मोदी सरकार का चुनावी बजट, 2019 के चुनाव में विदाई होगी इस सरकार की - अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
मोदी सरकार का चुनावी बजट, 2019 के चुनाव में विदाई होगी इस सरकार की - अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
लखनऊ, 03 फरवरी। स्वराज अभियान (Swaraj Abhiyan) की राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह (Akhilendra Pratap Singh) ने मोदी सरकार (Modi Government) के आखरी बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह बजट चुनावी बजट (Election Budget) है और इससे देश की जनता का कोई भला नहीं होने जा रहा है. मोदी सरकार की 2019 के चुनाव में विदाई होगी क्योंकि इसके समय में न केवल लोगों की माली हालत ख़राब हुई है और लोकतांत्रिक अधिकारों और संस्थाओं पर गहरे हमले हो रहे हैं बल्कि यह सरकार भारतीय संस्कृति और सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा है।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ हेडक्वाटर में साथियों से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि 1 फरवरी 2019 को एनडीए सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत बजट दरअसल अंतरिम नहीं पूर्ण बजट ही है. अपने स्वभाव के अनुसार संसदीय परंपराओं और नियमों को रौदते हुए वोट ऑन अकाउंट को पूर्ण बजट के बतौर मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है. गहरे संकट के दौर से गुजर रही देश की अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए सरकार की तरफ से कोई प्रयास इस बजट में नहीं दिखता है. लोकसभा 2019 के चुनाव का दबाव सरकार के ऊपर दिखता है. जैसे-तैसे 5 एकड़ से कम के किसानों के लिए 6000 रुपए सालाना अनुदान राशि देने की बात बजट में है. अनुदान के लिए कुछ रुपये इसलिए खर्च किए गए हैं ताकि देश की जनता को भ्रमित किया जा सकें और उनका वोट हासिल किया जा सकें. इसीलिए किसानो को 31 मार्च 2019 तक 2000 रुपए पहली क़िस्त में देने की बात है. दरअसल यह एक रक्षात्मक, प्रचारात्मक बजट है, जिसमें सिचाई, फसल बीमा योजना, नमामि गंगे जैसे मदों में कटौती करके बोल्ड बजट प्रस्तुत करने का भ्रम पैदा किया गया है. किसानों का सवाल बेहद गंभीर और ढाचागत है, दिन प्रतिदिन उनकी मौतें हो रही हैं और मौजूदा राजकोषीय घाटे की अर्थव्यवस्था के अनुशासन में इसे हल भी नहीं किया जा सकता है. जैसे-तैसे किसानों के खाते में कुछ पैसा डाल देने की जगह सरकार उस संपूर्ण पूंजी को खेती किसानी के संसाधन जुटाने पर खर्च करती तो भी किसानों का कुछ भला होता.
मजदूरों के एक हिस्से के लिए घोषित की गयी पेंशन योजना मजदूरों के ही अंशदान पर निर्भर है. 5 लाख की आय को कर मुक्त करने की बात तो हुई है लेकिन समाज के अन्य तबकों की आर्थिक स्थिति के सुधार के लिए कारपोरेट घरानों पर सम्पति और उतराधिकार जैसे टैक्स लगाने की कहीं से कोई बात बजट में नहीं दिखी है. शिक्षा और रोजगार के प्रश्न पर पूरे बजट में ख़ामोशी दिखती है. रोजगार सृजन की अर्थव्यवस्था पर बात करने की जगह तेजी से बढ़ रही बेरोजगारी के आंकड़े भी देश के सामने ईमानदारी से सरकार ने नहीं रखे है. शिक्षा के विस्तार और उसके गुणवत्ता को विकसित करने के बारे में बजट में एक शब्द भी नहीं कहा गया है.
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