मुदस्सिर क्या सोचता होगा इन खाक हो गए झरोखों को देखकर?
मुदस्सिर क्या सोचता होगा इन खाक हो गए झरोखों को देखकर?
मुदस्सिर क्या सोचता होगा इन खाक हो गए झरोखों को देखकर?
मुदस्सिर क्या भूल जाएगा सूखी रोटी के स्वाद को?
मुदस्सिर, हिदायत्ततुल्ला साहब का पोता है जिनकी रतसर बलिया स्थित पुश्तैनी कपड़े की दुकान और रिहाइश को पिछली ग्यारह तारीख को साम्प्रदायिक तत्वों ने लूटपाट के बाद आग के हवाले कर दिया था।
जिस वक़्त इस दुकान को दंगाइयों ने आग के हवाले किया उस वक्त पूरा परिवार दुकान के पिछले हिस्से की रिहाइश में दुबका पड़ा था और दुआ कर रहा था कि आग दुकान के पिछले हिस्से की रिहाइश में न पहुंच जाए। खुदा न खास्ता अगर ऐसा होता तो पूरा परिवार जिंदा जल कर खाक हो जाता।
| राजीव यादव, लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार व टेरर पाॅलिटिक्स पर वार करती ’आॅपरेशन अक्षरधाम’ के लेखक हैं। |
जिस वक्त आग लगी उसका धुआँ जब घर में भरने लगा तो उसकी घुटन डर व खौफ से बच्चे-महिलाएं अचेत होने लगे।
आज इतने दिनों बाद भी वो खौफ़ इनके चेहरों पर साफ नज़र आता है।
दाने-दाने को मोहताज ये परिवार और मुदस्सिर के हाथों में सूखी रोटी उस नफ़रत के फलसफे की देन है जो इंसान को इंसान से धर्म के नाम पर भेद करना सिखाती है...


