यकीनन मानवता को खतरा "धर्म" से ही है
यकीनन मानवता को खतरा "धर्म" से ही है
मनोज शर्मा
धर्म एक विवादास्पद विषय है, जिस पर बोलना कम से कम मैं पसंद नही करता। धर्म नाम के इस कांसेप्ट का मैं धुर विरोधी हूं, क्योंकि इंसान की ईजाद की हुई सबसे बदतर चीज है और आज यदि मानवता को किसी चीज से खतरा है, तो यकीनन वह चीज धर्म ही है।
मैं किसी भी धर्म के पक्ष या विपक्ष में नही हूं, पर आजकल के हालात को देखते हुए एक ख्याल मन में आ रहा है, वो मैं आप लोगों से शेयर करता हूं। गालियां देने का मन हो दे सकते हैं। यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, जो जितने मेरी निगाह में सही है, इनका आपकी निगाह में गलत होने की भी उतनी ही संभावना है, जिसका आपको उतना ही अधिकार है, जितना कि मुझे।
सबसे कमजोर धर्म इस्लाम है?
मैं ये सोच रहा था कि विश्व में सबसे कमजोर धर्म कौन सा है। यद्यपि कोई भी धर्म इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि हम कमजोर हैं, क्योंकि ये सबके अहं का प्रश्न है, पर मेरी व्यक्तिगत राय है कि विश्व का सबसे कमजोर धर्म इस्लाम है।
आप सोचेंगे कि मैं क्यों ऐसा कह रहा हूं?
भाई विश्व में 1.6 बिलियन मुसलमान हैं, जबकि ईसाई 2.2 बिलियन, 1 बिलियन हिन्दू, चायनीज पारम्परिक धर्म को मानने वाले 396 मिलियन, बौद्ध धर्म का मानने वाले 376 हैं, ये सभी बड़े धर्म हैं। छोटे छोटे बहुत से धर्म है।
अब भाई 1.6 बिलियन अर्थात एक अरब 60 करोड़ मुसलमान होने के बावजूद यह धर्म इतना कमजोर है, जो जरा जरा सी बात पर खतरे में आ जाता है। एक किताब (कुरान) को जला दे, तो इस्लाम खतरे में आ जाता है, कोई मौहम्मद साहब की तस्वीर बना दे, तो इस्लाम खतरे में आ जाता है। कोई एक सूअर काट दे, तो इस्लाम को खतरा पैदा हो जाता है। कोई एक चुटकुला या कार्टून बना दे, तो इस्लाम के नाम पर त्राहि-त्राहि मच जाती है। एक जाकिर नाईक पर कोई सवाल उठा दे, तो इस्लाम खतरे में आ जाता है।
खतरा बाहर नहीं, अंदर है
यदि एक अरब साठ करोड़ मुसलमान होने के बावजूद भी ज़रा-ज़रा सी बात पर इस्लाम खतरे में आ जाये, तो ऐसे धर्म का खत्म हो जाना ही बेहतर है। भाई यदि एक अरब साठ करोड़ मिलकर खुद को सुरक्षित महसूस नही कर सकते, तो पूरी दुनिया भी इस्लामिक हो जाये, तो भी यह खतरा बना रहेगा, क्योंकि खतरा बाहर नहीं, खतरा अंदर है।
सिक्ख धर्म मेरी पहली पसंद
यद्यपि मैं किसी धर्म को नही मानता हूं और धर्म नाम के शब्द से दूर ही रहता हूं, इसके बावजूद यदि कोई मुझसे मेरी पसंद पूछे तो शायद मैं कहूंगा कि सिक्ख धर्म मेरी पहली पसंद है। मात्र पूरे विश्व में 23 मिलियन सिख हैं, दो करोड़ तीस लाख, उसके बावजूद इस धर्म को कभी किसी से खतरा महसूस नहीं हुआ। कभी इन्होंने जबरन धर्मांतरण की बात नहीं की। इन्होंने कभी नहीं कहा कि हमारी किताब ही सबसे बेहतर है। कभी यह नहीं कहा कि हमारा धर्म ही सबसे बेहतर है। कभी यह नहीं कहा कि बस हम ही दुनिया पर राज करेंगे। इन्हें कभी अपने धर्म के प्रचार की आवश्यकता नही पड़ी।
ऐसा नहीं है कि ज्यादियां गोधरा मे ही हुई हैं, ज्यादियां इनके साथ भी हुई हैं। 84 के दगों के घाव किसी के भी साथ होते तो इतनी आसानी से इतनी भूलता।
भारत के इतिहास में इतना बड़ा दंगा कोई नहीं हुआ, जिसमें करीब 8000 (सरकारी आंकड़ा) सिख मारे गये। दंगों के बाद रोष सिखों में भी आया था, बंदूकें इन्होंने भी उठायी थीं। पर वो शायद एक वक्ती गुबार था, जो निकल गया, उसके बाद जिस सहजता के साथ इन्होंने उसे नजरअंदाज किया है और जिस तरह से अपनी गलतियों की भरपाई की है, वो काबिले तारीफ है।
देश के विकास में सिख धर्म का योगदान किसी भी अन्य धर्म से कम नहीं है।
सबसे मेहनती कौम है, जो कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती और कितना भी मजाक करो, कभी बुरा नहीं मानती। मैं दिल से सिख धर्म की इज्जत करता हूं।
गोधरा हो या 84 का दंगा, हत्यारे हिन्दू ही थे
अंत में एक खास बात कि गोधरा हो या 84 का दंगा, हथियार हिन्दुओं के ही हाथ में था, वो इस गलतफहमी मे न रहें कि हम बहुत शांतिप्रिय हैं।
बंटवारे के बाद कोई और इतना बड़ा दंगा याद हो, जिसमें इतनी बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये हों, कृपया यदि किसी के पास कोई आंकड़ा हो, तो मुझे बताये जरूर।
सत्य की जीत हो, अधर्म का नाश हो, हर धर्म इसी बात को कह रहा है, तो भाई ये अधर्म फिर आ कहां से रहा है। जब कोई भी धर्म अधर्म की शिक्षा दे ही नहीं रहा है, तो ये कौन है, जो बंदूके उठाये पूरी दुनिया में फिर रहा है?
अब आप कहेंगें कि ये तो इंसान है, जो हर चीज को अपनी तरह से ही समझता है।
तो मेरे भाई फिर ये धर्म की पाठशालायें क्यों खोल रखी हैं। जब इंसान को अपनी ही सोच से चलना है, तो वह चल लेगा। आपकी पाठशाला खोलने के बावजूद भी ये आपकी नहीं सुन रहा है, तो बंद कीजिए ये धार्मिक पाठशालायें, जो हजारों सालों से चली आ रही हैं। क्योकि इंसान ने आजतक वही किया है, जो इसका दिल कहता है और आदिम काल से आज तक जहां इंसान पहुंचा है, ये अपने दिल से ही पहुंचा है।
तो कृपया इसे किसी व्याख्याओं की जटिल जंजीरों में मत जकड़िये, इसे छोड़ दीजिए, आजाद, बेफिक्र और मस्त और जीने दीजिए इसे अपनी ज़िन्दगी।
जीवन का मर्म ही धर्म है, पर जब हम धर्म की बात करते हैं तो आस्था को व्याख्यायित करने लगते हैं और यही गलती आज हर धर्म कर रहा है।
ज्ञान और मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। ज्ञान जो हमें सही और गलत की पहचान कराता है।... और मानवता जो इंसान को इंसान से जोड़ती है। बजाय इसके कि हम किसी एक धर्म को अपनायें, क्यों नहीं हम एक दूसरे के धर्म से कुछ बातें लेकर उसे अपनायें। क्यों न ज्ञान और मानवता को जोड़कर हर कोई एक नया धर्म बनाये, जिसकी अपनी कोई किताब न हो, कोई नियम न हों, जिसकी न तो कोई पूजा ही हो और न जिसके कोई पूजा स्थल हों।
ज्ञान और मानवता यही वह गुण हैं, जो आपको जंगल से निकाल कर आज यहां तक ले आयें हैं, जिसने आपको जानवर से अलग कर इंसान बनाया है और यदि कोई धर्म आपको फिर से जानवर बना रहा है, तो उसे हटा दो उसे अपने रास्ते से। यह आपको तय करना है कि जानवर बनना है या इंसान।
क्या बनाने आये थे, ये क्या बना बैठे,
कहीं मंदिर बना बैठे, कहीं मस्जिद बना बैठे,
हमसे तो जात अच्छी है परिंदो की,
कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पर जा बैठे।


