यह तो होना ही था
यह तो होना ही था
जुगनू शारदेय
कहते हैं लोकतंत्र ब
हुमत का राजपाट है । हमारे कुछ मित्रों को राजपाट शब्द से आपत्ति है । यह उन्हें कुछ कुछ सामंतशाही दिखता है तो कुछ कुछ अलोकतांत्रिक । दरअसल लोकतंत्र की बहुत सारी मुश्किलों में एक मुश्किल यह भी है कि कौन लोकतांत्रिक है और कौन राजपाटी । कभी कभी ओहदे के हिसाब से तय करना पड़ता है । केंद्र में मामला साफ है कि वहां न तो लोकतांत्रिक है , न राजपाटी बल्कि है राजपादी । सर्दियों की मांग को वसंत में पेट साफ करने के लिए पूरा किया जाता है । अब जब जेपीसी की मांग पूरी हो गई है तो पता ही नहीं चल पा रहा है कि यह जेपीसी कहां गया । कहीं न कहीं तो होगा ही । एक दिन उस पर हंगामा होगा कि उसकी रपट संसद में रखें या अध्यक्ष के पास या संसद की लाइब्रेरी में रखें । यह देश का बड़ा भारी लोकतंत्र होता है जब सरकार को छोड़ कर सबको मालूम होता है कि रपट में क्या है । फिर पता चलता है कि रपट में तो दिन भर की खबर भी नहीं है क्योंकि राजपाद में यह तो होना ही था ।
देश का विदेश बिहार इस समय बड़े भारी संकट में है । वहां के समस्त कर्मचारियों को 28 फरवरी तक अपनी चल अचल संपत्ति का ब्योरा पेश करना है । ब्योरा न पेश हुआ तो फरवरी की तनख्वाह न मिलेगी । अब कौन जीता है एक माह के वेतन पर ऐ खुदा , यह तो उस बच्चे की पढ़ाई लिखाई के काम में भी नहीं आता जो हमसे रहता है जुदा । इस फैसले की नेकनीयती यह है कि भ्रष्टाचार मिटाना है । बड़े चुपके से भ्रष्टाचार ने कहा हाय दैया , यह कैसा राज आया है , जिसके बल पर चलता है , उसे ही मिटाने चला है । हमने समझाया भ्रष्टाचारी को यह शासन नहीं सुसासन का राज है । इसने कसम खाई है भ्रष्टाचार मिटाने की । आपको तकलीफ ? हमें काहे को होगी तकलीफ , अब तक तो हम लहर गिन गिन कर मोटे हुए जाते थे । अब भ्रष्टाचार मिटा कर छरहरे हो जाएंगे क्योंकि एक न एक दिन यह तो होना ही था ।
देश के विदेश बिहार में ही नहीं अन्य राज्यों में भी एक बड़ा भारी ओहदे के हिसाब से राजपादी काम हो रहा है । किसी ने हमें समझाया कि यह राजपादी भी
नहीं राजकब्जी काम है । इस काम के पीछे बड़ी भारी साजिश है । पुराना जमाना होता तो कहा जाता कि यह सीआईए का खेल है । अब बेचारे सीआईए की हालत बहुत
खराब है । उनका जासूस पाकिस्तान में गिरफ्तार है और ओबामा के कहने पर भी पाकिस्तान उसे छोड़ नहीं रहा है । अब तो यह भी नहीं कहा जा सकता कि देश के
विदेश बिहार के राज्यपाल कांग्रेस पार्टी के जासूस हैं । राज्यपाल होते ही आप संवैधानिक हो जाते हैं । बहुमती विधान सभा के विधेयक को ठुकरा सकते हैं । भले ही विधेयक का विषय शिक्षा हो , आप फरमा सकते हैं कि यह धन विधेयक है । किसने कहा था हे मूरख कि विद्या का सरस्वती से कुछ लेना देना नहीं । अब विद्या के माथे पर लक्ष्मी बैठी है । जहां यह बैठी होती है ,वहां से विधेयक को वापस आना ही था क्योंकि राजपादी संस्कारों में यह तो होना ही था ।


