हस्तक्षेप ब्यूरो
तिलक तराजू और तलवार/ अब न सहेगा अत्याचार
क्या समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के खिलाफ जंग आर-पार करने का मन बना लिया है? हाल के कुछ फैसले देखकर लगता तो ऐसा ही है। एक तरफ सूबे की सरकार ने मायावती के बनवाये पार्कों को शादी विवाह के लिये किराये पर उठाने की घोषणा करके मायावती के जख्मों पर नमक छिड़का है और फिर से बहुजन समाज के खिलाफ पिछड़ों और सवर्णों की नफरत को भड़काने का काम किया है।

ऐसा करना फिलहाल सपा की मजबूरी भी है। उसका एमवाई समीकरण खतरे में पड़ गया है। जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी की तरफ से मोदी का शोर बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे सपा के मुस्लिम वोट में टूटन की सम्भावना नज़र आ रही है। इधर खालिद मुजाहिद हत्याकाण्ड पर भी सरकार की नादानियों और पुलिस अधिकारियों को बचाने की कवायद की वजह से मुस्लिम मतदाता पर असर खराब पड़ा है। लगता यही है कि सपा अपना पलड़ा भारी रखने के लिये एक बार फिर सूबे में बसपा के खिलाफ मोर्चा खोलेगी। सपा की रणनीति बतायी जाती है कि वह सवर्ण मतदाता में यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि पदोन्नति में आरक्षण के मसले पर भारतीय जनता पार्टी तो संसद् में बसपा के साथ खड़ी हो गयी थी और अगर सपा न अड़ती तो लोकसभा में भी पदोन्नति में आरक्षण पर संशोधन विधेयक पारित हो जाता।

पिछले दिनों सपा द्वारा परशुराम जयन्ती को मनाये जाने को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। साथ ही पिछले वर्ष मायावती की मूर्ति को हथौड़े से तोड़ने वाले उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के प्रमुख अमित जानी से मुकदमे उठाये जाने की तैयारी को भी पार्टी की बसपा के खिलाफ जंग तेज करने की रणनीति समझा जा रहा है।

इसी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश नवनिर्माण सेना के प्रमुख अमित जानी ने आगामी 26 जुलाई 2013 को लखनऊ में "स्वाभिमान महापंचायत" की घोषणा की है। जानी का दावा है कि महापंचायत में सवर्ण, पिछड़ी व अल्पसंख्यक जातियों के राज्य भर से 10 हजार से अधिक प्रतिनिधि भाग लेंगे। महापंचायत का मकसद प्रोन्नति में आरक्षण विधेयक व हरिजन एक्ट जैसे कानून के खिलाफ आन्दोलन के लिये खाप पंचायतों सहित सभी गैरदलित जातियों को एक झंडे के नीचे लाने की कवायद बताया जा रहा है। हालाँकि 26 जुलाई 2012 की घटना के बाद सपा जानी से अपना रिश्ता अस्वीकारती रही है लेकिन जानने वाले समझते हैं कि जानी के ऊपर हाथ समाजवादी पार्टी का ही है। जानी जिस मंच और झंडे की बात करते हैं वो समाजवादी पार्टी का ही है उसी समाजवादी पार्टी का जो दलित महापुरुषों के नाम पर बने जिलों, पार्को और संस्थानों का नाम बदल कर पहले भी संकेत दे चुकी है कि उसको दलित वोट की कोई परवाह नहीं है। खुद जानी के् पोस्टर में उन्हें वरिष्ठ नेता - समाजवादी पार्टी लिखा गया है।

महापंचायतो का चलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है और अमित जानी मेरठ के निवासी हैं। महापंचायत नाम से गैर दलित जातियों के साथ- साथ पश्चिमी उप्र को साधने का भी यह प्रयास हो सकता है। क्योंकि पश्चिमी उप्र में सपा अपेक्षाकृत कमजोर है जबकि बसपा मजबूत है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में भाजपा व काँग्रेस के बीच किसी भी सम्भावित धार्मिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिये समाजवादी पार्टी अपना गैर दलित एजेण्डा मजबूत करने का प्रयास करेगी। सपा की कोशिश रहेगी कि दलित बनाम गैर दलित फैक्टर इतना तूल पकड़ जाये कि सवर्ण और पिछड़ों का हिन्दुत्व का नशा उतर जाये और मायावती के प्रति नफरत उफान मारे।

पिछले साल 26 जुलाई को ही लखनऊ में मायावती की प्रतिमा का टूटना और उसी संगठन द्वारा 26 जुलाई को ही फिर लखनऊ में ही सपा के झण्डे के रंग में महापंचायत का ऐलान करना फिर एक नये ध्रुवीकरण की तरफ इशारा कर रहा है।