सलीम अख्तर सिद्दीकी

मजलिस-ए-शूरा 23 फरवरी को तय करेगी कि मोदी की तारीफ करके सुर्खियों में आए गुलाम मौहम्मद वस्तानवी दारुल उलूम के मोहतमिम रहेंगे या नहीं। लोग बहुत बेसब्री से 23 फरवरी का इंतजार कर रहे हंै। वस्तानवी के रूप में में दारूल उलूम को ऐसा कुलपति मिला है, जो हाफिज-ए-कुरान के साथ एमबीए है। उनकी यही खूबी कुछ लोगों को रास नहीं आ रही है।
वस्तानवी के विरोध के पीछे कौन लोग हैं, इसे समझना मुश्किल नहीं है। उन लोगों ने दारुल उलूम को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। दारूल उलूम पर अर्से से काबिज लोग नहीं चाहते कि कब्जा उनके हाथ से निकल जाए। ये वे लोग हैं, जो दारूल उलूम को अपनी सियासत के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। विरोध करने वाले किसी न किसी राजनीतिक दल से जुडेÞ हैं। राजनीतिक दल भी उन्हें केवल मुसलिम वोटों के लालच में भाव देते हैं। इसलिए ये लोग अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए उन मुद्दों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते, जिनसे मुसलमानों का बुनियादी नुकसान होता है। इन नेताओं ने ऐसा गिरोह बना लिया है, जो किसी भी उदारवादी मुस्लिम धार्मिक नेता या बुद्धिजीवी का बर्दाश्त नहीं करते। वे जानते हैं कि जिस दिन उदारवादी मुसलिम कयादत के पीछे मुसलमान लामबंद हो गया, उस दिन उनकी अहमियत खत्म हो जाएगी।
मुसलिम शिक्षण संस्थाओं की त्रासदी यही रही है कि वहां पर सियासत ज्यादा होती है। लोकतांत्रिक तरीके से चीजें तय नहीं होती। सवाल यह है कि जब मजलिस-ए-शूरा ने बहुमत से वस्तानवी को मोहतमिम बनाया है तो उनके एक बयान को लेकर उन्हें पदच्युत करने की साजिश क्यों की जा रही है? यह ठीक है कि मुसलमान नरेन्द्र मोदी की तारीफ नहीं सुनना चाहता, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि वस्तानवी ने उनकी किस रूप में तारीफ की थी। इतना विरोध तब है, जब वे अपने बयान पर खेद प्रकट कर चुके हैं। खेद के बाद मामला खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन जब मंशा ही हंगामा खड़ा करना हो तो क्या किया जा सकता है? वे पहले मोहतमिम हैं, जो आधुनिक शिक्षा के मामले में अब तक के सभी मोहतमिमों से सबसे ज्यादा शिक्षित हैं। उनकी सोच भी आधुनिक है। वे चाहते हैं कि दारूल उलूम धार्मिक ही नहीं, आधुनिक शिक्षा के लिए भी जाना जाए। यहां सिर्फ मौलवी बनने की ही नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और चार्ट्ड एकाउंटेंट बनने की भी तालीम दी जाए। ये सब जानते हैं कि भारत में मुसलमानों की शैक्षिक स्थिति बहुत दयनीय है। भारत में मदरसे अच्छी खासी तादाद में हैं। किसी भी समुदाय को अपनी धार्मिक पढ़ाई करने का पूरा हक है। यदि मदरसों में धार्मिक पढ़ाई के साथ ही आधुनिक शिक्षा भी दी जाए तो इस देश में सबसे ज्यादा शिक्षा के केन्द्र मुसलमानों के होंगे। मदरसों के रूप में सारा ढांचा मौजूद है, बस पाठ्यक्रम बढ़ाने भर से समस्या दूर हो सकती है। हालांकि कुछ मदरसों ने ऐसा किया है, लेकिन उनकी गिनती उंगलियों पर गिनी जा सकती है। यदि दारूल उलूम जैसा विश्वविख्याात धार्मिक शिक्षा का केन्द्र पहल करेगा तो यकीनन आवाज दूर तक जाएगी। वस्तानवी मुसलमानों को सर सैयद की तरह आधुनिक शिक्षा की तरफ ले जाना चाहते हैं। उनकी कोशिश को दबाया नहीं जाना चाहिए।