक साधारण नागरिक के बतौर लिखा जा रहा है. आप जिस राज्य से आते हैं संयोग से हम भी उसी राज्य के हैं. उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ मंडल के बलिया जिले में दलित समुदाय के दो युवकों के साथ अमानवीय आपराधिक कृत्य हुआ है. शायद आपको भी समाचार के माध्यमों से खबर हो. इस घटना के बाद एक नागरिक के बतौर हमारा सर शर्म से झुक जाता है. आज़ादी के पचास साल पूरे होने पर दलित समाज का एक प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन राष्ट्रपति से मुलाकात की थी और भारत में दलितों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार और भेदभाव पर अपनी शिकायत की थी.
देश को आज़ाद हुए सात दशक हो गए हैं यानि कि 70 साल. आज फिर एक पत्र आपको लिखा जा रहा है. बलिया जिले में रसड़ा क़स्बे में कथित गाय चोरी के नाम पर उमा और सोनू नाम के युवकों को कुछ लोगों ने पकड़ लिया. महोदय दोनों युवक दलित हैं. इसके बाद कथित भीड़ ने दोनों युवकों को सर मुड़वाया, चेहरे पर कालिख पोती. यानि चेहरा काला किया गया. फिर चुना पोता गया. महोदय जिसका वीडियो भी बनाया गया है. आप सोशल मिडिया पर देख सकते हैं. लोग उन युवकों को गाली दे रहे हैं, उनका सरेआम सर मुड़ाया जा रहा है. इतना ही नही राष्ट्रपति महोदय लोग बड़े ही गर्व से उन दलित युवकों के साथ फोटो खिंचा रहे थे जैसे उन्होंने राष्ट्रहित में कोई बड़ा काम किया हो, जिससे देश का नाम रोशन हो रहा हो. अगर आपने वीडियो देखा हो या आप देखेंगे तो साफ़ –साफ़ दिख रहा है कि गले में भगवा गमछा डाला युवक क्या कर रहा है. आप को भगवा गमछे का मतलब तो पता ही होगा.
श्रीमान जी, इतिहास में दलितों के साथ जो हुआ वह सबको पता है, आपको भी पता होगा कि किस तरह से हजारों साल तक दलितों के साथ अमानवीय कृत्य हुआ. उन हज़ार सालों के अवमानना के इतिहास पर हमको शर्म आती है पर शिकायत नही है क्योंकि तब शासन तंत्र की कोई इस तरह की जिम्मेवारी नही थी लेकिन महोदय जब इस देश में लोकतंत्र की बुनियाद रखी जा रही तो देश के नेताओं ने एक बेहतर भारत के लिए वादा किया था और कहा गया था की बेहतर भारत तब तक नही बन सकता जब तक एक भी नागरिक के आँखों में आंसू होगा. श्रीमान जी यह वादा देश के नाम संबोधन में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे. यह संबोधन अंग्रेजी में दिया जा रहा था. हमने किताबों में पढ़ा है कि दिल्ली में लाखों लोग जमा थे और बहुत सारे लोग संबोधन सुनकर रो रहे थे. महोदय यह ख़ुशी के आंसू थे रोने वालों में बहुत सारे लोग थे जो समझ नही रहे थे किक्या बोला जा रहा फिर भी उनकी आँखों में ख़ुशी के आंसू थे.
आज आज़ादी मिले 70 साल हो गए हैं. बहुत कुछ बदल गया है. दलित समाज ने प्रगति भी की है. समाज से दो लोग इस गणराज्य पहले नागरिक भी हुए जिसमें आप भी हैं. लेकिन निचले स्तर पर हालात बहुत बुरे हैं. बलिया जैसी घटना रोज हो रही हैं. महोदय, आप देश के सर्वोच्च नागरिक हैं पर दलितों को समाज का एक बड़ा हिस्सा नागरिक मानने को तैयार नही हैं इसलिए इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं कि गाय के नाम पर दलितों के साथ ही साथ मुसलमानों को भी आये दिन मारा-पीटा जा रहा है. दर्जनों तो इस तरह की घटनाएँ हुई हैं जिसमें जानें चली गयी. महोदय एक नागरिक के तौर पर आपसे गुहार है, निवेदन है कि कम से कम एक जानवर के लिए समाज के एक बड़े हिस्से के साथ इस तरह का व्यवहार न किया जाये. क्योंकि हम भी इस देश के नागरिक हैं.
दिनांक
11-01-2018
बड़ी उम्मीद के साथ
अनिल यादव
रिहाई मंच


