मोदी के गुजरात में केरोसिन पेट्रोमैक्स ??
मोदी के गुजरात में केरोसिन पेट्रोमैक्स ??
संजीव कुमार अंतिम
मोदी जी और उनके समर्थक ये दावा कर रहे हैं कि गुजरात के हर गाँव में बिना किसी कटौती के चौबीस घंटे बिजली दी जा रही है। इसमें कोई शक नहीं है कि 2001 और 2011 के बीच गुजरात में बिजली उत्पादन दोगुना से कुछ ही कम रहा पर हरियाणा ने तो इस दौरान अपना बिजली उत्पादन तीन गुना बढ़ा लिया।<1> 1990 के दशक के दौरान गुजरात की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में 72.45% की वृद्धि देखने को मिली जबकि 2000 के दशक में ये वृद्धि 42.52% पर ही अटक गई। अगर किसी राज्य में बिजली का उत्त्पदन बढ़ रहा हो तो ये आशा की जाती है की उस राज्य की जनता अधिक बिजली का उपभोग करेगी पर गुजरात की तस्वरी कुछ और ही बयां कराती है।
गुजरात में प्रति व्यक्ति बिजली उपभोग मात्र 15.547 किलोवाट प्रति माह है जबकि पूरे भारत में नौ ऐसे राज्य हैं जहाँ की प्रति व्यक्ति बिजली खपत गुजरात से अधिक है और पांच अन्य राज्य में खपत गुजरात से मामूली रूप से कम है।<2> बिजली उपभोग की वृद्धि दर के मामले में 1990 का दशक मोदी के दशक से आगे रहा क्योंकि 1990 के दशक में ये वृद्धि 143.97% थी जबकि मोदी के काल में ये मात्र 59.97% रही। गुजरात अधिक बिजली उत्पादन तो करता है पर आम जनता से उस बिजली की इतनी कीमत लेता है कि जनता बिजली का उपयोग उचित ढंग से नहीं कर पाती है। गुजरात की जनता अब बिजली खर्च भी करे तो कैसे, ग्रामीण भारत में बिजली पर सबसे ज्यादा ड्यूटी गुजरात में ही 20-30% तक है। अगर एक ग्रामीण गुजराती परिवार महीने में 40 यूनिट से कम बिजली खर्च करता है तो उसपर 20% कर लगता है और अगर ज्यादा खर्च करता है तो 25-30% तक कर लगता है।<3>
इतना ही नहीं 1990 के दशक में सबसे अधिक वृद्धि बिजली के घरेलू उपयोगों में, कृषि में, सार्वजनिक कार्यों में हुई (यानि कि आम गरीब जनता द्वारा)। जबकि मोदी के काल में सबसे अधिक वृद्धि औद्योगिक और वाणिज्यिक कार्यों में दिखी वहीँ कृषि में बिजली के उपयोग में 16% कि गिरावट दिखी।<4> यानि अमीरों को मोदी ने बिजली दी और गरीब किसानों से छीनी। गुजरात में 2007-08 और 2010-11 के मध्य कृषि पर सब्सिडी में मात्र 14% कि वृद्धि दिखी जबकि हरियाणा और तमिलनाडु में ये वृद्धि 33 से 35% तक दिखी। घरेलू उपयोग पर दी जाने वाली सब्सिडी में गुजरात में लगभग 23% कि गिरावट दिखी जबकि हरियाणा में इसमें 18.2% और तमिलनाडु में 7.8% की वृद्धि दिखी।<5>
1991 में ही गुजरात के कुल 18,028 गाँव में से 17,940 गाँव में बिजली पहुँच चुकी थी। मार्च 2011 तक के आंकड़ों के अनुसार गुजरात में कृषि के लिए बिजली उपयोग के लिए 455885 अर्जियां बिना किसी सुनवाई के पड़ी हैं।<6> गुजरात में किसानों द्वारा सिचाई के लिए बिजली उपयोग का 5.64 आवेदन आज भी ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। वहीँ दूसरी और गुजरात में बिजली चोरी के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है।<7> इसका अर्थ तो यही हुआ कि गुजरात में किसानों को पहले तो बिजली का कनेक्शन नहीं मिलता है और अगर वो चोरी से बिजली का उपयोग करें तो जेल जाते हैं।
गुजरात सरकार के खुद के दस्तावेज के अनुसार गुजरात के कुल 12181718 घरों में से 983813 घरों में रोशनी का मुख्य माध्यम केरोसिन तेल है जबकि 26155 घरों में अन्य तेल प्रकाश के मुख्य माध्यम है।<8> वहीं गुजरात सरकार ने कोटे के लिए केरोसिन तेल को 2001 में 90641 लीटर से घाटाकर 2005 में 73074 लीटर कर दिया है।<9>
कागज़ पर भी गुजरात के किसानों को ज्योतिग्राम योजना के तहत 24 घंटों की बिजली सिर्फ घरेलू कार्यो के लिए मिलने का प्रावधान है। खेती के लिए सिर्फ 8 घंटे ही अनुमति है जो कि मोदी के आने से पहले 10 से 12 घंटे थी और 1980 के दशक में 18 से 20 घंटे थी।<10> ज्योतिग्राम योजना का सबसे प्रतिकूल प्रभाव वहां के भूमिहीन किसानों पर पड़ा है। क्योंकि ये मजदूर बटाई पर ज़मीन ले कर खेती करते थे और इनके पास उस ज़मीन पर कोई मालिकाना हक नहीं होता है, इस कारण उन्हें ज्योतिग्राम योजना के तहत दी जाने वाली बिजली और सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पाती है। इस दौरान गुजरात में पानी पंप के दामों में भी लगभग 40 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है।<11> इतना ही नहीं किसान को सिंचाई के लिए बिजली पहले फ्लैट दामों पर दी जाती थी जो कि अब बिजली के बिल के साथ जोड़ दिया गया है।
किसानों को सिंचाई के लिए कम और महँगी बिजली आवंटन करने के पीछे गुजरात सरकार ये तर्क देती है की कम और महँगी बिजली आवंटन से किसान बिजली की अहमियत समझेंगे और बेकार में बिजली और पानी ज़ाया नहीं करेंगे जिससे भूमिगत जल के बढ़ते संकट को भी रोकने में मदद मिलेगी। कितना निंदनीय है की इस देश के सबसे अमीर राज्यों में से एक गुजरात किसानों के सिंचाई के लिए कोई वैकल्पिक साधन जुटाने के बजाय भूमिगत जल के क्षय को रोकने का पूरा भार उन गरीब और बेबस किसानों पर मढ़ना चाहती है और दूसरी ओर पूंजीपतियों और उद्धामियों को भूमिगत जल के उपयोग में खुला छूट देते आ रही है। हाल ही में गुजरात में लगी टाटा की नैनो कार की फैक्ट्री में गुजरात सरकार बिना किसी कर के बिजली का आवंटन कर रही है।
इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि प्रदेश में इस निम्न उपभोग के स्तर के लिए गुजरात सरकार ये भी दलील दे सकती है कि चूंकि उनके प्रदेश की जनता उन्मुख निवेशक और उन्मुख उद्धमी है इसलिए वो अपनी बढ़ी हुई आय का बचत करके अपने रोजगार को बढ़ाने में लगाती है। लेकिन गुजरात सरकार यहाँ भी तर्कपरक नहीं है क्योंकि 2010 में गुजरात में क्रेडिट डिपोजिट अनुपात 4.70% था जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में ये क्रमशः 29.75%, 16.71% और 9.61% था।<12>
ऐसा नहीं है कि गुजरात सरकार के 24 घंटे लगातार बिजली उपलब्ध करवाने के दावे में कोई सच्चाई नहीं है, सरकार पुरे वर्ष 24 घंटे बिजली तो दे रही है पर बड़े महानगरो में रहने वाले अमीरे के घरों, दफ्तरों और उनके फैक्टरियों में। गुजरात के किसानो और गरीबो के लिए तो आज भी केरोसिन का दिया और पेट्रोमैक्स हि रौशनी का विश्वसनीय स्त्रोत है।
( यह लेख संजीव कुमार अंतिम की गुजरात के विकास मॉडल पर आदारित उस रिपोर्ट का अंश है जो उन्होंने जागृति नाट्य मंच के लिए तैयार की थी। रिपोर्ट में संपादन अतुल सूद ने किया है। )
<1> वार्षिक रिपोर्ट, Ministry of Power, योजना आयोग, अक्टूबर 2011
<2> NSSOरिपोर्ट 2009-10, पृ.स. 41
<3> गुजरात सरकार, Legislative and Parliamentary Affairs Department, schedule 1, section 3 (1)(a)., http://guj-epd.gov.in/Electricity%20Duty%20Act%201958.pdf पृ.स.12
<4> सामाजिक आर्थिक समीक्षा, गुजरात सरकार 2012-13, पृ.स. S-56-60
<5> अतुल सूद, पावर्टी अमिद्स्त प्रोस्परिटी: एस्सयेस इन थे ट्रेजेक्ट्री ऑफ़ डेवलपमेंट इन गुजरात, 2012, पृ.स. 230, तालिका 4.13;
<6> कृषि मंत्रालय, गुजरात सरकार, 2011-12
<7> इंडियन एक्सप्रेस 07 नवंबर 2013
<8> सामाजिक आर्थिक समीक्षा, गुजरात सरकार 2012-13,पृ.स.S-95
<9> सामाजिक आर्थिक समीक्षा, गुजरात सरकार 2005-06, पृ.स. S-111
<10> EPW: फरवरी 16, 2008, पृ.स. 59
<11> अतुल सूद, पृ.स. 125
<12> 11 जून 2012, टाइम्स ऑफ़ इंडिया


