अनामदास
प्रिय मोदी जी,
मैं यह खत आपको लिख रही हूँ किन्तु डरी हुई हूँ, क्योंकि आप देश के प्रधानमंत्री बन गये हैं किन्तु आपको प्रधानमंत्री बनाने में मेरा योगदान है। मैंने आपको वोट दिया था इसीलिये आपको खत लिखने की हिम्मत जुटा पा रही हूँ। मेरे पास कोई काम नहीं है वक्त ही वक्त है। इसलिये बहुत लम्बा खत लिख सकती हूँ क्योंकि मेरी समस्याओं का कोई अन्त नहीं है किन्तु मैं आपको परेशान नहीं करना चाहती, कितने अथक परिश्रम के बाद सैंकड़ों रैलियों को सम्बोधित करने के बाद आप प्रधानमंत्री बने हैं। चाहती हूँ कि कुछ दिन तो आपके सुकून से गुजरें। इसलिये लम्बा पत्र नहीं लिख रही हूँ संक्षेप में ही अपनी बात कहूँगी।
प्रियतम ! यह सम्बोधन आपको शायद बुरा लगे लेकिन यह सच है कि मुझे आपसे प्यार है उसी तरह जिस तरह तमाम गोपियों को भगवान श्रीकृष्ण से प्यार था। आप शायद मुझे नहीं जानते होंगे लेकिन उत्तर भारत के लोग मुझे बहुत अच्छी तरह जानते हैं। मेरा परिचय इस दुनिया के महाकवि निराला ने कराया था, हाँ मैं वही इलाहाबाद की सड़क पर पत्थर तोड़ती हुई लड़की हूँ। अब मैं लड़की नहीं रही, युवा हो गयी हूँ लेकिन मेरे जैसों के युवा होने से भी क्या ? किसी की भी निगाह नहीं पड़ती, कोई मैं शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी तो हूँ नहीं।
प्रिय मोदी जी मैं युवा हो गयी हूँ, किन्तु किसी को खबर भी नहीं तो यह भी सच है कि यह कोई चिन्ता का विषय भी नहीं, क्योंकि मेरे माँ-बाप नहीं हैं। मेरी तरफ कोई देखता भी नहीं वैसे तो मैं सुन्दर हूँ। मैंने कभी आयना देखा था, किन्तु वह मेरी गरीबी के भार को बरदाश्त न कर सका और टूट गया। अच्छा ही रहा जो टूट गया, कौन उसको संभाल कर रखता। मेरे पास तो घर भी नहीं है कभी एक झोपड़ी हुआ करती थी, किन्तु एक रात अचानक राहुल गाँधी उस झोपड़ी में पौंड़ गये, मैं गदगद थी, वह टूटी चारपाई पर सोये हुये थे। मैं रात भर पंखा झलती रही मैं सोच रही थी कि गरीब की कुटिया पर उन्हें नींद कैसे आयेगी, किन्तु वे पूरी रात खर्राटे मार-मार के सोते रहे। मैं सोचती रही कि पूरे देश का भार इनके मुलायम कन्धों पर हैं इन्हें नींद कैसे आती है, किन्तु वह तो वेखबर सोते रहे। निराला की कविता से मेरी गरीबी का अन्त तो नहीं हुआ, लोगों ने मेरे बारे में जाना अवश्य, किन्तु राहुल गाँधी के आने से मुझे लगा था कि मैं गरीबी से छुटकारा पा जाऊॅंगी, किन्तु राहुल गाँधी के जाते ही मेरे ऊपर कहर बरपा, मेरी झोपड़ी ही जला दी गयी। तब मुझे पता चला कि मैं बहिन जी की बंधुआ वोटर हूँ। इस लोकसभा के चुनाव में नारे अवश्य बहिन जी के लिये लगाये, किन्तु वोट मैंने आपको ही दिया था। झोपड़ी जलने पर मैं कुछ समय के लिये दुखी अवश्य हुई थी, किन्तु आज मैं खुश हूँ आज मेरे लिये पूरा गाँव घर है। जहाँ चाहती हूँ सो जाती हूँ। मेरे घर का विस्तार हो गया है। मेरे पास कपड़े भी ज्यादा नहीं हैं। मोदी जी डरिये मत, इतने कपड़े अवश्य हैं जिससे भारतीय परम्पराओं का निर्वहन हो सके। मेरे कपड़े फटे, पैबन्द युक्त अवश्य हैं किन्तु वे इतने छोटे नहीं हैं कि आपकी पार्टी के संस्कारवान कार्यकर्ताओं को कोई दिक्कत हो।
मोदी जी मेरी एक सलाह है कि आप स्वयं अपने कार्यकर्ताओं से कहें कि वे पांचजन्य के अलावा दूसरी पत्रिकाएँ भी पढ़ना शुरू करें जिससे उन्हें देश दुनिया के बारे में जानकारी हासिल हो, वरना लोग कुछ दिनों में आपकी पार्टी को तालिबानी कहने लगेंगे, यह कोई पाकिस्तान, अफगानिस्तान नहीं है यहाँ लोगों को तालिबानी संस्कृति से सख्त नफरत है।
प्रिय मोदी जी मुझे आप पर पूरा भरोसा है कि आप हमारे लिये बहुत कुछ करेंगे, किन्तु कितना करेंगे क्योंकि हम सवा अरब हैं यद्यपि हम जैसे अधिकांशों को आपके बजट से कोई लेना देना नहीं है। आपके बजट से मुश्किल से 20 प्रतिशत लोग प्रभावित होते हैं, मंहगाई बढ़ती रहे हमें क्या लेना देना हमें कौन प्याज, आलू, टमाटर खाना है हमारा काम तो नमक रोटी से ही चल जाता है। किन्तु आपको उनकी चिन्ता अवश्य करनी पड़ेगी जिनके पेट भरे हुये हैं, आने वाली पीढ़ियों की चिन्ता है जिन्हें। आपके वित्त मंत्री जब विपक्ष में बैठते थे तो पाँच लाख-पाँच लाख चिल्लाते थे, किन्तु बजट पेश किया तो ढाई लाख पर ही ढेर हो गये, गश खाकर गिर पड़े, भला हो संसद की व्यवस्था का आनन फानन डाक्टर आ गये वरना पता नहीं क्या होता।
प्रिय मोदी जी मैं आपको बहुत बड़ा खत लिखना चाहती थी क्योंकि मेरे दुखों का कोई अन्त नहीं है, किन्तु मुझे पता है कि आपके पास वक्त नहीं है। मैं आपके छप्पन इंच के सीने पर सिर रखकर आँसू बहाना चाहती थी, किन्तु मुझे यह भी पता है कि यह ख्वाहिश केवल मेरी ही नहीं है, मैंने सुना था कि चुनाव के दौरान आपने जिस किसी की पीठ थपथपाई वह सांसद हो गया, किन्तु आपने स्मृति ईरानी की पीठ क्यों नहीं थपथपाई, मुझे पता है कि किसी महिला की सार्वजनिक मंच पर पीठ थपथपाने से आपके पांचजन्यी संस्कारों ने रोक लिया होगा। वरना स्मृति ईरानी आपका स्पर्श पाकर राहुल गाँधी को हराकर संसद में पहुँची होती तो आपने जो उन्हें भारी भरकम विभाग से नवाजा है तो आप पर उगलियाँ न उठती।
और अन्त में आपको एक सलाह देती हूँ कि आप विदेश कम जाया करें, हमारे व आपके बीच कृष्ण व गोपियों वाला रिश्ता है जिस प्रकार गोपियाँ कृष्ण की अनुपस्थिति को एक क्षण के लिये बरदाश्त नहीं कर पाती थीं उसी प्रकार जब आप विदेश जाते हैं तो हमारा हाल उन्हीं गोपियों जैसा हो जाता है।... चिन्तित भी रहती हूँ क्योंकि दिल्ली के सत्ता के गलियारे फिसलन भरे हैं और गद्दी का तो इतिहास बड़ा खौफनाक रहा है। इस गद्दी पर बैठने के लिये लोग सम्बन्धों की तिलान्जली दे देते हैं। मुगलों ने कितना खून बहाया, मुझे तो राजनाथ से बहुत डर लगता है। बारहवीं शताब्दी में मैं अनंगपाल जब देशाटन को गये तो वह अपनी लड़की के पुत्र पृथ्वीराज चौहान को गद्दी पर बैठा गये, जब वह लौटकर आये तो उन्हें नगर की सीमाओं के बाहर रोक कर सन्देश सुना दिया गया कि अब वह बुजुर्ग हो गये हैं। अब दिल्ली का राजकाज पृथ्वीराज चौहान वखूबी संभाल रहे हैं। इसलिये इस सलाह के साथ अपनी बात समाप्त करती हूँ कि कुर्सी पर जमे रहिये, दिल्ली की कुर्सी पर बैठे हुये आप बहुत अच्छे लगते हैं।
आपकी
अनामदासी