भागो और (ज़िंदगी को) बदलो
मुर्दहिया - एक असामान्य आत्मकथा
उज्ज्वल भट्टाचार्या
किसी रचना में जब मुझे किसी चरित्र का सशक्त चित्रण देखने को मिलता है, मैं शेक्सपीयर का कोई मिलता-जुलता चरित्र खोजने लगता हूँ। मुर्दहिया पढ़ते हुए यह काम कतई मुश्किल नहीं था। मेरी निगाह बरबस ओथेलो की ओर चली गई : ओथेलो का बचपन कैसा रहा होगा, जिसके बारे में शेक्सपीयर ने कुछ नहीं लिखा है। और फिर आया एक अहम सवाल। डेसडेमोना कौन है, जिसका गला घोंटा गया ? ज़रूरी नहीं कि डेसडेमोना औरत हो। ज़रूरी नहीं कि डेसडेमोना कोई दूसरा या दूसरी हो। वह डॉ. तुलसीराम के अंदर भी हो सकता/ सकती है। क्या गला घोंटा गया ? उसकी वजह क्या थी ? उसकी प्रक्रिया कैसी थी ?
रचनाकार कितना कहता है, और बिना कहे क्या कह जाता है ? ख़ासकर, आत्मकथा तो अपने-आपको छिपाने के लिये लिखी जाती है।
एक विलक्षण प्रतिभा का बालक। सिर्फ़ दलित ही नहीं, चेचक की वजह से सारे चेहरे पर दाग और सिर्फ़ एक आँख। मानो किसी महान लेखक ने अपनी रचना के लिये करीने से कोई चरित्र गढ़ा हो। एक ऐसा चरित्र, आम तौर पर सारा समाज पत्थर मार-मारकर जिसकी आत्मा को कुचलकर मार डालता है। लेकिन तुलसी मरता नहीं। पथराव के ऑबजेक्ट से वह सबजेक्ट बनता है। यह प्रक्रिया, इस प्रक्रिया का मकसद, उसकी इंतहा - मुर्दहिया में पंक्तियों के बीच, शब्दों के बीच उन्हें कैसे ढूँढा जाय ? कैसे पता लगाया जाय कि कितना ज़हर उसे पीना पड़ा, ज़हर पीकर वह कैसा सबजेक्ट बना ?
एक बात पर ध्यान देना ज़रूरी है : मुर्दहिया के लेखक प्रोफ़ेसर डॉक्टर तुलसी राम हैं, जो काने दलित बालक तुलसी को खोज रहे हैं, उसकी तस्वीर पेश कर रहे हैं।
अक्करमाशी पढ़ते हुए मुझे बेहद दिक्कत हो रही थी। मैं लिंबाले के जगत, उसकी सोच, अपने जगत के साथ लेखक के ताने-बाने को समझ नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि कांशीराम या अरबपति मायावती के साथ भी मेरी यह दिक्कत है। जातिगत दृष्टि से और सांस्कृतिक दृष्टि से जिस चंद फ़ीसदी के खेमे में मैं हूँ, यह उस खेमे की दिक्कत है। यह दिक्कत मुझे उस खेमे की सरहद पर बाहर की ओर धकेलती है, उसे तोड़ने के लिये उकसाती है।
मुर्दहिया, उसके दलित जगत, उसके दलित मुहावरों से मुझे ऐसी कोई दिक्कत नहीं हुई। उसकी कलम एक विश्लेषक कलम है, जो अपने संस्कारों में डूबे हुए मैं बड़ी आसानी से आत्मसात् कर लेता हूँ।
कितना गंदा, कितना दयनीय, कितना भयानक है यह जगत ! क्या ख़ूबसूरत चित्रण है ! क्या लाजवाब ऑथेंटिसिटी है ! वाह !
प्रो. तुलसीराम की ऐस्थेटिक्स मेरी ऐस्थेटिक्स है। कम से कम वह मेरी परिचित, मेरी समझ में आने वाली ऐस्थेटिक्स है। इस लिहाज से भी मुर्दहिया असामान्य है, अगर उसे दलित प्रतिनिधित्व का साहित्य माना जाय - और मैं ऐसा मानता हूँ।
मुर्दहिया का स्थाई भाव है भागना। तुलसी भागना चाहता है। जहाँ वह है, वहाँ मौत के सिवाय उसे कुछ नहीं दिखता है। उसे पता है कि अगर जीना है तो भागना है। पलायन की इच्छा जीजिविषा है, जब वह भागता है, तो वह जीने की लड़ाई लड़ रहा होता है।
और भागने का रास्ता ऊपर की ओर है।
मुंशी रामसूरत लाल, चिंतामणि, रूपराम, तेज बहादुर सिंह, सुग्रीव सिंह से लेकर तपसी राम तक सभी लोग लटकते हुए रस्से हैं, जिन्हें पकड़कर मुर्दहिया के अंधे कूँए से बाहर निकलकर ऊपर की खुली दुनिया में आया जा सकता है। तुलसी राम जहां पहुंचते हैं, वहीं निखरते हैं, और उनका माहौल फिर एक अंधा कूँआ बन जाता है, जिससे उबरना है, और वह उबरते हैं।
हावर्ड फ़ास्ट का नायक स्पार्टाकस सूली पर लटके हुए बुदबुदाता है कि वह फिर आएगा, बार-बार लौट कर आएगा। तुलसी राम कहते हैं : मैं यहाँ तक आया हूँ। यहाँ से मैं आगे बढूँगा।
भारत में आज लाखों तुलसी राम बन रहे हैं। करोड़ों तुलसी राम की ज़रूरत है।
उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।