नाम की रह गई है बहस

प्रेम सिंह

अगले आम चुनाव में करीब आठ महीने रह गये हैं। अभी 11 नवंबर और 4 दिसंबर के बीच देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। लोकतंत्र के नाते ऐसे में जरूरी है देश के सामने दरपेश समस्याओं और चुनौतियों पर गंभीर राजनीतिक बहस हो। बहस के केंद्र में ऐसे विचार, नीतियां और कार्यक्रम हों जिनसे विशेषकर देश की मेहनतकश जनता, जो थोड़े-से उच्च और उच्च मध्यवर्ग को छोड़कर देश की अधिकांश आबादी है और गरीब है, का जीवन जल्द से जल्द सुख-सुविधापूर्ण हो; वह शिक्षित, स्वस्थ, सुरक्षित और स्वाभिमानी बने; और उसके संविधान-प्रदत्त अधिकार सहजता से उपलब्ध हों। आजादी के बाद करीब सात दशकों में यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है, बहस में इसकी ईमानदारी से गहरी जांच-पड़ताल हो, ताकि लक्ष्य जल्द से जल्द हासिल किया जा सके।

गंभीर बहस की जिम्मेदारी मुख्यतः राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों और सचेत नागरिक समाज की बनती है। इनके द्वारा की जाने वाली बहस का प्रभाव सामान्य जनता पर होता है और वह उसमें अपने स्तर से हिस्सेदारी और योगदान करती है। प्रबुद्ध वर्ग और सामान्य जनता के सम्मिलित विमर्श से चुनाव में अच्छी बहस का माहौल बन सकता है, जिसमें से नए विचार और समाधान निकल कर आ सकते हैं। भारत की राजनीति में, खास कर चुनावों के वक्त, जब तक यह होता रहा, नीति-निर्धारण का काम कुछ हद तक संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों की रोशनी में होता रहा। उस दौर में कोई भी पार्टी या नेता जनता और उसके हित के मुद्दों को छोड़ कर कारपोरेट घरानों की चापलूसी और ताबेदारी की वैसी हिम्मत नहीं दिखा सकता था जो आज दिखाई जा रही है।

नवउदारवादी दौर में भारत की राजनीति भारत के संविधान के निर्देशानुसार भारत की मेहनतकश जनता के लिए नहीं चलाई जा रही है। इस सच्चाई को छिपाने के लिए गंभीर और टिकाऊ बहस की जगह उत्तरोत्तर थोथी बहस ने ले ली है। मुख्यधारा प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों में यह देखा जा सकता है। इस बार 2009 के आम चुनाव के समय की बहस से भी स्तर काफी नीचे चला गया है। इस बार नीतियों की नहीं, केवल नामों को लेकर ‘बहस’ चल रही है। ‘कलियुग केवल नाम अधारा’ की टेक पर कांग्रेस और भाजपा ने अगला चुनाव जीतने का मंसूबा बांधा है। ज्यादातर नागरिक समाज उनके तय किये गये नामों तक राजनीतिक बहस को सीमित किये हुए है।

हम लोगों ने जेपी की पुण्यतिथि 8 अक्तूबर से लेकर उनकी जयंती 11 अक्तूबर तक आयोजित सोशलिस्ट पार्टी के ‘समाजवाद लाओ-पूंजीवाद हराओ’ अभियान के तहत दिल्ली के कुछ इलाकों में 11 सूत्री परचा बांटा और नुक्कड़ सभाएं की। हमारा मकसद आने वाले आम चुनाव में कारपोरेट पूंजीवाद और उसकी एजेंट सरकारों और राजनीति के बरक्स समाजवादी विचारों पर बहस छेड़ने का था। रिक्शा वालों और रेहड़ी-पटरी-खोका वालों ने परचा उत्साह से लिया और उसे तुरंत पढ़ा। लेकिन सुबह पार्कों में हवाखोरी करने वाले शहरियों में कई ने हमारी कवायद की उपेक्षा करते हुए कहा कि यह सब छोड़ो, मोदी को लाओ; वह सब कुछ ठीक कर देंगे। परचे की सामग्री पढ़ना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। कांग्रेस ‘सोनिया मैया’ और ‘राहुल भैया’ का नाम भजने में लगी रहती है और चाहती है कि बाकी लोग भी वैसा ही करें। कांग्रेस-भाजपा की राजनीति के साथ संगत करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों में भी एक ही व्यक्ति/परिवार का नाम चलता है।

कांग्रेस और भाजपा के भीतर से निकल कर उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने वाली आम आदमी पार्टी (आप) में भी एक के अलावा दूसरा नाम नहीं है। सामंती संस्कारों पर पलने वाली भारत की कारपोरेट पॉलिटिक्स में कांग्रेस-भाजपा से आगे निकलने की हड़बड़ी में आम आदमी के नाम पर जमा हुए लोगों ने नीति की जगह नाम की महिमा को अच्छी तरह पहचान लिया है। भारत में नाम की महिमा पुरानी और खासी रही है जो धर्म से निकल कर समाज को अपनी गिरफ्त में लेते हुए राजनीति में गहरी जड़ जमा चुकी है। ध्यान दिया जा सकता है पिछले दिनों हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अन्ना नाम की कैसी पुकार मची थी। उसी आंदोलन से यह पार्टी निकल कर आई है और अन्ना उसके साथ नहीं आए तो अन्ना को लाने वाले का नाम आगे किया गया है।

एक मायने में इस पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा को भी पीछे छोड़ दिया है। उसने चुनाव के कई महीने पहले पोस्टरों और होर्डिंगों पर प्रचार कर दिया कि दिल्ली के मतदाताओं ने उनके नेता को भारी बहुमत से मुख्यमंत्री चुन लिया है। चुनाव की घोषणा नहीं हुई थी, अधिसूचना तो अभी तक जारी नहीं हुई है; अन्य पार्टियों की बात छोड़िये, खुद ‘भावी मुख्यमंत्री’ की पार्टी का एक भी विधानसभा क्षेत्र से एक भी उम्मीदवार घोषित नहीं हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री चुन लिए जाने का फतवा जारी कर दिया गया। इसकी परवाह किये बगैर कि लोकतंत्र और दिल्ली के मतदाताओं की इससे ज्यादा तौहीन नहीं हो सकती। मजेदारी यह कि भाजपा ने अब जाकर अपना मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया है। लेकिन आप ने भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष को बतौर मुख्यमंत्री ‘आप’ और कांग्रेस से फिसड्डी घोषित कर दिया। कांग्रेस ने भी अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा आज तक नहीं की है। ‘आप’ के सर्वे-शूरवीरों ने वर्तमान मुख्यमंत्री को कांग्रेस की अगली मुख्यमंत्री घोषित करके उन्हें करारी शिकस्त दे दी। बतौर मुख्यमंत्री ही नहीं, बतौर विधायक भी।

यह हमारे दौर का बड़ा विद्रूप है कि लोकतंत्र के इस उपहास को मुख्यधारा मीडिया दिन-रात ‘गंभीरतापूर्वक’ परोस रहा है। हिंदी के एक लेखक-बुद्धिजीवी ने ‘आप’ को बुद्धिजीवियों की शरणस्थली बताते हुए अफसोस जाहिर किया है कि दो नाम यानी अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल मिल कर चलते तो व्यवस्था बदल जाती। पता नहीं क्यों उन्होंने रामदेव का नाम छोड़ दिया, दोनों जिनके साथ मिल कर व्यवस्था परिवर्तन कर रहे थे? विश्व बैंक और फोर्ड फाऊंडेशन से धन लेकर ‘मेरा गांव मेरा देश’ की सेवा करने वालों को उन्होंने गांधी, जेपी, लोहिया और नेहरू जी के समकक्ष बिठा दिया है। बेहतर होता इस नामावली में भगत सिंह और बाबा साहब को भी शामिल कर लेते।

पिछले दो साल से यह लगातार हो रहा है कि आजादी के महान सेनानियों और विश्व स्तरीय चिंतको को अनर्गल ढंग से नवउदारवाद के एजेंटों के साथ घसीटा जा रहा है। यह शायद ही कोई स्वीकार करे कि ये स्वतंत्रता सेनानी और चिंतक इन स्वनामधन्यों जैसे ही ‘देशभक्त’ थे। दरअसल, इन फर्जी देशभक्तों के नाम को ऊंचा उठाने के लिए देश के मूर्द्धन्य नेताओं को सस्ता बनाया जा रहा है। हमें बताया गया कि एक टीवी चैनल की ‘बहस’ में हिंदी के एक अखबार के संपादक ने ‘आप’ की आलोचना करने के लिए हम पर परोक्ष कटाक्ष किया। नाम शायद उन्होंने इसलिए नहीं लिया बड़े नामों के बीच छोटा नाम नहीं आना चाहिए। ऐसे लोगों का तर्क है कि ‘आप’ के नेता फलां तारीख तक विदेशी फंडिंग लेते थे, उसके बाद लेना बंद कर दिया है। यानी, नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली है! जाहिर है, ‘आप’ के ये समर्थक पिछली फंडिंग की बात करके अभी की विदेशी फंडिंग और चुनाव क्षेत्रों को अनिवासी भारतीयों द्वारा गोद लेने के ‘प्रयोग’ से जनता का ध्यान हटाना और उसका औचित्य प्रतिपादन करना चाहते हैं।

‘आप’ द्वारा चुनाव के लिए विदेशों से धन लेने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक वकील की जनहित याचिका स्वीकार कर सरकार को जांच के आदेश दिए हैं। एक अन्य वकील ने गृह सचिव और मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रतिवेदन देकर अविलंब जांच और कार्रवाई की मांग की है। लेकिन यह चर्चा मीडिया में जोर नहीं पकड़ती। जोर पकड़ेगी तो कांग्रेस-भाजपा से परेशान लोग ‘आप’ के बजाय अन्य पार्टियों की तरफ रुख कर सकते हैं जिनमें कुछ अभी भी समाजवाद/सामाजिक न्याय की बात करती हैं। कुछ छोटी पार्टियां भी देश में हैं जो जड़-मूल से कारपोरेट पूंजीवाद का विरोध करती हैं और समाजवादी व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध हैं।

‘बदनाम होंगे तो क्या नाम नहीं होगा’ - सत्ता में हिस्सेदारी का यह नवउदारवादी नुस्खा, जिसे आत्मसात करने में कांग्रेस-भाजपा और क्षेत्रीय क्षत्रपों को काफी लंबा समय लगा, ‘आप’ और उसके समर्थकों ने घुट्टी में ही पी लिया है। हमने कुछ साल पहले ‘युवा संवाद’ में लिखा था कि नवउदारवाद के दौर में निर्लज्जता ही उसके समर्थकों का आभूषण बन गई है। सत्ता की चादर समस्त निर्लज्जताओं को ढंक देती हैं - कारपोरेट राजनीति का यह मूल पाठ अच्छी तरह पढ़ कर ‘आप’ ने राजनीति की शुरुआत की है। ‘आप’ का बड़बोलापन भी गौर करने लायक है। डरा हुआ आदमी ज्यादा जोर से हनुमान चालीसा पढ़ता है। ‘आप’ और उसके मुख्यमंत्री को इतने प्रतिशत वोट मिले हैं, ‘आप’ बहुमत की सरकार बनाएगी, रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण का जलसा होगा, वहीं जनलोकपाल बना दिया जाएगा, उसी दिन से देश से भ्रष्टाचार का बीजनाश हो जाएगा - ये सब डरे हुए मन की आवाजें हैं। एनजीओ चलाने वाले जब राजनीति चलाने का काम करेंगे तो शुरू में उनका डरना स्वाभाविक है। हारने पर ‘घर के रहेंगे न घाट के’!

नरेंद्र मोदी को कांग्रेस के एक नेता ने ठीक ही ‘फेंकू’ नाम दिया है जो चल निकला है। लेकिन नरेंद्र मोदी अकेला फेंकू नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर जंतर-मंतर और फिर रामलीला मैदान पर जुटे एक से एक फेंकुओं को याद किया जा सकता है। उन्होंने न केवल दूसरी, बल्कि किसी तीसरी आजादी को भी एक डग में नाप लिया था! आजादी और क्रांति आंधी के आमों से भी सस्ते शब्द हो गये थे। कहने का आश्य यह है कि नरेंद्र मोदी और नामी-गिरामी लोगों की आनुवंशिकी एक ही है।

नवउदारवादी बहस में तैरने वाले ये सभी नाम, जाहिर है, नवउदारवादी नीतियों के समर्थक हैं, जो ऊपर से बन कर आती हैं। पार्टियां ओर उनके नेताओं के नाम भले अलग-अलग हों, वर्ग-स्वार्थ सबका एक है। भारत की मुख्यधारा राजनीति में वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता का यह प्रमाण है। और साथ ही इस बात की गारंटी कि इनके चलते देश की मेहनतकश जनता को, समाजवादी क्रांति तो दूर की कौड़ी है, कभी उसका संवैधानिक देय भी नहीं मिल सकता। यह तर्क, जो ‘आप’ के समर्थकों ने चलाया हुआ है, कि किसी भी तरह कांगेस-भाजपा से निजात मिले, दरअसल, कारपारेट पूंजीवाद के विरोध की राजनीति से निजात पाने का तर्क है। वर्ग-स्वार्थ की इस ताकत को तोड़ने के लिए समाजवाद के समर्थकों को और ज्यादा प्रतिबद्धता के साथ गंभीर बहस और संघर्ष चलाने की जरूरत है। पूंजीवादी बर्बरता से बचने का यही रास्ता है।