सांप्रदायिक दंगों के मामले में गुजरात चौथे पायदान पे
संजीव कुमार
मोदी जी और उनके समर्थक यह कहते थकते नहीं है कि 2002 के दंगों के बाद गुजरात में आज तक कोई दंगा नहीं हुआ है पर आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012-13 के दौरान पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगों के मामले में गुजरात का चौथा स्थान रहा हैं। जबकि उत्तर प्रदेश पहले स्थान पे रहा। गुजरात में बीते वर्ष में कुल 61 सांप्रदायिक झड़पें देखने को मिलीं जिसमें कुल सात लोगों के हताहत होने की खबर है। अगर हम गुजरात की तुलना बिहार से करे तो सांप्रदायिक दंगे के मामले में बिहार गुजरात से कहीं पीछे है। 2012-2013 में बिहार में कुल 48 सांप्रदायिक दंगे देखने को मिले हे जो गुजरात से 13 कम हे। बिहार में हुए इन दंगो में भी ज्यादातर दंगे राज्य में जद(यू) और बीजेपी के अलायन्स टूटने के बाद हुए हैं। जब हम विभिन्न राज्यों में हिन्दू- मुस्लिम के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों की संख्या की तुलना करते हैं तो हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि उन राज्यों में हिन्दू और मुसलमानों की कुल जनसंख्या और उनके बीच का अनुपात क्या है। उत्तर प्रदेश में देश की सबसे बड़ी मुस्लिम और हिन्दू आबादी रहती है वहीँ बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में मुस्लिमों का जनसंख्या अनुपात गुजरात से लगभग दुगना है और कुल जनसंख्या तो दुगना से भी ज्यादा है।
अगर हम 2002 के दंगे के अगले वर्ष, यानि 2003 में देखें तो गुजरात में छोटे-बड़े कई दंगे देखने को मिले। 19 मार्च 2003 को अहमदाबाद के गोमतीपुर क्षेत्र में स्थानीय बच्चों द्वारा खेले जा रहे क्रिकेट मैच के दौरान बॉल का एक रही को लगाने के कारन दो धार्मिक वर्ग के बिच झडप सुरु हो गई। इस झड़प में ग्यारह जाने गईं और कई दुकानों को जला दिया गया। एक अप्रैल 2003 को दाहोद शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। दाहोद शहर के थाने में दर्ज ऍफ़आईआर के अनुसार मुस्लिम समुदाय के एक नव युवक ने एक हिन्दू लड़की के साथ छेड़ छाड़ करने की कोशिश की जिसके बाद दोनों धार्मिक समुदाय में ठन गई। 22 सितम्बर 2003 को जूनागढ़ जिले के कोदिनार कस्बे में सांप्रदायिक झड़पे देखने को मिली। स्थानीय कुछ लोगों ने दावा किया कि रविवार को स्थानीय बजरंग दल के सदस्य बालूभाई जाधव के दुकान में आग लगाने के पीछे दूसरे धर्म वर्ग के लोग थे और इसी बात पे सोमवार को जाधव के समर्थकों ने अल्पसंख्यक वर्ग की 26 दुकानों को जला दिया। इस सम्बन्ध में पुलिस ने रिपोर्ट में जाधव के दुकान में आग लगाने के लिए कारण शॉर्ट सर्किट होना बताया था। इसी माह के प्रारंभ में इसी शहर में गणेश महोत्सव के दौरान भी सांप्रदायिक झड़पें देखने को मिली थीं। एक नवम्बर 2003 विरंगम शहर में तीन लोगो की मृत्यु हो गई और करीब 40 लोग घायल होने की खबर आई। ये घटना तब शुरू हुई जब पुर कौंसिलर पुरुषोत्तम यादव एक स्थानीय क्रिकेट मैच के बाद गोलियां चलाने लगे।
अप्रैल 15 2004 को गोमतीपुर में स्थानीय बीजेपी के एम्एलए के द्वारा कराये जा रहे संगीत कार्यक्रम के दौरान हुई पथराव की घटना ने सांप्रदायिक झड़प का रंग ले लिया। इंटेलिजेंस विभाग के अनुसार जब से विहिप ने बीजेपी के लिए प्रचार करने के लिए तैयार होने का फैसला किया है तब से स्थानीय माहौल काफी तनावग्रस्त हो गया है। 26 मई 2004 को ताजिया जलसे के दौरान पनिगते पुलिस स्टेशन के बवामंपुरा क्षेत्र में पथराव ने सांप्रदायिक झड़प का रूप ले लिया। अगले दिन ही एक 23 वर्षीय युवक को 200 की भीड़ ने हत्या कर दी और सांप्रदायिक झड़प का सिलसिला लगातार दूसरा दिन भी जारी रहा।
वड़ोदरा से में वर्ष 2006 के मई माह में सुरु में प्रारंभ हुए सांप्रदायिक झड़पों में माह के अंत तक अहमदाबाद में कुल 30 लोगों के जान-माल की क्षति की खबर है। सोमवार को 300 वर्ष पुरानी दरगाह के गिराए जाने के बाद से ही वडोदरा शहर का माहौल काफी तनावपूर्ण था। 3 मई 2006 को मोहम्मद अफ़ीक वोहरा को उनके गाड़ी से निकलकर मंगलवार की रात को सरेआम जिन्दा जला दिया गया। मोदीजी पीड़ित को देखने गए और दोषियों को सजा देने का आश्वासन दिया।
25 मई 2010 को जब हिन्दू का एक बारात नमाज के समय कालूपुर में मस्जिद के पास से गाते बजाते गुजरा रही थी तब माहौल ने सांप्रदायिक रूप ले लिया। ये घटना है पटवा शेरी क्षेत्र का जहाँ घटना के तीसरे दिन एक हत्या की घटना सामने आई है। बाद में लड़की को छेड़ने का भी अफवाह फैलाई जाने लगी जिससे माहौल काफी ख़राब होता चला गया।
पिछले एक दशक के दौरान गुजरात में इस तरह के अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए हैं लेकिन मोदी समर्थको की परिभाषा के अनुसार शायद इन्हें साम्प्रयिक दंगों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है क्यूंकि उनके लिए तो 1984, गोधरा, मुजफ्फर नगर या भागलपुर जैसे दंगे ही दंगे होते है और बाकि छिटपुट मामूली घटनाएँ हैं जिनका भारत जैसे विविधताओं वाले खंड-खंड में बटे देश में घटना स्वाभाविक है। तभी तो मोदी जी और उनके समर्थक भारत को गैर-विविधता वाली एक एक अखंड राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं और उसके लिए हर हद को पर करने को तैयार हैं।
संजीव कुमार, लेखक रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता हैं व छात्रों के मंच “भई भोर” व “जागृति नाट्य मंच” के संस्थापक सदस्य हैं।