शबरोज मोहम्मदी
एहसान जाफरी मामले में अदालत के फैसले से जिस प्रकार से मायूसी तारी हुई, वह एक सेकुलर लोकतन्त्रिक मुल्क की अदलिया के गाल पर किसी तमांचे से कम नही। अवाम का गमो गुस्सा शोसल मीडिया पर विकराल रूप लिए हुए है, पर हमारे कायद इसलिये खामोश बैठे तमाशा देख रहे हैं कि कहीं लबकुसाई से उनका इक्तिदार खतरे में न पड़ जाए।
भाजपा की सियासत का फार्मूला आज हर आकिल और बालिग पर जाहिर है, कि मुल्क के अकालितों को गाली दो उनकी जिन्दगियों को उन पर तंग करो। लेकिन देखना वाली बात यह है इंसाफ पसंदी का दम्भ भरके सियासत में सेकुलरिज्म के नाम के क्रीज पर बैटिंग करने वाले महानुभाव भी अकलियतो बिलखुसूस मुसलमानों के मामलों में चुप्पी सिर्फ इसलिए साधे हुये हैं कि कहीं उनके मोहब्बत के झूठे नाटक से बहुसंख्यक हिन्दू वोट नाराज न हो जाये।

आज जब मुसलमानों के अन्दर बेचैनी, इंसाफ और अपने सुरक्षा को लेकर बढ़ रही है तो ऐसे हालत में वह किस तथाकथित सेकुलर पार्टी के कंधे को पकड़ कर अपना दर्द हलका करे यह बहुत बड़ा मसला है। क्योंकि हिन्दुस्तान के सेकुलर दलों को मुस्लिमों के मामले में जैसी भूमिका निभानी चाहिए, उसका प्रदर्शन आज तक किसी मामले में देखने को नहीं मिला।
खास तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनावों की हरारत में भी तथाकथित सेकुलर और मुस्लिम हमदर्द के नाम पर वजूद में आई कम्युनल पार्टियों की खामोशी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को मुतबादिल तलाशने की तरफ इशारा कर रही है। क्योंकि इस नाजुक घड़ी में मुसलमानों के सही सियासी रहनुमाई की जरूरत है। लेकिन बुरा हो स्वार्थी और सत्ता से चिपक के रहने की लालच का, जिसने मुस्लिमों से हमदर्दी का ढोंग करने वालों का मुंह बंद कर रखा है।