मीडिया के मित्रों और भक्तों ने पिछले कुछ महीनों मे जिस तरह से 56 इंची जुमले को हकीकत मे बदलने का बीड़ा उठाया है, उससे मोदी सरकार को इस तरह की शर्मिंदगी होना लाज़िमी है । पिछले दो दिनों में मीडिया मे म्यांमार सीमा के पास सेना के कॅवर्ट (खुफिया) ऑपरेशन का जिस तरह से 'ऑपरेशन' किया जा रहा था उससे मुझे यह अंदेशा तो हो ही गया था... कि नेपाल के बाद यहां भी जल्द ही अपनी मट्टी पलीत होने वाली है। सेना के बेहतरीन प्रयासों की छीछालेदर कराने में.. भक्तों के साथ मिलकर मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी है।।

..56 इंची छाती पर चढ़कर ढोल पीटने के चक्कर में अतिउत्साही मोदी सरकार और मीडिया कुछ मूलभूत बाते ही भूल गयी..जैसे...पहले तो हम सब को यह बात समझ लेनी चाहिये कि ना तो हमारी भौगोलिक..ना तो आर्थिक ..ना ही राजनितिक संरचना ऐसी है कि हम बात बात पर अपनी तुलना अमरीका से करें। दूसरी ये कि सेना अपना काम हमेशा ही बहादुरी और कुशलता से करती रही है.. ऐसे ऑपरेशन पहले भी हुये हैं (फेसबुकी ज्ञानी अगर कुछ ज्ञान किताबों/अख़बारों से इकठ्ठा करना चाहेंगे ते जान जायेंगे)- बिना किसी शोर शराबे के..जो की किसी भी सर्जिकल ऑपरेशन और द्विपक्षीय राजनैतिक रिश्तों की पहली शर्त होती है ।।

म्यांमार एक छोटा सा..शांतिप्रय देश है जो चीन, बाग्लादेश और वियतनाम के भी उतना ही करीब है (भौगोलिक और राजनैतिक रूप से) जितना कि भारत के... सो अगर ऐसा ऑपरेशन हुआ भी है तो भी कोई राष्ट्र यह नहीं चाहेगा कि अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में कोई भी यह कहे कि "हमने फलां फलां देश मे घुसकर (ध्यान रहे..हम 'सहयोग से' नहीं कहा) आतंकवादी मारे हैं "...इससे उस देश के आस्तित्व पर सवालिया निशान लग जाते हैं ..दुनिया उसकी क्षमता को शक की नजर से देखने लग जाती है।
...सनद रहे जिस तरह से हमने ढिंढोरा पीटा है और मीडिया ने सेना की ताकत का चीरफाड़ किया है (सैन्यबल से लेकर हैलिकॉप्टर और मारक मिसाइलों तक ).. वह न सिर्फ पड़ोसी देशों से हमारे रिश्ते बल्कि सेना की गुप्त जानकारीयों के लिहाज से और भविष्य में होने वाले ऐसे किसी भी सैन्य कार्यवाही के लिये भी खतरा है। राजवर्धन राठौर तो खुद सेना मे रहे हैं वो तो " covert" शब्द के महत्व को जानते ही होंगे.....
खैर..बाकी तो आप सब खुद ही समझदार हैं..

नीरज द्विवेदी

नीरज द्विवेदी, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।