डीबी लाइव

ना पैसा चाहिए, ना बंगला चाहिए, एक मरहूम को जन्नत के लिए सिर्फ दो गज जमीन चाहिए...और दुख में डूबे परिवार को बेजान शरीर के लिए कब्रिस्तान चाहिए।

...बात उनके आशियाने की है, जो जुबान से कुछ नहीं कह सकते, पर उनकी खामोशी उनके अपनों के लिए एक बड़ी परेशानी है।

ये इंसान मिट्टी का पुतला...जब जिया तो मन में हजारों तमन्ना, लेकिन मरने के बाद बेजान शरीर को चाहिए तो सिर्फ दो गज जमीन। मौत तो हर इंसान के मुकदर में लिखी है। मरने के बाद शरीर को मिट्टी ही बन जाना है, लेकिन उसके लिए भी परिवार को जमीन के लिए गिड़गिड़ाना है।

जी हां...आगरा के अछनेरा कस्बे की ये तस्वीरें कोई कब्रिस्तान नहीं, बल्कि जीते जागते इंसानों का घर है, जहां एक तरफ गम है अपनों से बिछड़ने का, तो वहीं मजबूरी है घर को ही कब्रगाह बनाने की। यहां मौत के बाद मातम भी मनता है, जनाजा भी निकलता है, लेकिन सिर्फ घर से घर तक।

इस कस्बे में करीब 35 मुस्लिम परिवार हैं, जिनकी आबादी करीब 200 है।ये लोग ज्यादातर मजदूरी करते हैं। यहां सड़कें भी हैं...खेत भी हैं और मकान भी...लेकिन नहीं है, तो सिर्फ कब्रिस्तान। पिछले 60 सालों में यहां 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और उन्हें घर के बाहर ही दफनाया गया है...

यहां के लोगों के सामने कश्मकश ही कुछ ऐसी है...वो दुआओं में जन्नत की बजाय खुदा से कब्रिस्तान मांगते हैं।

...आखिर कब तक जिंदा लोगों के बीच मरहूमों का मेला लगाते रहेंगे। और यही वजह है कि लोगों में दिनोंदिन इन कब्रों को लेकर खौफ़ भी बढ़ता जा रहा है। लोग बेजान शरीर को घर के बाहर मिट्टी में तो दफना देते हैं...लेकिन बाद में शैतान के डर से तंत्र-मंत्र की विद्या में उलझ जाते हैं। लोगों में डर है कि इन कब्रों की वजह से शैतानी शक्तियां उनके बच्चों को परेशान करती हैं।

सरकारों ने चुनाव में जातियों को बांटा...वोट के लिए मुर्दों की जमीनों को भी बांटा...पीएम से लेकर सीएम तक हर कोई बस श्मशान और कब्रिस्तान पर ही जमीनों को बांटता रहा...लेकिन किसी ने भी इस गांव के लोगों के दर्द को नहीं बांटा।मुर्दे वोट नहीं देते शायद इसीलिए किसी भी सरकार ने यहां मुर्दों के लिए दो गज जमीन का भी इंतेजाम नहीं किया....आखिर कहां है वो बजट जो कब्रिस्तान और श्मशान के नाम पर महज़ फाइलों में दर्ज कराया जाता है?

दरअसल इस गांव में गरीब मुस्लिमों की आबादी है। इनकी आमदनी से ही बमुश्किल इनके घर का चूल्हा जलता है। रहने को जगह नहीं, तो यह कब्रिस्तान के लिए जगह कहां से खरीदेंगे और यही वजह है कि इनकी गरीबी इनके मरहूमों को घर में ही दफन करने के लिए मजूबर करती है। लोगों को सरकार से उम्मीद है कि उनके लिए भी, किसी न किसी दिन कब्रिस्तान के लिए जगह का इंतेजाम कराएगी।