मुजफ्फरनगर- रिपोर्टर ने पहले ही मान लिया कि एक समुदाय दूसरे का दुश्मन है
मुजफ्फरनगर- रिपोर्टर ने पहले ही मान लिया कि एक समुदाय दूसरे का दुश्मन है
मीडिया क्षेत्र की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जन मीडिया ने इस अंक में मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका पर बेहतरीन शोध पत्र प्रकाशित किया है। हम हस्तक्षेप के पाठकों को यह शोध पत्र उपलब्ध करा रहे हैं। शोध पत्र काफी लम्बा होने के चलते इसे हम किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। …
सं. ह.
मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका-3
शोधार्थी – अवनीश कुमार
शीर्षकः हिंसा होने पर धरने से उठाया
..सिखेड़ा के मंदौड़ इंटर कालेज में हुयी महापंचायत के बाद जिले में भड़की हिंसा के बाद धरने पर बैठे पंचायत के जिम्मेदारों को भी पुलिस ने मैदान से हटवा दिया।...
....शनिवार को मंदौड़ गाँव के इंटर कॉलेज के मैदान में महापंचायत में बनी 11 लोगों की समिति ने अपनी कई मांगें रखी थीं। यह मांगे पूरी न होने तक अनिश्चितकालीन धरने का फैसला लिया गया था।...
...जब लोग अपने घरों को जाने लगे तो रास्ते में कई स्थानों पर ट्रैक्टर टालियों पर हमले कर दिए गये। इसमें मीरापुर के गाँव मुझेड़ा में दो लोगों के मरने की सूचना मिली।...
इस खबर में दो तस्वीरें हैं। पहली बड़ी तस्वीर महापंचायत की है जिसे भाजपा नेता हुकुम सिंह सम्बोधित कर रहे हैं। यह तस्वीर अखबार पर सबसे ऊपर लगी है। यानी अखबार का वो पन्ना तस्वीर से ही शुरू हुआ है और खबर नीचे है। दूसरी तस्वीर खबर के बगल में है, जिसमें महापंचायत को भाजपा के सरधना विधायक संगीत सोम संबोधित कर रहे हैं।
विश्लेषणः यहाँ भी शीर्षक, धरने और दंगे में सम्बंध स्थापित कर रहा है। साथ ही वह धरना देने वाले समुदाय के प्रति सहानुभूति जता रहा है। दंगे की वजह से धरना खत्म करना पड़ा, यह बात एक पक्ष को पीड़ित और एक पक्ष को आक्रामक साबित कर रही है।
खबर में इस बात का प्रमुखता से जिक्र है कि पंचायत से वापस लौटते समय हुये हमले में दो लोगों की मौत हो गयी। यह जानकारी एक समुदाय के लिये गुस्सा और उकसावे वाली है।
तस्वीर का विश्लेषणः 8 सितम्बर के अमर उजाला ने अपने मुख्य पृष्ठ पर ही एक बड़ी सी तस्वीर छापी है। तस्वीर को इतना ज्यादा प्रमुखता दी गयी है कि अखबार का मास्टहेड भी तस्वीर के अन्दर ही बनाया गया है। तस्वीर शनिवार के नंगला मंदौड़ में हुयी पंचायत की है। तस्वीर में साफ दिख रहा है कि हजारों लोग हाथों में डंडा, लाठियाँ और सरिया, फरसे और तलवारें उठाए आक्रामक मुद्रा में हैं। तस्वीर के नीचे मोटे अक्षरों में लिखा है – हिंसा में टीवी पत्रकार की भी मौत, 40 से ज्यादा लोग घायल, कई की हालत गंभीर, सेना की आठ टुकड़ियाँ बुलाई।
इस तस्वीर का एक विश्लेषण इस मायने में भी किया जा सकता है कि खबर पूरी नहीं लिखी जा रही है और काफी कुछ पाठक के विवेक पर छोड़ दिया जा रहा है। जब अखबार ये सूचना देता है कि हिंसा में टीवी पत्रकार की मौत हो गयी और 40 लोगों से ज्यादा घायल हैं तो वह यह नहीं बताता कि यह हिंसा किसने की। लेकिन अखबार इस बात को एक समुदाय की तरफ इशारा करके पाठक को समझने के लिये छोड़ देता है। अब इस सूचना के बाद अखबार जब हाथों में फरसे, तलवारें, लाठियाँ, सरिया और डंडे लिये आक्रामक मुद्रा वाली तस्वीर छापता है तब वह उसे हिंसा और मौत के खिलाफ लोगों के आक्रोश के रूप में न्यायसंगत सिद्ध करता है।
शीर्षक – दुश्मन जैसे हमले
बड़े और मोटे शीर्षक के नीचे छह तस्वीरें हैं। पहली तस्वीर एक खाली कारतूस की है। दूसरी तस्वीर में एक गली में कुछ लोग जमा हैं और रास्ते में मोटरसाइकिलें और स्कूटर गिरे पड़े हैं, तीसरी तस्वीर में एक गली में कुछ पुलिस वाले कुछ लोगों को खदेड़ रहे हैं, चौथी तस्वीर में लोंगों की एक भीड़ सड़क पर एक बाइक में आग लगाने की तैयारी कर रही है और पाँचवी तस्वीर भाकियू की पंचायत की है जिसमें लोग हथियार लहरा रहे हैं।
निश्चित तौर पर खबर का शीर्षक उत्तेजित करने वाला है। आपके अपने देश में “दुश्मन जैसे हमले” कौन कर सकता है? रिपोर्टर ने पहले ही मान लिया है कि एक समुदाय दूसरे का दुश्मन है। यह दुश्मन बनाने का सिद्धांत आगे चलकर पाकिस्तान से सम्बंध स्थापित करने के काम आता है, चूँकि पाकिस्तान ही हिंदुस्तान का जन्म-जन्मांतर का दुश्मन है।
अखबार के आधे पन्ने पर दंगे की तस्वीरें हैं जिनका जिक्र उपर किया जा चुका है। ये तस्वीरें यह साबित करने के लिये हैं कि एक पक्ष ने किस बर्बरता से दूसरे पक्ष पर प्रहार किया है। सबसे पहले खाली कारतूस, फिर गली में तोड़-फोड़, फिर दंगाइयों को खदेड़ा जाना और फिर सड़क पर बाइक को आग लगाने की तैयारी और अन्त में पंचायत में हथियार लहराते लोग। तस्वीरों को क्रम से देखने पर ऐसा लगता है मानो पहले एक पक्ष ने दंगा शुरू किया और अन्त की तस्वीर देख कर ऐसा लगता है कि दूसरे पक्ष ने आक्रोश में हथियार उठा लिया हो।
हिंदुस्तान, मेरठ, सितम्बर, जानसठ डेटलाइन
शीर्षक – पुलिस प्रशासन के बैरियर नहीं रोक सके भीड़ को
उप शीर्षक- गाँव नगला मंदौड़ में स्थित भारतीय इंटर कालेज के मैदान में जुटे 40 से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीण
खबर का पहला पैरा है - ...कवाल में छह दिन पूर्व साम्प्रदायिक संघर्ष में मारे गये दो युवकों को श्रद्धांजलि देने के लिये मंदौड़ के इंटर कालेज में बुलाई गयी महापंचायत में शनिवार को भारी भीड़ को रोकने के लिये प्रशासन के किए सारे इंतजाम धरे रह गये। बैरिकेडिंग तोड़कर हजारों लोग पंचायत स्थल पहुँच गये।...
खबर के साथ दो तस्वीरें हैं जिनमें पहली एक सड़क पर पुलिस द्वारा लगायी गयी बैरिकेडिंग और वहाँ कुछ पुलिस वाले और कुछ आदमी नजर आ रहे हैं। दूसरी तस्वीर में सड़क पर जुटी भारी भीड़ की है जिसमें हजारों की संख्या में लोग पंचायत की तरफ जाते दिख रहे हैं।
विश्लेषणः शीर्षक प्रशासन को मुँह चिढ़ाता हुआ और एक समुदाय के उत्साह को बढ़ाने वाला है। खबर में कवाल के मृतक युवकों को श्रद्धांजलि देने की बात की जा रही है। ध्यान देने की बात ये है कि कवाल में उस दिन तीन युवक मारे गये थे। यह महत्वपूर्ण है कि नंगला मंदौड़ की महापंचायत का नाम “बहू बेटी बचाओ महापंचायत” था। लेकिन खबर में पंचायत का उद्देश्य श्रद्धांजलि देना बताया जा रहा है।
आगे जारी....
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