यूपी में भी हो रहे आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले
यूपी में भी हो रहे आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले
जनता के हाथ में एक हथियार आया है आरटीआई का और उसको भोथरा बनाने के लिए लोकतंत्र के दुश्मन मुस्टंडे क्या-क्या नहीं कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमलों का दौर शुरू हो चुका है। सुनील कुमार दीक्षित, बुलन्दशहर जिले के कस्बे जहांगीरागाद से एक समाचार पत्र निकालते हैं और इसके लिए आरटीआई का जमकर इस्तेमाल करते हैं। पिछले एक साल में उन्होंने इसकी मदद से कई खुलासे किए हैं। जिसके चलते बीते रविवार उन पर जान लेवा हमला किया गया। फिलहाल वह ठीक हैं।
श्री दीक्षित ने बताया कि वह पाक्षिक समाचार पत्र 'चरित्र दर्पण' पिछले करीब दो दशक से प्रकाशित कर रहे हैं और इस समाचार पत्र में किसी से विज्ञापन तक नहीं लिया जाता, ताकि कल को किसी के खिलाफ कुछ छापने में असहजता ना हो। विकास के पैमाने में अपेक्षाकृत काफी पिछड़े इस कस्बे में यह इकलौता स्थानीय समाचार पत्र है, जो बीते दो दशक से तमाम कठिनाइयों के बावजूद सच सामने लाने का प्रयास करता रहा है।
चरित्र दर्पण में बीते कुछ वर्षों में आरटीआई के इस्तेमाल और इसके लिए किए गए लंबे संघर्ष से कई बड़े खुलासे किये गए। श्रई दीक्षित ने बताया कि सर्वोच्च अदालत लगातार पोख़र/ तालाब को सुरक्षित रखने का आदेश देती रही है, लेकिन नगर जहांगीराबाद में स्थानीय नगर पालिका द्वारा नियमों को ताक पर रखकर पोख़र/तालाब की करोड़ों रूपए की जमीन पट्टे कर दिए। उन्होंनेने आरटीआई के माध्यम से जुटाई जानकारियों से साबित किया कि पटटे अवैध थे! लगातार आरटीआई के तहत जानकारियां जुटाने और अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करने के बाद नगर पालिका परिषद जहांगीराबाद को समस्त पट्टे निरस्त करने पड़े। श्री दीक्षित ने नगर की अन्य पोखर/तालाब पर हो रहे अवैध निर्माण को लेकर भी मुहिम चलाई। वह अफसोस के साथ कहते हैं कि जिला विकास
प्राधिकरण से लेकर गूगल सर्च इंजन तक हर कोई नगर में एक अन्य पोख़र/तालाब दर्शा रहा है, लेकिन स्थानीय नगर पालिका नहीं। बार-बार सवाल पूछने और हर स्रोत से जानकारियां जुटाने के बाद नगरपालिका परिषद मजबूर हुई और नगर पालिका ने पोख़र/तालाब के अवैध कब्जेदारों को नोटिस दिया है।
देश के बाकी कई शहरों की भाँति नगर जहांगीराबाद में भी बिल्डरों और अधिकारियों की सांठगांठ के बाद धड़ल्ले से अवैध कालौनियां बन रही थीं। एस के दीक्षित बताते हैं कि उन्होंने सारा मामला प्रमुखता से प्रकाशित किया और जिला स्तरीय स्थानीय विकास प्राधिकरण से इन अस्वीकृत कालोनियों के अवैध निर्माण को ध्वस्त कराया। इसी तरह अब तक नगर में कोई भी आवास या व्यावसायिक निर्माण कराने से पहले स्थानीय नगर पालिका परिषद द्वारा नक्शा पास कराने के लिए शुल्क देना पड़ता था। साथ ही अक्सर रिश्वत भी! आरटीआई के जरिए जब इस संदर्भ में जब उन्होंने जानकारियां जुटाईं तो खुलासा हुआ कि नक्शा पास कराने की यह बाध्यता ही गैरकानूनी है! मजबूरन नगर पालिका परिषद को शुल्क देने की बाध्यता खत्म कराई गई और स्थानीय नागरिकों को बड़ी आर्थिक राहत मिल सकी।
इसी तरह चीनी मिल, अनूपशहर का जल शोधन प्लांट वर्षो से बंद पड़ा था। मिल से निकलने वाला रासायनिक प्रदूषण क्षेत्रीय लोगों को बीमार करने के साथ-साथ फसल पर भी दुष्प्रभाव डाल रहा था। आरटीआई के माध्यम से पूछे गए सवालों के बाद चीनी मिल प्रशासन को जल शोधन प्लांट शुरू करना पड़ा।
श्री दीक्षित बताते हैं कि नियमों को ताक पर रखकर एक प्रमुख तेल कंपनी का क्षेत्र में पेट्रोल पंप लग रहा था, जिसमें आवेदन के समय एक जमीन दर्शायी गई थी, जबकि आवंटन के बाद पंप दूसरी जगह पर लग रहा था। यह गैरकानूनी था! जो तेल कंपनी के अधिकारी और आवंटी की मिली भगत से हो रहा था। आरटीआई से जब सारी जानकारियां मांगी गईं तो तेल कपंनी को पंप का आवंटन निरस्त करना पड़ा। एक अन्य मामले में बैंक में हिन्दी का प्रयोग मना करने पर राजभाषा हिन्दी के प्रयोग के लिए स्थानीय बैंक शाखाओं को संबधित विभाग से सख्त निर्देश दिलवाए गए।
हमले की घटना और उसकी वजह की जानकारी देते हुए श्री दीक्षित बताते हैं कि उनके संज्ञान में आया कि जहांगीराबाद स्थित राजकीय पोलटेक्निक कालेज में प्रवेश के नाम पर छात्र-छात्राओं से अवैध वसूली की जा रही है। यह राज्य सरकार का संस्थान है। सीधे प्रवेश में हुई धांधलियों को लेकर अभ्यर्थियों ने विद्यालय परिसर में प्रवेश के समय काफी हंगामा भी किया था, लेकिन तब अभ्यर्थियों की आवाज दबा दी गयी। उनको सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सीधे प्रवेश में हुए इस घोटाले से जुटाई गई राशि में से लाखों की रकम संस्थान से जुड़े लोगों द्वारा लम्बित वेतन प्रकरण की पैरवी हेतु खर्चा की जानी थी। दरअसल संस्थान के स्टाफ को लंबे समय से वेतन नहीं मिल पा रहा था। पता चला कि पैरवी हेतु इस रकम को जुटाया गया। वह कहते हैं कि यहां पैरवी का मतलब मुख्यालय पर दी जाने वाली रिश्वत भी हो सकता है! यानि गरीब बच्चों से अधिक फीस बसूल कर अपने वेतन का इंतजाम करना! उन्होंने इस अहम खबर को अपने समाचार पत्र चरित्र दर्पण के पिछले अंकों में प्रमुखता से प्रकाशित किया। वह बताते हैं कि उन्हें सूत्रों से पता चला कि संस्थान के तीन कर्मचारियों ने केनरा बैंक में एक संयुक्त खाता खुलवाया, जिसमें समय-समय पर रकम भी जमा की जाती रही। इस खाते में लाखों रूपए की रकम तब जमा की जा रही थी जबकि इन तीनों कर्मचारियों समेत पूरे स्टाफ को बीते करीब 8-9 महीनों से वेतन नहीं मिला था। साथ ही इनमें से कई एक अन्य बैंक के कर्जदार हैं और उसका कर्ज चुकाने में भी असमर्थ हैं। सीधा सवाल है कि बैंक से कर्जदार और महीनों से वेतन ना मिलने पर भी लाखों की रकम खातों में कैसे? जाहिर है कि दाल काली थी।
यही सब पता करने के लिए लगातार सूचना के अधिकार के तहत संस्थान से कई बार श्री दीक्षित ने जानकारियां मांगी, लेकिन संस्थान ने नियमों को ताक पर रखकर समस्त आरटीआई आवेदनों का जबाव देने से मना कर दिया। जबावों के क्रम में एक हैरान करने वाला जबाव दिया गया कि “आपके द्वारा मांगी गई सूचनाएं जनहित में ना होकर विद्वेष एवं बदनाम करने की नियत से मांगी गई हैं।” वह कहते हैं कि यह सूचना के अधिकार के नियमों के साथ भद्दा मजाक था। दूसरी तरफ मामले को रफा-दफा करने के लिए पोलटेक्निक संस्थान के एक कर्मचारी द्वारा जान से मारने की धमकी भी मिली।
घटना की जानकारी देते हुए दीक्षित बताते हैं कि बीते रविवार दिनांक 17 नवंबर 2013 की सुबह संस्थान का कर्मचारी काशी प्रसाद उनके घर पंहुचा और रूपए लेकर मामले को सुलझाने की पेशकश की। वह कहते हैं कि हद तो तब हो गई जब उनके द्वारा रिश्वत की इस पेशकश को ठुकराने के कुछ ही देर बार काशी प्रसाद अपने पुत्र आकाश प्रसाद सिंह व अन्य गुण्डों के साथ उनके कस्बा जहांगीराबाद स्थित आवास पर आ धमका और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला बोल दिया। गनीमत रही कि हमलावर अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। हमले में आवेदक और उसके परिवारजन सकुशल बच निकले। मौके पर पहुंची पुलिस ने आरोपियों को हिरासत में लेकर पुलिस कार्रवाही शुरू कर दी।
वह कहते हैं आप समझ सकते हैं कि एक छोटे से कस्बे के स्तर पर इतने बड़े खुलासों के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा होगा! उनको लगातार धमकियां भी मिलती रही हैं, लेकिन एक पत्रकार के लिए ऐसी धमकियां ज्यादा मायने नहीं रखती। वह दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि हमले के बावजूद आगे भी निर्धन परिवार के बच्चों से की गई अवैध बसूली की जानकारियां आरटीआई के माध्यम से जुटाते रहेंगे और सच सामने लाने का प्रयास करते रहेंगे। लेकिन आरटीआई पूछने के बदले पत्रकार पर होने वाला जानलेवा हमला वास्तव में सोचने को मजबूर करता है।


