साम्प्रदायिकता का उपचार सद्भाव और सहअस्तित्व का भाव है

मधुवन दत्त चतुर्वेदी

मि. प्राइम मिनिस्टर !

तारतार सौहार्द और ध्वस्त आर्थिक स्थिति के बीच अपने पड़ोसियों से लगातार रार और बदनाम व्यापारियों से प्यार के रास्ते पर हिंदुस्तान को लेजाकर क्यों इससे खिलबाड़ कर रहे हो ? ये मीडिया और भक्तों की जैजैकार चुनाव जिता सकती है, जंग नहीं जनाब !

सभी किस्म की साम्प्रदायिकताऐं समाज के शोषकों की ढाल होती हैं। वे अन्य समुदायों के उन्मूलन में अपने लोगों के सुख को सिद्ध करती हैं और अपने ही लोगों द्वारा अपने लोगों की लूट खसोट पर पर्दा डालती हैं।

सभी किस्म की सांप्रदायिकताएँ अन्योनाश्रित होती हैं। वे एक दूसरे की पोषक होती हैं, एक दूसरे की संजीवनी होती हैं।

'लोहे को लोहा काटता है' का सिद्धांत इस मामले में नहीं चलता है। साम्प्रदायिकता का उपचार सद्भाव और सहअस्तित्व का भाव है।

सूत्र पुराना तो है,

पर सदा सुसंगत भी है कि 'दूसरों के प्रति वही व्यवहार करो जो आप अपने साथ चाहते हैं।'

भारत के हिन्दू और मुसलमान साम्प्रदायिक एवं जातिवादी भी यदि इस सरल सूत्र को भी समझ लें, इस कसौटी पर अपने शब्दों और आचरण को रखकर देखने लगें तो कदाचित उनके विष में कुछ कमी आ सकती है।