स्वस्थ जीवन के सारे रास्ते बंद
राजीव मित्तल
शालू अग्रवाल ने फेसबुक पर अपने अख़बार में छपे दो लेख प्रदर्शित किये। दोनों लेख मेरठ की ज़हरीली आबोहवा। वहां की सड़ांध मारती काली नदी। नालों में पानी की जगह पशुओं की अस्थि मज्जा लोथड़े और खून के थक्के। और वही हाल ज़मीन के अंदर बचे-खुचे पानी का। रही सही कसर पूरी कर रहा बेतरतीब औद्योगिक विकास। यानी स्वस्थ जीवन के सारे रास्ते बंद।
आठ साल पहले जब मेरठ में अख़बार की सम्पादकी की नौकरी मिली तो मन में पुरखों के करीब जाने का उल्लास। अख़बार को नये सिरे से खड़े करने का जज़्बा। .वो ही मेरठ जहां चालीस साल पहले हापुड़ में एमए करने के दौरान खूब चक्कर लगते। पर.. कुछ दिन होटल में गुजारने के बाद शास्त्रीनगर में घर लेते ही एक सुहानी रात बदबू से दिमाग भन्नाने लगा। मकान मालिक से पूछा तो सहज भाव से बोले। कमेले की बदबू है। हवा इस तरफ आ रही है न। कोई बात नहीं आदी हो जाएंगे।
जी हां उसी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त बदबू से जिसका आदी मेरा मकान मालिक ही नहीं पूरा शहर पचपन साल से है।
उन्हीं दिनों उमर हयात ने किताब दी.. jungle। उसमें 19वीं शताब्दी के अंत के शिकागो। वहां मीलों फैले स्लॉटरहाउस के नारकीय हालात और उसमें काम कर रहे अश्वेतों और विदेशी प्रवासियों की हर दिन सिमट रही ज़िंदगी का रोजनामचा और उनके संघर्ष की गाथा है। मेरठ ने ऐसा ही सब कुछ भुगतान और आगे पता नहीं कब तक भुगतता रहेगा... पर jungle.. के इनसान के संघर्ष का शतांश भाव भी मेरठ निवासियों में नहीं दिखा। शायद इसलिये कि मेरठ और मेरठ मंडल में शामिल पांचों जिले रामायणकालीन और महाभारतकालीन पता नहीं कौन से गौरव का बिछौना बिछा कर सो रहे हैं।