मुख्यमंत्री जी उद्घाटनों, पारिवारिक झगड़ों में व्यस्त हैं और मौतों से सहम चुका है पूरा शहर
अघोषित हास्पिटल बन चुका है देवबंद
मेहदी हसन ऐनी
चारों ओर डेंगू, चिकनगुनिया का प्रकोप।
हर घर से आधे दर्जन से ज्यादा लोग बीमार।
पैथालॉजी लैब वाले प्रशासन के दबाव से रिपोर्ट में कर रहे हैं हेराफेरी।
सरकारी अस्पताल में इलाज का कोई संसाधन नहीं।
स्वास्थ्य विभाग मौतों का कारण डेंगू, चिकनगुनिया को मानने को तैयार नहीं।
क़रीब 70 मौतों से सहम चुका है पूरा शहर।

अफरा-तफरी का आलम है, हर दिन आधे दर्जन से ज्यादा जनाज़ों को कांधा दे रहे हैं नगर वासी।

"ये हाल है विश्वविख्यात शहर देवबंद का"...
मुख्यमंत्री जी उद्घाटनों, पारिवारिक झगड़ों में व्यस्त हैं, ख़बर है कि कुछ दिनों में मुलायम सिंह भी देवबंद आने वाले हैं।
प्रशासन राहुल गांधी के दौरे को सफ़ल बनाने में लगा हुआ है।
देवबंद एस.डी.एम के पास नगर पालिका का भी चार्ज है, लेकिन अभी भी शहर से हर रोज़ कई लाख मच्छर पैदा हो रहे हैं। हज़ारों की तादाद में कुत्तों का जत्था सुबह से शाम तक शहर भ्रमण करते हुए दिखता है।
सफाई और फागिंग तो बहुत दूर की बात,

कूड़े के ढेर से पटा पड़ा है पूरा देवबंद।
अब ज़ाहिर सी बात है कि इन हालात में तो रोगी मरेंगें ही।
हाँ,आज ही एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें एक बीमार को जी.टी रोड पर निर्माणाधीन फ्लाई ओवर के नीचे चारपाई पर लिटाकर ड्रिप लगाया गया है।
तो अब ये मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि देवबंद एक अघोषित हास्पिटल बन चुका है।
इन सब के बावजूद स्वास्थ विभाग कुछ देखने और मानने को तैयार ही नहीं है।
कुछ चापलूसों की चाटुकारिता की वजह से सरकारी रिकार्ड में सब कुछ पाजिटिव है, लेकिन जो देखने और सुनने को मिल रहा है वो तो निगेटिव ही निगेटिव है।

आखिर स्वास्थ्य विभाग इस मुजरिमाना खामोशी से कब परदा उठायेगा।
एक अदद सड़ा हुआ सी.एच.सी हास्पिटल है जिस में मौजूद स्वास्थ्य कर्मियों को ड्रिप तक लगाना नहीं आता। ऐसे में मालदार लोग तो मेरठ, दिल्ली, चंडीगढ़ और देहरादून में इलाज करा लेते हैं, लेकिन ग़रीब लोग नगर के ही डॉक्टरों के यहां दौड़ दौड़ कर दम तोड़ रहे हैं।
सवाल ये है कि देवबंद वासियों को किस चीज़ की सज़ा मिल रही है?
मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शासन व प्रशासन की तवज्जो क्यों नहीं खींच पा रहा है देवबंद?
स्वास्थ विभाग क्यों नहीं इलाज का पर्याप्त इंतज़ाम कर पा रहा है?
क्या इसमें भी कोई राजनीति है?
अगर है तो अब देवबंद वासियों को अपने मसीहा और रहज़न में फर्क़ कर लेना चाहिये,
नेताओं की भीड़ लगनी अब शुरू होने वाली है।
देवबंद अपने इतिहास के सब से दर्दनाक दौर से गुज़र रहा है...
और इस की टीसें व आहें कब्रिस्तानों में ही दफन कर दी जा रही हैं।
अब ज़रूरी ये है कि सत्ता के गलियारों तक जिस दर्द को पहुंचने से रोक दिया जा रहा है उस दर्द को मौक़ा मिलते ही सूद समेत वापिस कर दिया जाये।