कल बुराड़ी के एक वृद्धाश्रम में जाने का अवसर मिला, ज़्यादातर महिलायें ही थीं। उनसे मिली, बात की तो पता चला उन्हें हर पल अपने बच्चों के लौट आने का इंतज़ार रहता है।
कुछ ने तो अपना पता देकर हमसे अपने घर छोड़ आने की गुज़ारिश की, कुछ को यह भी याद नहीं था कि वो हैं कौन?
जब एक बूढ़ी माँ ने बड़े प्यार से मेरा हाथ पकड़ कर पूछा कि मैंने उसे कहीं देखा है क्या? तो मजबूरन मैं इंकार न कर पाई कि हाँ मैंने आपको देखा है...
इतना सुनना था कि उनकी आँखों में पानी भर गया, बोलीं मेरे घर पर कहना कि मुझे आकर ले जायें, ये जेल खाना है मेरा मन नहीं लगता।
एक बार उनके आँसू देखकर मन परेशान हो गया कि क्या ये अच्छी बात है बुज़ुर्गों को पकड़कर ताले में रखा जाये।
जब उनका खयाल रखने वाली महिलाओं से बात की तो पता चला इनमें से ज़्यादातर वो हैं जिनके बच्चे अस्पताल में छोड़ गये थे। उन्हें देखकर बहुत तकलीफ हुई।
दोस्तों क्या सचमुच कोई ऐसा कर सकता है?
यदि आपको ऐसा लगता है कि माता-पिता बोझ हैं तो उनसे भी बड़ा बोझ आप स्वयं हैं। आने वाले समय का आइना जरूर देख लें, कहीं आपका चेहरा इनसे भी बदतर न हो जाये...।
सुनीता शानू
सुनीता शानू, लेखिका कवयित्री हैं।

(सुनीता शानू की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)