पलाश विश्वास
कोलकाता। अपने नवारुणदा (नवारुण भट्टाचार्या) नहीं रहे। आशंका पहले से ही थी।

लंबे अरसे से मुलाकात नहीं है।

कल शाम चार बजे नवारुण दा यह मृत्यु उपत्यका छोड़ गये।

आज अब कुछ भी लिखने की हालत में नहीं हूं।

उनको श्रद्धांजलि बतौर मृत्यु उपत्यका।

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश :: नवारुण भट्टाचार्य

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश

जो पिता अपने बेटे की लाश की शिनाख़्त करने से डरे

मुझे घृणा है उससे

जो भाई अब भी निर्लज्ज और सहज है

मुझे घृणा है उससे

जो शिक्षक बुद्धिजीवी, कवि, किरानी

दिन-दहाड़े हुई इस हत्या का

प्रतिशोध नहीं चाहता

मुझे घृणा है उससे

चेतना की बाट जोह रहे हैं आठ शव

मैं हतप्रभ हुआ जा रहा हूँ

आठ जोड़ा खुली आँखें मुझे घूरती हैं नींद में

मैं चीख़ उठता हूँ

वे मुझे बुलाती हैं समय- असमय ,बाग में

मैं पागल हो जाऊँगा

आत्म-हत्या कर लूँगा

जो मन में आए करूँगा

यही समय है कविता लिखने का

इश्तिहार पर, दीवार पर स्टेंसिल पर

अपने ख़ून से, आँसुओं से हड्डियों से कोलाज शैली में

अभी लिखी जा सकती है कविता

तीव्रतम यंत्रणा से क्षत-विक्षत मुँह से

आतंक के रू-ब-रू वैन की झुलसाने वाली हेड लाइट पर आँखें गड़ाए

अभी फेंकी जा सकती है कविता

38 बोर पिस्तौल या और जो कुछ हो हत्यारों के पास

उन सबको दरकिनार कर

अभी पढ़ी जा सकती है कविता

लॉक-अप के पथरीले हिमकक्ष में

चीर-फाड़ के लिए जलाए हुए पेट्रोमैक्स की रोशनी को कँपाते हुए

हत्यारों द्वारा संचालित न्यायालय में

झूठ अशिक्षा के विद्यालय में

शोषण और त्रास के राजतंत्र के भीतर

सामरिक असामरिक कर्णधारों के सीने में

कविता का प्रतिवाद गूँजने दो

बांग्लादेश के कवि भी तैयार रहें लोर्का की तरह

दम घोंट कर हत्या हो लाश गुम जाये

स्टेनगन की गोलियों से बदन छिल जाये-तैयार रहें

तब भी कविता के गाँवों से

कविता के शहर को घेरना बहुत ज़रूरी है

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश

यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश

यह विस्तीर्ण शमशान नहीं है मेरा देश

यह रक्त रंजित कसाईघर नहीं है मेरा देश

मैं छीन लाऊँगा अपने देश को

सीने मे‍ छिपा लूँगा कुहासे से भीगी कांस-संध्या और विसर्जन

शरीर के चारों ओर जुगनुओं की कतार

या पहाड़-पहाड़ झूम खीती

अनगिनत हृदय, हरियाली, रूपकथा, फूल-नारी-नदी

एक-एक तारे का नाम लूँगा

डोलती हुई हवा,धूप के नीचे चमकती मछली की आँख जैसा ताल

प्रेम जिससे मैं जन्म से छिटका हूँ कई प्रकाश-वर्ष दूर

उसे भी बुलाउँगा पास क्रांति के उत्सव के दिन।

हज़ारों वाट की चमकती रोशनी आँखों में फेंक रात-दिन जिरह

नहीं मानती

नाख़ूनों में सुई बर्फ़ की सिल पर लिटाना

नहीं मानती

नाक से ख़ून बहने तक उल्टे लटकाना

नहीं मानती

होंठॊं पर बट दहकती सलाख़ से शरीर दाग़ना

नहीं मानती

धारदार चाबुक से क्षत-विक्षत लहूलुहान पीठ पर सहसा एल्कोहल

नहीं मानती

नग्न देह पर इलेक्ट्रिक शाक कुत्सित विकृत यौन अत्याचार

नहीं मानती

पीट-पीट हत्या कनपटी से रिवाल्वर सटाकर गोली मारना

नहीं मानती

कविता नहीं मानती किसी बाधा को

कविता सशस्त्र है कविता स्वाधीन है कविता निर्भीक है

ग़ौर से देखो: मायकोव्स्की,हिकमत,नेरुदा,अरागाँ, एलुआर

हमने तुम्हारी कविता को हारने नहीं दिया

समूचा देश मिलकर एक नया महाकाव्य लिखने की कोशिश में है

छापामार छंदों में रचे जा रहे हैं सारे अलंकार

जो मृत्यु रात की ठंड में जलती बुदबुदाहट हो कर उभरती है

वह दिन वह युद्ध वह मृत्यु लाओ

रोक दें सेवेंथ फ़्लीट को सात नावों वाले मधुकर

शृंग और शंख बजाकर युद्ध की घोषना हो

रक्त की गंध लेकर हवा जब उन्मत्त हो

जल उठे कविता विस्फ़ोटक बारूद की मिट्टी-

अल्पना-गाँव-नौकाएँ-नगर-मंदिर

तराई से सुंदरवन की सीमा जब

सारी रात रो लेने के बाद शुष्क ज्वलंत हो उठी हो

जब जन्म स्थल की मिट्टी और वधस्थल की कीचड़ एक हो गई हो

तब दुविधा क्यों?

संशय कैसा?

त्रास क्यों?

आठ जन स्पर्श कर रहे हैं

ग्रहण के अंधकार में फुसफुसा कर कहते हैं

कब कहाँ कैसा पहरा

उनके कंठ में हैं असंख्य तारापुंज-छायापथ-समुद्र

एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक आने जाने का उत्तराधिकार

कविता की ज्वलंत मशाल

कविता का मोलोतोव कॉक्टेल

कविता की टॉलविन अग्नि-शिखा

आहुति दें अग्नि की इस आकांक्षा में.

(पिछली शताब्दी के सत्तर के दशक में कोलकाता के आठ छात्रों की हत्या कर धान की क्यारियों में फेंक दिया था। उनकी पीठ पर लिखा था देशद्रोही.)

(सौजन्य से -आशुतोष कुमार)

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।