यह कैसी डिफरेंट विद अदर्स !
यह कैसी डिफरेंट विद अदर्स !
सिर्फ़ मानवीय (राजनीतिक नहीं) आधार पर !
मोहन श्रोत्रिय
जयपुर। यों तो पार्टियों के लिये टिकट बँटवारे का काम है ही ऐसा कि वह अक्सर असंतोष को जन्म दे देता है। आप यह भी कह सकते हैं कि कोई भी पार्टी (वामपंथियों की बात इसलिए नहीं कर रहा कि उन्हें तो लोग किसी गिनती में लाते ही नहीं हैं) इससे बच नहीं सकती। फिर भी आज दो खबरों से बहुत तकलीफ़ हुयी। दोनों का वास्ता भाजपा से ही है। चूँकि वहाँ घमासान पहले मचना शुरू हो गया है। कांग्रेस में अभी दो चार दिनों में वह स्थिति आयेगी, हो सकता है उतने बड़े पैमाने पर नहीं !
एक नौजवान जो चाहे पिछला चुनाव हार गया था, पूरे पाँच साल उस विधान सभा क्षेत्र में सक्रिय बना रहा। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उसकी लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगा लीजिये कि उसे टिकट न मिलने पर उन्होंने प्रदेश कार्यालय में जम कर तोड़-फोड़ की। यह किस्सा यहाँ बयान करने का सबब यह सब नहीं, बल्कि यह कि मैंने टिकट-वंचित किसी आकाँक्षी की इतनी लाल आँखें नहीं देखी। ज़ाहिर है, आँखें रोने से ही लाल हुयी थीं ! उस नौजवान टिकटाकाँक्षी को रोता देख उसके तमाम समर्थक भी रोने लगे। रुलाई फूटने के साथ ही गुस्सा भी जम कर फूटा, और हश्र क्या हुआ उस गुस्से का, यह तो तस्वीरें ही बयान कर सकती हैं।
दूसरा हादसा पास के ज़िले के एक पूर्व सरकारी अफ़सर से ताल्लुक रखता है। उसे #महारानी ने खास तौर पर पसंद किया था, और सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दिलवा दिया था। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि चुनाव लड़ाने के लिये किसी की नौकरी छुड़वाई हो, पर जो इस अधिकारी के साथ हुआ है, वह तो पहली बार ही हुआ है। टिकट-
वंचित पूर्व अधिकारी का कहना है कि यह उसके साथ विश्वासघात हुआ है और नौकरी छुड़वा कर उसे सड़क पर लाकर पटक दिया गया है। पर इस पूर्व अधिकारी की हिम्मत की दाद देनी होगी। वह अब स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में सामने आ गये हैं।
पहली घटना जयपुर की है, और दूसरी गंगापुर सिटी की। सपने दिखाने, और फिर बेरहमी से उन्हें तोड़ देने की कहानी ! जनता के फ़ैसले की स्टेज तक तो उन्हें जाने ही नहीं दिया गया ! दोनों को यही मलाल है !


