मोदीजी के मुंह में घी-शक्कर, पहली बार जाहिर किया नेक खयाल
मोदीजी के मुंह में घी-शक्कर, पहली बार जाहिर किया नेक खयाल
मोदीजी के मुंह में घी-शक्कर, पहली बार जाहिर किया नेक खयाल
पंजाब से कभी भी बंटवारे की आवाज़ नहीं उठी। पंजाब के हिस्से में केवल बंटवारे का दर्द आया।
There was never a split voice from Punjab. Punjab only get the pain of partition.
आशुतोष कुमार
करतारपुर साहेब गलियारे का शिलान्यास सचमुच खुशखबरी है। बुरी खबरों की भारी बरसात के बीच।
वहां धरती पर बना पहला गुरुद्वारा है। वहाँ गुरु नानक चिर समाधि में लीन हैं। वहां पहुंचना, मत्था टेकना, उस मिट्टी की खुशबू लेना - इस खुशी के बारे में सोचिए।
लेकिन खुशखबरी केवल उन करोडों हिन्दुस्तानियों के लिए ही नहीं है, जो इसे जीतेजी सच न हो सकने वाला असम्भव सपना माने बैठे थे।
यह सबसे पहले हर एक पंजाबी की खुशी है। फिर हर एक भारतीय, बांग्लादेशी और पाकिस्तानी की खुशी है।
अपने आप नहीं टूटा था पंजाब
पंजाब अपने आप नहीं टूटा था। उसे तोड़ा गया था। बहुत बड़ी ताकत लगा कर। बहुत गहरी साजिशें रच कर। अकल्पनीय क्रूरता के साथ।
"हमने देखा था जो ख्वाब ही और था
अब जो देखा तो पंजाब ही और था।"
पंजाब से कभी भी बंटवारे की आवाज़ नहीं उठी। पंजाब के हिस्से में केवल बंटवारे का दर्द आया। इस दर्द को कोई भूला नहीं है। इस दर्द से उबरने की तड़प भी रह रह कर दिख ही जाती है, लाख मिट्टी डालने के बावज़ूद।
यह इमरान खान की पंजाबियत ही थी कि पाकिस्तान के विश्व कप जीतने पर उन्होंने कहा था कि यह केवल पाकिस्तान की नहीं, समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की जीत है! आप इमरान खान के बारे में कुछ भी सोचिए, लेकिन उस लम्हे और उस बयान को भूलिएगा मत।
छब्बीस ग्यारह भुलाया नहीं जाएगा। न आठ का, न अठारह का। लेकिन तमाम तल्खियों के बीच इमरान खान ने न केवल करतारपुर साहेब गलियारे की दशकों पुरानी मांग को मंजूर किया, बल्कि चार किलोमीटर तक उसे बना भी डाला। अब कैप्टेन साहेब पाकिस्तान के खिलाफ कितना भी सीना फुलाएं और विदेश मंत्री न्यौते पर कितनी भी ना नुकुर करें, गलियारे का शिलान्यास तो होना ही था!
कोई आदमी हर समय बोलता रहे तो कभी-कभार कायदे की बात भी बोल जाता है। मोदीजी के मुंह में घी-शक्कर। यह इशारा करने के लिए कि जब जर्मनी की दीवार गिर सकती है, तब भारत-पाक की बनावटी सरहद क्यों नहीं। साहब की समूची सियासत पाकिस्तान पर टिकी है, फिर भी उन्होंने यह नेक ख़याल जाहिर किया। इतिहास के अरमान कभी कभी बड़े अजीब रास्तों से निकलते हैं। उस इंसान के मुंह से भी, जो उसे मुंह में ही बंद रखना चाहता है।
करतारपुर साहेब से बंटवारे का चक्र उल्टी दिशा में घूमना शुरू होगा, यह गलियारा भारत-पाक उपमहाद्वीप के लिए एकजुटता और रौशनी का गलियारा बनेगा। नानक नाम के जहाज से शांति और मुहब्बत का नूर हम सबके घरों तक पहुंचेगा।
(आशुतोष कुमार, लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं।)
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