‘ फलदार-वृक्षारोपण ’ में ही असली ‘मेक इन इंडिया है’

भारत की बेरोजगारी का ईलाज ‘ वृक्षारोपण ’ में है
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने निवास स्थान, 7 रेस कोर्स रोड, पर पौधा लगाकर देश भर में वृक्षारोपण की मुहिम को चलाए जाने का आव्हान किया। इस मुहिम से सचिन तेंदुलकर व विराट कोहली समेत कईखिलाड़ी जुड़े।
श्रमिक आदिवासी संगठन और समाजवादी जन परिषद के अनुराग मोदी ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कहा कि जहाँ यह कदम सरहानीय है, वहीं अब तक के सरकार के आंकड़ों के अनुसार वृक्षारोपण मुहिम में हजारों करोड़ रुपए लगाए जाने के बावजूद भी परिणाम सिफर ही रहा है। अगर पर्यावरण और वन मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो 1999 तक 31.21 मिलियन हेक्टर क्षेत्र में वनीकरण किया जा चुका है, जबकि जमीनी स्तर पर कुछ परिणाम नहीं दिखता। इसलिए सरकार हर बार, इस अभियान को नए-नए रूप में सामने लाती है। इस बार प्रधानमंत्री खुद आगे आए हैं।
जनसंगठनों ने अपील की कि अगर वाकई में प्रधानमंत्री गंभीर हैं, तो वो इस मुहिम में आदिवासियों और स्थानीय वनवासी समुदायों को जोड़ें, वर्ना इस बार भी, इससे जुदा कोई आशा करना बेमानी होगा। सरकार व्यापारिक उपयोग वाले पेड़ों की बजाए फलदार वृक्षों को बढ़ावा दे, तभी स्थानीय लोग जुड़ेंगे। इससे ना सिर्फ जैव विविधता बढ़ेगी, बल्कि लोगों को फल खाने को मिलेंगे जिससे उनका कुपोषण दूर होगा; उन्हें बेचने से पैसे मिलेंगे; पल्प आदि की फैक्ट्री में रोजगार मिलेगा और पर्यावरण सुधरेगा वो सबसे बड़ा फायदा।
अनुराग मोदी ने कहा कल्पना कीजिए, हर गाँव में फलदार वृक्षों के बगीचे होंगे, तो इससे अर्थव्यवस्था और मानव सूचकांक दोनों स्तर पर सुधार होगा।
जनसंगठनों का मानना है, ‘फलदार-वृक्षारोपण’ में ही असली ‘मेक इन इंडिया है’।
अनुराग मोदी ने कहा कि इस बात को अमेरिका के प्रसिद्ध अर्थ-शास्त्री ई. एफ. शूमाकर ने 1973 में लिखी अपनी किताब, ‘स्माल इस ब्यूटीफुल’, में लिखा भी है कि भारत की बेरोजगारी का ईलाज ‘वृक्षारोपण’ में है। उन्होंने उस दौरान की जनसंख्या के मान से लिखा: अगर भारत का हर व्यस्क व्यक्ति अगले पांच साल तक एक पेड़ हर साल लगाए, तो पांच साल में 200 करोड़ पेड़ हो जाएंगे और इसकी आर्थिक कीमत भारत की अभी-तक की पंच-वर्षीय योजना से ज्यादा होगी।
अगर ‘ वन अधिकार कानून, 2006 ’ के प्रावधानों का उपयोग कर आदिवासियों को खाली पड़ी जंगल जमीन पर वृक्षारोपण के अधिकार दिए जाते हैं, तो बिना एक पैसा खर्च किए, ‘भुखमरी और पर्यावरण’ की समस्या का स्थाई हल निकाला जा सकता है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इसका उपयोग करने कि बजाए, वन विभाग वृक्षारोपण करने वाले आदिवासियों के खिलाफ न्यायालय में प्रकरण दर्ज कर प्रताड़ित करता है; उन्हें जेल और जुर्माना भी भुगतना पड़ता है।
अनुराग मोदी ने उदाहरण देते हुए बताया कि, जब म. प्र. के बैतूल जिले में श्रमिक आदिवासी संगठन सरकार से भुखमरी के हल के लिए पेंशन, आनाज और काम मांगते- मांगते थक गया, तो फिर, खाली पडी गाँव के किनारे की जंगल जमीन पर वृक्षारोपण का अभियान पिछले शुरू किया जो पिछले दस साल से चलाया – जिसमें बारिश के समय पूरे ईलाके में ‘हरियाली यात्रा’ निकालकर आदिवासी यह सन्देश देते है: ‘ फलदार पौधे लगाएंगे – हरियाली खुशहाली लाएंगे, मुखमरी मिटाएंगे’| पिछले दस साल से जारी इस अभियान से जुड़ घोडाडोंगरी तहसील के चोपना थाणे अंर्तगत ग्राम मरकाढाना के और चिचोली तहसील और थाने के ग्राम पीपलबर्रा और बोड के आदिवासीयों ने अपने गाँव में नर्सरी बना अभी-तक लगभग 300- 300 एकड़ खाली पडी जंगल जमीन पर आम, जामुन, आंवला, ईमली, नीम आदि के दस हजार फलदार पौधे लगाए।
मरकाढाना के सुमरलाल कोरकू ने बताया उन्होंने इस हेतु ना सिर्फ जंगल से लैंटाना साफ़ करने, नर्सरी बनाने, फलदार पौधे लगाने, उन्हें पानी देने में जो मानव दिवस खर्च किए हैं, उसकी मजदूरी जोड़ने पर यह राशि पच्चीस लाख रुपए के आस-पास आएगी, लेकिन बैतूल वन विभाग, ना सिर्फ कई बार इन पौधों को उखाड़ने की कार्यवाही कर चुका है, बल्कि इन आदिवासियों पर वन अपराध के अनेक प्रकरण दर्ज कर चुका है।
पीपलबर्रा गाँव के मुंशी कोरकू ने बताया आज भी इन गाँवों के आदिवासियों पर ‘वन क़ानून, 1927, के तहत आधा दर्जन प्रकरण बैतूल जिले की अदालत में चल रहे हैं।
सरकार की योजना हर स्तर पर विफल है। सी. ए. जी. के 2007 की म. प्र. राज्य की ‘निष्पादन लेखा परीक्षा’ रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि म. प्र. सरकार को पर्यायी वनीकरण के तहत मिले 109. 77 करोड़ में मात्र 38.37 करोड़ रुपए जारी कि,ए जिसमें से मात्र 2.31 करोड़ रुपए, यानी 6% राशि खर्च हुई और वनीकरण की सफलता की दर, 0 से 10 प्रतिशत भर थी। म. प्र. सरकार को वर्ष 2012 में वैकल्पिक वनीकरण के लिए 800 करोड़ रुपए मिले, इसमें 100 करोड़ रुपए तो वाहन आदि खरीदने पर खर्च कर दिए और बकाया राशि का क्या हुआ किसी को नहीं मालूम।
इसी तरह, हाल में जारी, महारष्ट्र सरकार के वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक, मूल्याकंन, ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि 2008 में किए गए वैकल्पिक वनीकरण में से 2015 में एक भी सफल नहीं था। वहीं सी. ए. जी. की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच साल में हरियाणा सरकार व्दारा 539.58 करोड़ खर्च करने के बावजूद भी राज्य में वृक्ष क्षेत्र नहीं बढ़ा।
अनुराग मोदी ने कहा कि अब यह तो वक्त ही बताएगा कि इस बार नरेन्द्र मोदी व्दारा शुरू ‘वनीकरण’ की मुहिम ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तरह एक प्रसिद्धि पाने की रस्म-अदायगी भर साबित होती है, या वाकई इसे लेकर वो इस बार गंभीर हैं।