मुजफ्फरनगर- उकसाता रहा मीडिया
मुजफ्फरनगर- उकसाता रहा मीडिया
मीडिया क्षेत्र की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जन मीडिया ने इस अंक में मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका पर बेहतरीन शोध पत्र प्रकाशित किया है। हम हस्तक्षेप के पाठकों को यह शोध पत्र उपलब्ध करा रहे हैं। शोध पत्र काफी लम्बा होने के चलते इसे हम किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। …
सं. ह.
मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका-2
शोधार्थी – अवनीश कुमार
दैनिक प्रभात, मेरठ, शनिवार 7 सितम्बर
शीर्षक – महापंचायत में जाने से रोकने को बिछाया जाल
...शनिवार को नंगला मंदौड़ में होने वाली हिंदू महापंचायत को विफल करने के लिये प्रशासन जी जान से लगा है। क्षेत्र की सभी सीमाओं पर लोगों को पंचायत में जाने से रोकने के लिये पुलिस तैनात है...
...वहीं दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही इस कार्रवाई से अंदर ही अंदर हिंदू समाज में रोष फैलता जा रहा है।...
विश्लेषणः शीर्षक, पुलिस प्रशासन के खिलाफ शिकायत के लहजे में है जो पंचायत करने वालों की तरफ से की जा रही है। यानी रिपोर्ट लिखने वाले का पंचायत करने वालों के साथ सहानुभूति साफ नजर आ रही है। खबर में भी यही लहजा झलक रहा है। जब रिपोर्ट कहती है - “हिंदू महापंचायत को विफल करने के लिये प्रशासन जी जान से लगा है” तब रिपोर्टर और अखबार का पक्ष जाहिर हो जाता है। साथ ही यह कहना कि – “इस कार्रवाई से अंदर ही अंदर हिंदू समाज में रोष फैलता जा रहा है।..” उकसावे की कोशिश नजर आ रही है। पूरी खबर एक समुदाय को सीधे-सीधे संबोधित कर रही है और उनको पंचायत में पहुँचने का चैलेंज दे रही है।
अमर उजाला, 8 सितम्बर,
शीर्षकः फैसला आते– आते भड़क गया दंगा
उपशीर्षकः अनिश्चितकालीन धरने का किया था ऐलान
अखबार अपने ब्यूरो के हवाले से खबर लिखता है-...कवाल प्रकरण में इंसाफ के लिये नंगला मंदौड़ के भारतीय इंटर कॉलेज के मैदान में लाखों की भीड़ जुटी और इंसाफ के लिये अनिश्चितकालीन धरने का फैसला हुआ। ....भीड़ घरों को लौटने लगी तो हिंसा की खबरें आने लगीं। हिंसा की खबरें आने के बाद धरना भी खत्म कर दिया गया। सभी नेता भी घरों को लौट गये।...
अखबार आगे इसी खबर में एक रंगीन बॉक्स में प्रमुखता से खबर देता है। शीर्षक है–पंचायत से लौटते लोगों पर गोलियाँ बरसाई।
खबर बताती है - ....पंचायत से लौट रहे लोगों पर गाँव मुझेड़ा सादात के पास एक धर्मस्थल से निकले लोगों ने पथराव कर दिया। हमलावरों ने फायरिंग कर दो लोगों की हत्या कर दी। मीरापुर के मेन बस स्टैंड पर मोहल्ला कमलियान की ओर से आई भीड़ ने पथराव तथा फायरिंग कर दहशत फैला दी।....
खबर में आगे बताया जाता है- ....धर्मस्थल से निकले लोगों ने सुनियोजित तरीके से गाँव जा रहे दो ट्रैक्टर ट्राली पर सवार लोगों पर सुनियोजित तरीके से पथराव किया और कई राउंड गोलियाँ चलाई जिससे दो लोगों की मौत हो गयी।...
विश्लेषणः शीर्षक, पंचायत के फैसले और दंगे में एक सम्बंध स्थापित कर रहा है। फैसले के आने के साथ ही दंगे की शुरूआत हुयी, यानी जिन्हें फैसले से आपत्ति थी उन्होने फैसला आते ही दंगा शुरू कर दिया। यह एक समुदाय के खिलाफ बिना नाम लिये सब कुछ कह देने जैसा है।
उपशीर्षक धरना करने वालों से सहानुभूति जता रहा है। रिपोर्टर के लिये ये सदमें की बात है कि धरने को स्थगित कर दिया गया। वह रिपोर्टर की बजाए धरने के लिये इकट्ठा होने वाले समुदाय की भाषा बोल रहा है। खबर के पहले पैरे में ही रिपोर्टर की पक्षधरता सामने आ जाती है। जब रिपोर्टर कहता है “...भीड़ घरों को लौटने लगी तो हिंसा की खबरें आने लगीं” तो यह सिर्फ तथ्य नहीं है। यह एक समुदाय को सायास आरोपी साबित करने और दूसरे समुदाय को पीड़ित साबित करने की कवायद है। शीर्षक से रिपोर्टर यह कहना चाहता है कि एक समुदाय तो न्याय की मांग के लिये धरने पर बैठ रहा था और न्याय के लिये अहिंसक तरीकों में विश्वास करता है लेकिन दूसरे समुदाय की हिंसा के कारण धरना नहीं हो सका।
इसी खबर के साथ बॉक्स में उभरी हुयी खबर भी है, जिसका शीर्षक है - पंचायत से लौटते लोगों पर गोलियाँ बरसाई। स्पष्ट है कि यह एक उत्तेजना फैलाने वाला शीर्षक है। पहले से व्याप्त तनाव के बीच पाठक को यह समझने में देर नहीं लगेगी कि किसने गोलियाँ बरसाई, भले ही शीर्षक में इसे न कहा गया हो। रिपोर्टर के लिये यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि गोलियों का शिकार कौन बना, जबकि आमतौर पर गोलियाँ किसने बरसाई यह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। लेकिन यह बात रिपोर्टर पाठक के विवेक पर छोड़ देता है, जिसके बारे में उसे पता है कि पाठक समझ ही जाएगा कि ऐसा कौन कर सकता है। लेकिन फिर खबर में रिपोर्टर इस बात का इशारा भी करता है जब वह कहता है कि - ....पंचायत से लौट रहे लोगों पर गाँव मुझेड़ा सादात के पास एक धर्मस्थल से निकले लोगों ने पथराव कर दिया...गाँव की अवस्थिति से परिचित स्थानीय लोगों को यह समझते कितनी देर लगेगी कि मुझेड़ा सादात के पास किस “धर्मस्थल” की बात कही जा रही है। फिर रिपोर्टर इसे और खुलकर कहता है – “मोहल्ला कमलियान की ओर से आई भीड़ ने पथराव तथा फायरिंग कर दहशत फैला दी।...” रिपोर्टर कहीं भी हमला करने वाली भीड़ के समुदाय का जिक्र नहीं कर रहा है। वह इसके परिणाम समझता है। लेकिन वह इस बारे में सारे इशारे कर रहा है। मोहल्ला कमलियान की ओर से कौन सी भीड़ आ सकती है?
रिपोर्टर के लिये यह हमला सुनियोजित भी है - ...धर्मस्थल से निकले लोगों ने सुनियोजित तरीके से गाँव जा रहे दो ट्रैक्टर ट्राली पर सवार लोगों पर सुनियोजित तरीके से पथराव किया और कई राउंड गोलियाँ चलाई जिससे दो लोगों की मौत हो गयी।..” यहाँ रिपोर्टर खबर के तथ्य नहीं लिख रहा है बल्कि वह अपनी सहानुभूति वाले समुदाय से तकरीर कर रहा है कि देखो कैसे सुनियोजित तरीके से हमला हुआ है। यह असंदिग्ध तौर पर एक समुदाय को दूसरे समुदाय के खिलाफ उकसाने की कार्रवाई है, जो एक रिपोर्टर अपने अखबार की मार्फत बहुत की कारीगरी से कर रहा है।
इसी खबर के साथ एक तस्वीर भी है जो चार कॉलम की है और खबर से ठीक ऊपर यानी पेज शुरू होने के साथ ही लगी है। तस्वीर के साथ अखबार ने “महापंचायत” कैप्शन लगाया है। इस तस्वीर में एक समुदाय के लोगों की बड़ी मौजूदगी दिख रही है। अधिकांश लोग लाठी, डंडों, फरसों और अन्य देसी हथियारों को लहराते हुये दिख रहे हैं। लोगों के चेहरे पर गुस्से की अभिव्यक्ति साफ देखी जा सकती है।
खबर से पहले तस्वीर छापना, तस्वीर की प्रमुखता को बताता है। तस्वीर महापंचायत में इकट्ठा हुये समुदाय के हजारों सदस्यों की है। तस्वीर में दिख रहा है कि लगभग दूसरे आदमी के हाथ में कोई हथियार है। ऐसा लग रहा है जैसे वे लाठी उठाए हुये जैसे किसी बात की घोषणा कर रहे हों। तस्वीर देखकर किसी को जोश आ सकता है और कोई डर सकता है। यह इस बात से तय होगा कि तस्वीर देखने वाला किस खेमे में है। निश्चित रूप से यह तस्वीर उत्तेजना फैलाती है और भय का माहौल बनाती है।
हिंदुस्तान, मुजफ्फरनगर, 8 सितम्बर 2013
शीर्षक बसीकलां में कवाल जाते काफिले पर पथराव
खबर की शुरूआत इस तरह है - ...नंगला मंदौड़ में पंचायत जा रहे लोगों पर गाँव बसीकलां में पथराव होने पर कस्बे सहित आस-पास तनाव फैल गया। घटना के बाद यहाँ बाजार बंद हो गया। भीड़ थाने के सामने दो बाइकें फूंककर थाने में घुस गयी।
...इसमें छह से अधिक लोग घायल हुये। एक पक्ष ने लाठी डंडों व धारदार हथियारों से भी हमला किया। इसमें बच्चों सहित 12 से अधिक घायल हो गये।...
खबर में तीन तस्वीरें हैं। बड़ी साइज की इन तीनों तस्वीरों में पहली तस्वीर सड़क पर ली गयी है जिसमें लोग ट्रैक्टरों से पंचायत की तरफ जा रहे हैं। दूसरी तस्वीर पंचायत जाते लोगों की पैदल भीड़ की है और तीसरी तस्वीर पंचायत में एक गाड़ी और उसपर खड़े लोगों की है जिसके बारे में बताया गया है कि इस गाड़ी को हमला कर तोड़ दिया गया। पंचायत को गाड़ी के टूटने के बारे में बताया जा रहा है।
विश्लेषणः पहली नजर में ही शीर्षक सनसनी, उत्तेजना और भय से भर देता है।
पाठक के मन में आशंका होती है कि पथराव हुआ होगा तो फिर क्या हुआ होगा। पथराव करने वाले के खिलाफ गुस्सा भी आता है। दो समुदायों के बीच वैमनस्य को और बढ़ाने में यह शीर्षक कमाल का काम करता है।
खबर में रिपोर्टर जिक्र करता है – “...एक पक्ष ने लाठी डंडों व धारदार हथियारों से भी हमला किया। इसमें बच्चों सहित 12 से अधिक घायल हो गये।..” खबर के इस हिस्से से पता चलता है कि ये हमला सुनियोजित था। धारदार हथियारों के प्रयोग से मौतें होने की भी आशंका भी रहती है। घायलों में बच्चे भी हैं, रिपोर्टर यह बताना नहीं भूला है। लेकिन सवाल यह उठता है कि महापंचायत में बच्चे कैसे पहुँच गये। पथराव से आस-पास के कस्बों और गांवों में तनाव फैल गया, इस जानकारी को भी प्रमुखता से बताया गया है। इस जानकारी का स्रोत क्या है, इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है। यह भी नहीं बताया गया है क्या पथराव होते ही तनाव फैल गया ? तनाव के रूपों के बारे में भी कोई बात नहीं कही गयी है। यानी यह तनाव रिपोर्टर द्वारा जानबूझकर बनाया जा रहा है।
तस्वीरों का उपयोग भी इस तनाव को बढ़ाने के लिये ही किया गया है। ध्यान देने की बात ये है कि हर खबर के साथ पल-पल की तस्वीर दी गयी है। इस खबर के साथ भी तीन तस्वीरें हैं जिनमें से एक बड़ी तस्वीर है जिसमें मैदान में जुटी भीड़ के बीच में एक चार पहिया वाहन है। उसकी छत पर 3 लोग चढ़े हुये हैं। इसके बारे में बताया गया है कि यही वह गाड़ी है जिसे शनिवार को शाहपुर में तोड़ दिया गया है। निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि तस्वीर आम लोगों में भय और एक समुदाय के प्रति घृणा का माहौल बना रही है।
मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका (भाग-1)
आगे भी जारी....


