मुझे अफसोस है जनरल
मुझे अफसोस है जनरल
सुन्दर लोहिया
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह अपनी सेवानिवृत्ति से पहले ही जन्मतिथि के विवाद को लेकर मीडिया में चर्चित रहे। उस समय सेना के भीतर पनप चुके भ्रष्टाचार को लेकर उनके भ्रष्टाचार विरोधी और स्वयं एक ईमानदार छवि वाले अफसर होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी जन्म तिथि सम्बन्धी विवाद की याचिका को खारिज करते हुए उनके प्रति अत्यंत आदरसूचक शब्दों में लिख था कि उन्हें जनरल सिंह जैसे अफसरों पर गर्व है। मैं इस प्रशंसा के कारण उनका मुरीद बन गया था। मुझे लगता था कि सरकार जनरल के साथ अन्याय कर रही है जबकि न्यायालय उनके प्रति सम्मानजनक टिप्पणी लिख रहा है। लेकिन सेवा निवृत्ति के बाद ज्योंही जनरल अन्ना हज़ारे की टोली में शामिल हुए मुझे लालू प्रसाद यादव की लोक सभा में दिया गया बयान याद आया जिसमें उन्होंने जनरल के भीतर नेता बनने की लालसा का जि़क्र किया था। फिर जनरल बाबा रामदेव के दरबार पहुंच गये तो लालू यादव मुझे एकदम सच भांप लेन वाला राजनेता लगा। वह सच जनरल सिंह ने भाजपा के प्रधान मन्त्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के साथ रेवाड़ी में आयोजित पूर्व सैनिकों की रैली में शामिल हो कर सिद्ध कर दिया। भूतपूर्व सैनिकों की रैली में सेवानिवृत्त जनरल का शामिल होना आपत्तिजनक नहीं हो सकता था यदि यह रैली भूतपूर्व सैनिकों के संगठन द्वारा आयोजित होती। पर रैली भाजपा की राजनीतिक रैली थी जिसमें जनरल ने जो भाषण दिया जिसे कई लोगों और कुछ मीडिया पत्रकारों ने सेना को भड़काने वाला बताया। उसे सुन कर मुझे अफसोस हुआ कि जिस व्यक्ति को मैं आदर्श जनरल मान रहा था वह अपनी सेना की उच्च्च परम्पराओं को जिन्हें इस देश के एकमात्र फील्डमार्शल जनरल जिन्हें उनकी सैनिक टुकड़ी अपना जैसा मानकर साम बहादुर कहते थी उनकी देशभक्ति पूर्ण परम्परा का अनुसरण न करके पाकिस्तान के सैनिक तानाशाहों की डगर अपनाई। हमारे देश के जनरल लड़ाई के मैदान में प्राणों की आहुति देकर अपनी जीत को जनता की चुनी हुई सरकार के हवाले करते आये हैं। वे खुद सत्तासीन होने के सपने नहीं देखते हैं। इसी लिए देश की जनता उनके प्रति हमेशा आदर और सम्मान प्रकट करते हैं। किसी भी जनरल पर लोगों ने इस तरह के सवाल नहीं उठाये जिस तरह आपके बारे में उठाये जा रहे हैं।
जनरल मुझे अफसोस इस बात का नहीं कि आप नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा कर रहे हैं। यदि आप राहुल गान्धी के साथ इस तरह नज़र आते तो भी मुझे आपके आचरण पर इतना ही गहरा आघात पहुंचता। अब आपके हर बयान पर से मेरा विश्वास उठ गया है। आप जब कहते हैं कि आपने काश्मीर में अमन शांति के लिए वहां के नेताओं को पैसे दिये फिर आप बोले कि वह रिश्वत नहीं थी बल्कि जनता में सद्भावना के लिए इस्तेमाल करने के मकसद से दिये। जनता के बीच उनकी भलाई के काम अगर नेताओं ने करने होते तो वहां के हालात ऐसे नहीं होते। फिर आपने कहा कि पैसे गैर सरकारी संगठनों को दिये तब मुझे यह लगा कि वे एन जी ओ वो होंगे जिनका बाबा रामदेव और नरेन्द्र मोदी की विचारधारा के साथ नाभिनाल सम्बन्ध रहा होगा। तभी आप सेवानिवृत्त होते ही अन्ना और फिर बाबा रामदेव की प्रदक्षिणा करके नरेन्द्र मोदी तक पहुंचे। जनरल अब आपको उन एन जी ओ के नाम जगजाहिर करने ही पड़ेंगे जिन्हें आपने अमन और शांति के नाम पर पैसे दिये हैं।
मैं जानता हूं कि मेरे जैसे ऐरे गैरे आदमी के अफसोस पर आपका कुछ बिगड़ने वाला नहीं हैं। मैं तो इस गुब्बार को निकाल कर भी अपना अपराधबोध कम नहीं कर पा रहा हूं। एक आदमी का अपने देश के सेनापति के कारनामों पर अफसोस से एक मानवीय त्रासदी जन्म लेती है जिसका राष्ट्रीय स्तर पर देर सवेर प्रभाव पड़ता ही है। क्योंकि मेरी तरह कितने ही सहजबुद्धि वाले आम नागरिक इस त्रासदी को या तो चुपचाप देख रहे हैं या उस अवसर की प्रतीक्षा में हैं जब वे कारगर हस्ताक्षेप कर सकें।


