मोदी निजाम की इमारत दमन की नींव पर, हर एटीएम-बैंक के सामने लोकतंत्र की आत्मा कुचली जा रही
मोदी निजाम की इमारत दमन की नींव पर, हर एटीएम-बैंक के सामने लोकतंत्र की आत्मा कुचली जा रही
मोदी निजाम की इमारत दमन की नींव पर, हर एटीएम-बैंक के सामने लोकतंत्र की आत्मा कुचली जा रही
महेंद्र मिश्र
ब्लैक मनी देश के लिए नया बरमूडा बन गया है। कितनी जानें उसमें समाएंगी उसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। और समस्या है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। खुद पीएम को भी इसका अंदाजा नहीं था। तीन दिन में बने उनके तीन चेहरे इसकी तस्दीक करते हैं। जापान में उन्होंने लोगों का मजाक बनाया। ठीक दूसरे दिन गोवा में आंसू बहाए। और तीसरे दिन बंग्लोर में 50 दिन की मोहलत मांगते दिखे।
मोदी जी जरूरत पड़ने पर 50 दिन नहीं बल्कि 500 दिन जनता देने के लिए तैयार है, लेकिन आपके वादों पर जनता को भरोसा नहीं है। ढाई सालों का शासन इसका गवाह है। जिसमें पाने के नाम पर जनता को सिर्फ जुमले मिले। इस दौरान आपकी साख ने पाताल तक की यात्रा कर ली है।
ऐसे में जनता के पास विश्वास करने के लिए अब कुछ बचा नहीं है। लोगों के लाइन में खड़े होने की तुलना सीमा पर तैनात सैनिकों से करना बेमानी है।
अमूमन तो हर नागरिक अपनी जगह रहकर देश की सेवा कर रहा है।
देश का निर्माण उसकी मेहनत के पसीने से होता है। उसके इस योगदान को दोयम करार देना उसका अपमान है।
देश और देशभक्ति को महज सीमा और जवानों तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
राष्ट्रभक्ति को देखने का यह तंग नजरिया है। जिसमें सिर्फ सेना, सरहद और शासक आते हैं। बाकी जनता नदारद हो जाती है।
और चंद पलों के लिए अगर मान लें ऐसा है भी तो क्या कतार में मरने वाले किसी नागरिक को शहीद का दर्जा दिया जा रहा है? या फिर उसका सेना के जवानों की तरह सम्मान हो रहा है। उल्टे हर शख्स को शक की निगाह से देखा जा रहा है। जैसे पांच सौ-एक हजार की नोट बदलवाने वाला व्यक्ति कालाधनधारी हो।
इस एक फैसले ने हर पांच सौ की नोट रखने वाले को अपराधियों की कतार में खड़ा कर दिया। क्योंकि सच यह भी है कि उसी कतार में ब्लैक को ह्वाइट करने वाले लोग भी खड़े हो रहे हैं।
इस मामले में तो आम लोगों की तरह सेना के जवान भी उतने ही परेशान हैं। हर कहीं उनको भी कतार में खड़े देखा जा सकता है।
अगर राष्ट्रवाद को देखने का यही नजरिया रहा तो एक दिन यह एक व्यक्ति पर जाकर सीमित हो जाएगा। मोदी भक्ति और सेवा ही राष्ट्र का पर्याय हो जाएगी।
इस पूरी तुगलकी कवायद की आड़ में एक दूसरा ही खेल खेला जा रहा है।
कल ही स्टेट बैंक ने 63 पूंजीपतियों के तकरीबन 7 हजार करोड़ रुपये माफ कर दिए गए। इसमें भगोड़े माल्या के 1200 करोड़ भी शामिल हैं।
यहां जनता कतार में अपने पैसे पाने के लिए ही जूझ रही है। दूसरी तरफ भगोड़ों को गिरफ्तार करके सजा देने की जगह सरकार उन्हें पुरस्कृत कर रही है।
अपने चहेते अडानी पर लगे 200 करोड़ रुपये की पेनाल्टी को भी मोदी जी ने माफ कर दिया।
ब्लैक मनी विरोध की इस गंगा में हर पूंजीपति डुबकी लगाने के बेताब है।
यह सब कुछ उस समय हो रहा है जब देश की महापंचायत चल रही है। औऱ मोदी जी को उसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं है। कल राज्य सभा में नोटबंदी पर बहस के दौरान उनकी गैरमौजूदगी इसी तरफ इशारा करती है।
सच यह है कि खुले बाजार में हर शख्स के लिए अपनी ब्लैक मनी बदलने का विकल्प मौजूद है। वह चाहे सोना के तौर पर हो, रीयल इस्टेट में निवेश हो या फिर नई करेंसी के रूप में। यहां तक कि सरकारों ने भी अब छूट देना शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र की सरकार ने सिनेमा के टिकटों में यह छूट दिया है। तो उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने जमीनों की खरीद में।
इसका मतलब है कि जितनी भी ब्लैक मनी है इन रास्तों से अब खपाई जा सकती है। यानी पूरी कवायद ढाक के तीन पात साबित होने जा रही है।
इनकम टैक्स विभाग की माने तो इस देश में कैश या नगदी के तौर पर केवल 6 फीसद ब्लैक मनी है। और उसमें भी उसका एक बड़ा हिस्सा चलायमान है। बाकी ब्लैक मनी का बड़ा हिस्सा विदेशों में है या फिर देश के पूंजीपतियों की तिजोरी में।
जिस अमेरिकी पूंजीवाद को ट्रंप तक की यात्रा करने में ढाई सौ साल लगे। मोदी ने भारत को वहां ढाई सालों में पहुंचा दिया। जनता को नागरिक से भेड़ में बदलने के लिए उन्हें जरूर याद किया जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा भारतीयों की मेधा का लोहा मानते हैं। अनायास नहीं उन्होंने अमेरिकियों को भारत से सीखने की सलाह दी थी।
फैसले को ऊपर से थोपने को फासीवाद कहते हैं। जिसमें जनता की इच्छाएं और आकांक्षाएं नहीं बल्कि एक शख्स की सनक सर्वोपरि होती है।
इस निजाम की इमारत लोगों के दमन की नींव पर खड़ी होती है। रोजाना हर एटीएम और बैंक के सामने लगी कतारों में लोकतंत्र की आत्मा कुचली जा रही है। लोग उसे मजबूरी में मानने के लिए बेबस हैं।
पूरे देश और समाज में एक अजीब किस्म का भय है। न चाहते हुए भी लोगों को फैसले की तारीफ करनी पड़ रही है। नतीजतन देश का लोकतंत्र आज एक खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।


